पारिवारिक फिल्मों के चितेरे शक्ति सामन्त
शम्मी जैसे बड़े स्टार के मुंह पर कहने वाले एक बड़े डायरेक्टर रहे हैं, जिनका नाम है, शक्ति सामंत। वही शक्ति सामंत, जिन्होंने राजेश खन्ना की सुपरहिट फिल्मों ‘आराधना’, ‘कश्मीर की कली’ सहित 40 से ज्यादा...

सुधांशु टाक,
लेखक, समीक्षक
शम्मी कपूर। एक जमाने के सुपरस्टार। काम करने के मामले में मूडी आदमी, लेकिन इसी सुपरस्टार को एक डायरेक्टर ने उनके प्राइम टाइम में बोल दिया था कि तुम अब हीरो नहीं बन सकते।
दरअसल शम्मी एक बड़े सुपरस्टार थे तो कोई भी डायरेक्टर उन्हें कुछ भी नसीहत देने से डरता था, लेकिन एक फिल्म की शूटिंग के दौरान इस डायरेक्टर ने शम्मी से कहा कि आपकी उम्र के साथ आपका मोटापा भी बढ़ता जा रहा है। अब या तो आप अपना वजन कम करिए या फिर हीरो की जगह कैरेक्टर रोल करना शुरू करिए। इसके बाद शम्मी ने वजन कम करने की नाकाम कोशिश की। जब ऐसा मुमकिन नहीं हुआ तो कैरेक्टर रोल करने ही शुरू कर दिए।
शम्मी जैसे बड़े स्टार के मुंह पर ऐसा कहने वाले उस डायरेक्टर का नाम था, शक्ति सामंत। वही शक्ति सामंत, जिन्होंने राजेश खन्ना की सुपरहिट फिल्मों ‘आराधना’, ‘कश्मीर की कली’ सहित 40 से ज्यादा हिंदी और बंगाली मूवीज डायरेक्ट की थीं।
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बांग्ला के साथ अन्य भाषाओं के प्रति प्रेम
हिन्दी एवं बांग्ला फ़िल्मों के सुपरिचित निर्माता-निर्देशक शक्ति सामंत का जन्म वर्धमान (पश्चिम बंगाल) में हुआ था। परिवार ने प्रारंभिक शिक्षा के लिए उन्हें देहरादून भेजा | पढ़ाई पूरी कर वापस कलकत्ता (कोलकाता) लौटे और कलकत्ता विश्वविद्यालय के ‘कला संकाय’ मे दाखिला लिया। शक्ति दा में अपनी मातृभाषा ‘बांग्ला’ के साथ-साथ अन्य भाषाओं को सीखने का रुझान स्कूल के दिनों से था। शिक्षा ग्रहण करने के क्रम मे उर्दू और हिन्दी को दक्षता से सीखने का अवसर मिला। हिन्दी-उर्दू के ज्ञान ने उन्हें भविष्य मे ‘बेहतरीन’ सिनेमा स्थापित करने में सहयोग दिया। विशेषकर फ़िल्म के संवाद तथा गीतों को संवारने में यह जानकारी बड़ी उपयोगी रही।
हीरो बनने का सपने लिए आए थे मुंबई
हज़ारों युवाओं की तरह फ़िल्मों में ‘हीरो’ बनने के सपना आंखों में लिए युवा शक्ति सामंत मायानगरी मुंबई चले आए। फ़िल्मों में काम मिलने की प्रक्रिया सोच के मुताबिक नहीं होती। अपने हिस्से का कठिन संघर्ष हर किसी को काटना ही होता है। शक्ति दा का संघर्ष ‘उर्दू शिक्षक’ के रूप में शुरू हुआ। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। फ़िल्मों में अपनी विशेष रुचि को समय देते हुए शक्ति दा अक्सर ‘बाम्बे टाकीज़’ स्टूडियो जाया करते। यहीं उनकी मुलाकात जाने-माने अभिनेता अशोक कुमार से हुई।
