कवि से छेड़- छाड़
कोई थोड़ा सा छेड़े और कोई ढ़ेर सारा छिड़ जाए, तभी छेड़छाड़ का असली आनंद है। मनोविनोद का तत्व छेड़छाड़ का आधार है। प्रेमी प्रेमिका, देवर भाभी, जीजा साली, समधी समधन के अलावा भी कुछ ऐसे रिश्ते हैं,...

डॉ कीर्ति काले
नई दिल्ली
कोई थोड़ा सा छेड़े और कोई ढ़ेर सारा छिड़ जाए, तभी छेड़छाड़ का असली आनंद है। मनोविनोद का तत्व छेड़छाड़ का आधार है। प्रेमी प्रेमिका, देवर भाभी, जीजा साली, समधी समधन के अलावा भी कुछ ऐसे रिश्ते हैं, जिन्हें छेड़-छाड़ का अघोषित लाइसेंस प्राप्त है।
समाज में एक विशेष वर्ग है जिसके साथ अक्सर समय से पहले छेड़-छाड़ प्रारम्भ हो जाती है। वो हैं लेखक और कवि। लेखक को सम्पादक छेड़ते हैं और कवियों को आयोजक।
सावन आने से पहले जब पेड़ों से पत्ते गिर रहे होते हैं, लू लपट चल रही होती है, सिर को गमछे से लपेटकर प्याज गले में लटकाकर गर्मियों की दोपहर पसीने से हलकान हो रही होती है, पतझड़ पूरे शबाब पर होता है। तब सम्पादक जी वाटसप पर मैसेज करके लेखक को छेड़ देते हैं। अगले महिने के सावन अंक के लिए रंगीला छबीला लेख भेजिए। मैसेज देखते ही लेखक ना नुकर तक नहीं कर पाता और खुशी खुशी छिड़ जाता है। छिड़ता भी है तो भेरेंट किस्म का। सम्पादक के मन में अपनी अहमियत का मन ही मन अनुमान लगाता हुआ लेखक फूला नहीं समाता। गिरे हुए सूखे पत्तों में उसे फूले हुए फूल दिखाई देने लगते हैं। लू की लपट भी सावनी बयार सी मादक लगने लगती है। नीरवता में तितलियों और भौरों की गुंजार सुनाई देने लगती है। हमेशा सूजा हुआ मुंह लेकर घूमने वाला सम्पादक सावन अंक के लिए खुद होकर वाटसप कर रहा है। एक स्वाभिमानी लेखक के लिए इससे बड़ी छेड़ कोई और हो सकती है भला! सम्पादक का वाटसप लेखक की लचीली रीढ़ के ऊपर रखी अकड़ीली गरदन को नरम कर देता है। लेखक सम्पादक की इस छेड़ से सम्मानपूर्वक छिड़ जाता है और पतझड़ के मौसम में कागज़ पर कलम से बहार लाने में भिड़ जाता है।
कवियों को छेड़ते हैं आयोजक। कवि सम्मेलनों के अभ्यस्थ कवि तो आयोजकों द्वारा छिड़ने के लिए तैयार ही बैठे रहते हैं। होली से दो महिने पहले फागुन का रंग कवि सम्मेलनों के घुटे घुटाए आयोजकों पर चढ़ने लगता है। भंग की तरंग में कवियों की धड़ाधड़ बुकिंग शुरू हो जाती है। होली कवियों का जबरदस्त वाला सीजन होता है। होली के बिल्कुल पहले और बिल्कुल बाद वाले शनिवार इतवार इस सीजन के एपी सेंटर कहे जा सकते हैं। जनवरी की कड़कड़ाती ठंड में होली की ठंडाई के साथ होने वाली कविताई और एवज में प्राप्त होने वाले लिफाफे के वजन की कल्पना मात्र से कवि का दिल बल्लियों उछलने लगता है। कैलेंडर की तारीखों पर गोल गोल गोलों के निशान जैसे जैसे बढ़ने लगते हैं, वैसे वैसे कवि की बार्गेनिंग पावर में उछाल आने लगता है। मार्च की दस तारीखें बुक होते ही अनुभवी कवि सतर्क हो जाते हैं और तुरंत प्रभाव से बाकी बची बीस तारीखों को भरने की जुगाड़ में लग जाते हैं। जिन तारीखों को भरने के लिए आयोजक उन्हें नहीं छेड़ते, उन तारीखों की गोद भराई के लिए कवि नि:संकोच आयोजकों को छेड़ने लगते हैं। वो न सुबह देखते हैं न दोपहर। न शाम देखते हैं न रात। आयोजकों के नम्बर खोज खोजकर उन्हें छेड़ते हैं। आयोजकों से दूर की रिश्तेदारियां निकालते हैं। इस चक्कर में कुछ आयोजक छिड़ भी जाते हैं। फलस्वरूप कैलेण्डर की तारीखों पर गोल गोल गोलों के निशानों में आशातीत बढ़ोतरी होने लगती है।
