
रास बिहारी गौड़, अजमेर
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कलेंडर
जनवरी में आगाज होता है नववर्ष का
पति- पत्नी के बीच बिगुल बज जाता है संघर्ष का
सबसे पहले मकर संक्रांति
शुरू होती है क्रांति
पत्नी तिल का ताड़ बनाकर पति को लताड़ती है
छब्बीस जनवरी पर अपने अधिकारों का झंडा पति की छाती पर गाढती है
फ़रवरी में महाशिवरात्रि, महापर्व
पत्नी पर्व का असर मांगती है
पति के सामने भगवान भोले से
दूसरा वर मांगती है
मार्च में होली, रंगों की ठिठोली
तब तो भगवान ही रखवाला होता है
पत्नी लाल पीली पति का मुंह काला होता है
अप्रेल में अप्रेल फूल पतिओं के लिए
मई में मज़दूर दिवस पतिओं के लिए
जून में जून ख़राब होती है
जुलाई के सावन भादों खलते हैं
पंद्रह अगस्त स्वतंत्रता दिवस
हर पति के मन में आज़ाद होने के ख्याब पलते हैं
सितम्बर में गणपति बप्पा मोरिया
गण के साथ पति लगा है
इसलिए विसर्जन होरिया
अक्तूबर में डांडिया
नजारा सूधा सठ है
पति पत्नी दोनों नाच रहे हैं
हाथ में लट्ठ है
नवम्बर में बीवी बच्चे बाज़ार मिलकर लूटते हैं
दिवाली के सारे पटाखे हम पतिओं की खोपड़ी पर फूटतें हैं
दिसम्बर में पति धार्मिक हो जाता है
क्रिसमस पर चर्च में मत्था टेकता है
वहां भी ईसा मसीह को सूली पे टंगा देखता है
समझ जाता है
पति
दोनों की नियति
सारे ग़म भूल जाता है
फिर से बापू न्यू ईयर के झूले में झूल जाता है
2
लिफ़ाफ़ा
मैंने बेटे का बर्थ डे मनाया
कार्ड छपवाया
कार्ड में लिखा
ख़बरदार
जो कोई फोकटिया दिखा
तो अपनी इज्जत का
ज़िम्मेदार स्वयं होगा
हमारे लिए लिफ़ाफ़ा अहम होगा
क्योंकि लिफ़ाफ़े में अर्थ है
अर्थ का अर्थ है
जो सक्षम है समर्थ है
वही हमारा यार दोस्त मित्र है
क्योंकि लिफ़ाफ़ा
समाज का वैश्विक चरित्र है
दरवाज़े पर लिखवाया
स्वागत
ख़ाली हाथ आना मत
ख़ाली हाथ प्रवेश निषेध है
हम आपको नहीं पहचानते
हमें खेद है
पत्नी को समझाया
फोकट की मुस्कान मत बांटना
आने वाले को तरीक़े से काटना
उसकी औक़ात आंकना
जेब में झांकना
झांकते हुए लिफ़ाफ़े को
मन ही मन तोलना
सही तुले तो हंसकर बोलना
नहीं तो कसकर बोलना
अच्छा लगे या गंदा
यह है एक धंधा
धंधे का उसूल है मुनाफ़ा
आदमी की औक़ात
बताया है लिफ़ाफ़ा
बेटे को पढ़ाया
कोई ग्यारह इक्कीस दे
तो नाक भौं सिकोड़ना
एक सौ एक पर हाथ जोड़ना
पांच सौ पर पांव छूना
उत्साह दिखाना दूना
जब कोई सूट लाए
तेरे नाप का
तब हम बोलेंगे
जी यह बेटा है आपका
बेटे को जितना पढ़ाया
वह उससे भी निकला सवाया
जैसे ही कोई मेहमान टपकता
वह उसकी जेब पर लपकता
लपककर लिफ़ाफ़ा खोलता
खोलकर बोलता
पापा, टांय टांय फिस्स है
इसमें तो बस इक्कीस हैं
ग्यारह देखकर सन्न हो जाता
एक सौ एक पर प्रसन्न हो जाता
पांच सौ पर चरण स्पर्श करता
ग्यारह सौ पर हर्ष करता
सूट देखकर खो देता आपा
मुझे छोड़कर
देने वाले को कहता पापा
अंत में केक कटा
हैसियत के हिसाब से बटा
कोई भी पीस कम नहीं था
रुपए एक सौ एक से
लिफ़ाफ़े के नोट झांक रहे थे
कटे हुए केक से
यह सब दिल पर
छुरी चलने कमाल था
बेटा बोला, पापा एक सवाल था
मैं आपका प्यार हूं? परिवार हूं?
व्यापार हूं.?
नफ़ा नुक़सान मुनाफ़ा हूं
सच सच बताओ
मै बेटा हूं या लिफ़ाफ़ा हूं
मै आपका कौन हूं
इस सवाल जवाब में
मैं आज तक मौन हूं






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