अशोक कुमार ने उन्हे ‘अभिनेता’ बनने की चाहत को ‘त्याग’ कर निर्देशन में रुचि बनाने का सुझाव दिया। दादा मुनि की सलाह को गले लगाते हुए ‘निर्देशन’ सीखने का संकल्प लिया और सुपरिचित फ़िल्मकार फ़णि मजूमदार, ज्ञान मुखर्जी के ‘सहायक’ के रूप में सिने करियर का आगाज़ किया। समय के साथ फ़िल्म विधा का ज्ञान प्राप्त कर ‘बहू’ (1954) का निर्देशन किया, जो शक्ति सामंत द्वारा ‘निर्देशित’ पहली फ़िल्म मानी जाती है।
शक्ति फिल्म्स की स्थापना
शक्ति सामंत ने सन 1956 में ‘शक्ति फ़िल्मस’ की स्थापना करते हुए इस बैनर तले अनेक यादगार फ़िल्मों का निर्माण किया। हिन्दी सिनेमा के स्वर्णिम युग में शक्ति दा की फ़िल्मों का उल्लेख किया जा सकता है। उनका यह विश्वास रहा कि ‘कथा’, ‘गीत-संगीत’ और ‘रुमानियत’ का फ़लसफ़ा किसी फ़िल्म को हिट कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्वर्ण युग की अनेक फ़िल्मों के सफ़ल होने में यह अवधारणा काम कर गई। करियर के चरम में रुमानियत ‘शक्ति फ़िल्मस’ की पहचान रही। इस समय तक शक्ति सामंत का नाम बिमल राय एवं रिषीकेश मुखर्जी के साथ सम्मान से लिया जाने लगा। बतौर निर्माता-निर्देशक शक्ति सामंत की पहली फ़िल्म ‘हावडा ब्रिज’ थी। फ़िल्म में अशोक कुमार, मधुबाला तथा के.एन. सिंह जैसे कलाकारो, यादगार गीतों, बेहतरीन कहानी और सुंदर निर्देशन का उम्दा समन्वय था।
फ़िल्म की गुणवत्ता से शक्ति दा ने शायद ही कभी समझौता किया हो। यही कारण था कि उन्होंने अपनी फ़िल्मों में कथा, पटकथा, संवाद, गीत और संगीत के साथ ‘चरित्र’ मे ‘फ़िट’ बैठने वाले अभिनेता-अभिनेत्री का चयन किया। अभिनेताओं में राजेश खन्ना, शम्मी कपूर, अशोक कुमार, उत्तम कुमार, संजीव कुमार तथा विनोद मेहरा शक्ति फ़िल्म्स की अवधारणा मे सफ़ल रहे।
हिन्दी को बनाया अभिव्यक्ति का माध्यम
शक्ति दा फिल्म जगत में विमल राय और ऋषिकेश मुखर्जी की श्रेणी के फिल्मकार थे, जिन्होंने बंगलाभाषी होते हुए भी हिन्दी को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। आज तो सब ओर मारधाड़ और नंगेपन वाली फिल्मों का दौर है; पर उन दिनों संगीतमय फिल्मों का दौर था और उसे प्रचलित करने में शक्ति दा की मुख्य भूमिका थी। उनके द्वारा प्रदर्शित प्रेम वासना के बदले भावना प्रधान होता था। उनकी फिल्म परिवार के सब लोग एक साथ देख सकते थे।
वे निर्माता व निर्देशक के रूप में पूर्णतावादी थे। उनकी प्रतिभा बहुमुखी थी; पर दूसरों के काम में वे हस्तक्षेप नहीं करते थे। वे भारतीय फिल्म निर्माता संघ, सेंसर बोर्ड तथा सत्यजित राय फिल्म और टेलिविजन संस्थान के अध्यक्ष रहे। उनकी फिल्में अनेक विदेशी समारोहों में प्रदर्शित की गईं। उन्हें अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी किया गया। शक्ति सामंत दा आज हमारे बीच में नहीं है, लेकिन उनकी बनाई फिल्मों के माध्यम से उनकी अमिट याद हमेशा फिल्म प्रेमियों के दिलों में बनी रहेगी।






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