आयोजकों द्वारा अधिक से अधिक छेड़े जाने की आकांक्षा इतनी अधिक प्रबल हो जाती है कि कवि महोदय शौचालय में भी मोबाइल लेकर जाने लगते हैं। उन्हें आशंका रहती है कि कहीं ऐसा न हो कि यहां हम हल्के होने जाएं, वहां हमारा एक कवि सम्मेलन हल्का हो जाए। जनवरी की हाड़ कंपा देने वाली सर्दी में फागुन की मतवाली बयार का एहसास जीना कोई मंचीय कवियों से सीखे। रसिया और जोगीरा की लय ताल पर ताज़ातरीन राजनैतिक घटनाक्रम को फिल इन दि ब्लैंक्स की तरह भरते हुए मुंह से भांप निकालती हुई जनवरी में कवि और आयोजक परस्पर होली की रंगीली छेड़ छाड़ में मस्त हो जाते हैं। रसिया के साथ साथ शान से दुम उठाकर दुमदार दोहे भी गाते हैं।
पहले के ज़माने में लफंडर टाइप के कवि चुलबुली टाइप की कवयित्रियों को नैपथ्य में छेड़ते थे। कवयित्रियां शरमाने सकुचाने का नाटक करते हुए अंततः छिड़ ही जाती थीं। अब मामला उल्टा हो गया है। अब महिला सशक्त है, मुक्त है, आत्मनिर्भर है। अब वो इसकी राह नहीं देखती कि कोई उसे छेड़े तभी वो छिड़े। वो तो छिड़ने की पूरी सामग्री से लैस होकर कवि सम्मेलनों के मंचों पर जाती है। उसे कविता भले ही आए न आए, छेड़-छाड़ अवश्य आती है। आयोजक के दिल की बंद कली खिलती है जब नैपथ्य में नहीं भरे-पूरे मंच पर छेड़-छाड़जीवी कवयित्री स्वयं छिड़ने को लालायित मिलती है।
एक बार संचालक इतना सभ्य था कि उसने छेड़-छाड़जीवी कवयित्री को ससम्मान काव्यपाठ के लिए आमंत्रित करने का अपराध कर दिया। छेड़-छाड़जीवी कवयित्री इतने सम्मान की अभ्यस्त नहीं थी। मंच पर ही नाराज़ हो गई और स्वयं आगे होकर संचालक को छेड़ने लगी।
बदन होता है बूढ़ा दिल की फितरत कब बदलती है
पुराना कुकर क्या सीटी बजाना छोड़ देता है
टाइप के जुमले बोलकर भरी सभा में संचालक की मर्दानगी पर प्रश्नचिह्न खड़े करने लगी। सामने बैठी भीड़ संचालक को जवाब देने के लिए उकसाने लगी। मामला गरमा गरम हो गया। छेड़-छाड़जीवी कवयित्री अपने रंग में आई। संचालक के चुप रहने पर उसी ने बात आगे बढ़ाई।
कौन कहता है बुढ़ापे में प्यार का सिलसिला नहीं होता
आम तब तक मजा नहीं देता जब तक वो पिलपिला नहीं होता
श्रोताओं ने कवयित्री की निडरता पर निर्लज्जतापूर्वक उछल उछलकर तालियां बजायीं।
सभ्य संचालक शर्म से जमीन में गड़ा जा रहा था, लेकिन कवयित्री और चवन्नीछाप श्रोताओं को मजा आ रहा था। गम्भीर और साहित्यिक किस्म के श्रोताओं को ये तमाशा बिल्कुल नहीं भा रहा था, लेकिन वो विरोध नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि उनकी ज़ुबान को सभ्यता का लकवा मार गया था।
मैंने एक युवा कवयित्री से पूछा – आजकल क्या नया लिखा है?
वो बोली – छेड़-छाड़ लिखी है।
मैंने कहा – सुनाओ
उसने सुनाई
मैंने कहा – ये तो यू ट्यूब पर कई बार दिखी है
वो बोली – यूट्यूब पर देखकर ही तो मैंने लिखी है।
पहले कवि सम्मेलनों के आमंत्रण के पत्र आते थे और निरस्त होने की सूचना के टेलीग्राम भिजवाए जाते थे। कवि सम्मेलन फेल करने के लिए सूचना तंत्र की शिथिलता के साथ कुछ उपद्रवी लोकल कवि छेड़-छाड़ करते रहते थे। मसलन आमंत्रित कवियों को कवि सम्मेलन के निरस्त होने के झूठे टेलीग्राम भेजना या कवि सम्मेलन के आमंत्रण के फर्जी पत्र पोस्ट करना। मोबाइल क्रांति के दौर में इन लोकल डफाचूकों को दौरा पड़ गया और छेड़छाड़ पर लॉक लग गया।
बड़ा कवि भले ही बरसों तक नई कविता न लिखे, लेकिन लोग बड़े कवियों को छेड़ने की नई नई तरकीबें निकालते रहते हैं। पिछले दिनों लगभग सभी अन्तरराष्ट्रीय बड़े कवियों के पास एक रौबीला फोन आया। फोन करने वाले ने अपना नाम कर्नल सो एंड सो बताया। और कहा कि सैनिकों के मनोरंजन के लिए एक बहुत बड़ा कवि सम्मेलन आयोजित करने की योजना बन रही है। आप देश के नामचीन कवि हैं। हम चाहते हैं कि आप इस कवि सम्मेलन में सम्मिलित हों। कवि सम्मेलन बड़ा है यह सुनते ही कवि की जीभ लपलपाने लगी। बड़े कवि सम्मेलन का अर्थ बड़ा अर्थवान होता है। कविता का अर्थ जाने या न जाने, लेकिन नामचीन बनते बनते बड़े कवि सम्मेलन का अर्थ बड़ा कवि भलीभांति जानने लगता है। बड़ा कवि सम्मेलन यानी बड़ा लिफाफा।
जब से मानदेय शब्द को पेमेंट ने रिप्लेस किया है तब से लिफाफे का घूंघट भी हट गया है। पहले आयोजकों द्वारा लिफाफे के लिहाज में लजाता हुआ मानदेय दिया जाता था। कवि द्वारा चुपचाप रख लिया जाता था। घर पहुंचकर भी लिफाफे के नोट गिने नहीं जाते थे, लेकिन जब से अक्सर लिफाफों में नोट तय राशि से कम पाए जाने लगे, तब से लिफाफा मिलने पर कवि शौचालय का रुख अपनाने लगे। वहां ढक-छुपकर नोट गिनकर आने लगे। आजकल मानदेय नहीं कवियों का पेमेंट होता है, इसलिए लिफाफे का लिहाज भी रास्ते से हट गया है। अब पेमेंट मिलते ही बड़ा कवि आयोजक के सामने बड़ी शान से अंगूठे पर थूक लगा लगाकर नोट गिनता है और मन ही मन ये मुहावरा गुनता है कि हींग लगे ना फिटकरी और रंग चोखा। नोट गिनते गिनते बीच-बीच में आयोजक को इस निगाह से देखता है कि टिल्ली लिल्ली। एक भी कविता नहीं सुनाई फिर भी इतनी सारी कमाई। धन्य है शारदा माई।
नई तकनीक ने कवि सम्मेलन के बाद लिफाफे के नोट गिनने की मौज के साथ जबरदस्त किस्म की छेड़छाड़ कर दी है। जैसे शर्म, लिहाज, घूंघट, पर्दा हटा, वैसे ही कवि सम्मेलन से लिफाफा भी हट गया। अब तो डायरेक्ट का जमाना है। जो आना है वो डायरेक्ट खाते में आना है।
हां तो कर्नल साहब की रौबीली आवाज़ में मिले बड़े कवि सम्मेलन का निमंत्रण पाकर बड़े कवि का अपने पर नियंत्रण नहीं रहा। उसकी कल्पनाओं के घोड़े चारों दिशाओं में बेलगाम होकर दौड़ने लगे। बड़े दिनों से मर्सडीज लेने की इच्छा थी, मकान को तीन मंजिला कराना भी एक परीक्षा थी। बड़की को विदेश की यूनिवर्सिटी में दाखिला लेना था, छुटकी को बैटरी वाली इलैक्ट्रिक कार लेकर देना था। पत्नी को फॉरेन टूर पर ले जाना था, साली के लिए डायमंड नेकलेस मंगाना था। अब बड़ा कवि सम्मेलन खुद चलकर आया है। खुशियों की सौगात लाया है। कल्पना में खोया बड़ा कवि कुछ सोचता उसके पहले ही कर्नल साहब की रौबीली आवाज़ का रुआब ऐसा पड़ा कि बड़ा कवि कभी आसमान में उछला, कभी धरती में गड़ा। कर्नल साहब ने फ़रमाया कि पूरा पेमेंट एडवांस दिया जाएगा। हमारा असिस्टेंट आपको पूरी प्रक्रिया समझाएगा। बड़ा कवि इतने अनुभव के बावजूद लपेटे में आ गया। पेमेंट को लेकर न झिकझिक न मोल-भाव न खर खर। वाह रे दाता तेरी बड़ी मेहर। बड़े कवि सम्मेलन के चक्कर में बड़े कवि ने चार गुना पेमेंट बता दिया। असिस्टेंट ने प्रक्रिया समझाते हुए मोबाइल पर एक फॉर्म भेजा, जिसे भरने में घूम गया बड़े कवि का भेजा। इस कॉलम में फर्स्ट नेम भरना है उस कॉलम में सरनेम। अगले में उम्र बाद वाले में पिनकोड सहित पूरा पता। अब चौखानों में बैंक खाता नम्बर और पेमेंट की राशि अंकित करनी है। चक्कर खाए हुए कवि ने होशियार बनते हुए छः अंकों की राशि चौखानों में भर दी। मन ही मन फिर कल्पना की दौड़ शुरू कर दी। तभी असिस्टेंट ने कहा- आपके पास ओटीपी आया होगा। ओटीपी अगले खाने में डालिए। कल्पना के घोड़ों पर सवार बड़े कवि ने जैसे ही ओटीपी डाला, वैसे ही भयंकर छेड़-छाड़ हो गई। आयोजक के खाते से बड़े कवि के खाते में आने की बजाय छः अंकों की भरी-पूरी राशि बड़े कवि के खाते से फरार हो गई।
ऐसे भी दर्दनाक मंजर सामने आते हैं
जब समय समय पर कवियों को छेड़ने के लिए बड़े बड़े दैत्य भेजे जाते हैं
जो कभी कोरोना बनकर आते हैं, कभी चुनाव की आचार संहिता के नाम से जाने जाते हैं। दैत्यों के दबाव में जब कवि सम्मेलन धड़ाधड़ निरस्त होने लगते हैं। तब कवियों के परिवार जनों के मुंह से निवालों की दूरी बढ़ जाती है, दर्शकों की नजर में ये मौसम की छेड़-छाड़ कहलाती है।
नौ रसों का ज्ञाता साक्षात विधाता न हंसता है, न रोता है सच कहूं, मौसम द्वारा छिड़ा हुआ कवि ऐसा ही होता है।
फागुन आयो रे
घर-घर में मच गया शोर फागुन आयो रे ।
बहकी- बहकी है भोर फागुन आयो रे ।।
रंग-बिरंगी रंगो वाला मौसम है अलबेला ।
लाल-गुलाबी हरा बसंती काला पीला नीला
रंग बरस रहा चहुँ ओर कि फागुन आयो रे ।
महकी-महकी माटी लागे मीठी लागे गाली
लहकी-लहकी चाल सभी की जीजा हो या साली
छूटे मन के पतंग की डोर कि फागुन आयो रे ।
धरती अम्बर डगमग डोले जब छूटे पिचकारी
प्यार भरे पावन रंगो में भीगे दुनिया सारी
है ये प्यारी की ऋतु घनघोर कि फागुन आयो रे ।
गोकुल के मस्तों की मस्ती है जानी पहचानी
हर गोरी समझे है खुद को जैसे राधारनी
हर ग्वाल बना चितचोर कि फागुन आयो रे ।
कीर्ति काले






No Comment! Be the first one.