फ्रीबीज़: मुफ्त का रंग, बाद में पड़े तंग!
नेता’जी भी कम चतुर नहीं, ठेठ होलियाना अंदाज में जनता पर वादों की ऐसी पिचकारी चलाते हैं कि हर तरफ रंग ही रंग नजर आने लगता है—मुफ्त बिजली का गुलाबी, फ्री राशन का हरा, बेरोजगार भत्ते का पीला और मुफ्त...

राकेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
अगर होली से पहले चुनाव हों, तो नेताओं का दिल भी होली के रंगों की तरह बड़ा और रंगदार हो जाता है। फ्री बिजली, फ्री पानी, फ्री राशन, फ्री मोबाइल—सबकुछ उछाला जाता है, ठीक वैसे ही जैसे पिचकारी से रंग उड़ता है। जनता भी समझती है कि अबकी बार असली होली खेलेंगे, लेकिन जैसे ही सत्ता बदलती है, सरकार कहती है—”अरे भाई, पानी तो रंग में मिल गया, अब नल से नहीं आएगा!”
चुनाव जीतने के बाद सरकारें जो फ्री देने का वादा करती हैं, उसकी भरपाई जनता के टैक्स से ही होती है। फिर जनता अपनी ही जेब से भुगतान करती है और सोचती है, “यार, अबकी बार होली में हम फिर उल्लू बन गए!”
लोकतंत्र या ‘लोक तमाशा’
लगता है फ्रीबीज़ के इस रोग ने लोकतंत्र को “लोक-तमाशा” बना दिया है। पूरे पांच साल नेताओं की शक्ल देखने को तरसने वाली जनता चुनावी मौसम में खुद को ‘भाग्यवान’ समझने लगती है मानो कुबेर का खजाना तो बस उसी के घर पर गिरने वाला है। नेताजी भी होलियाना अंदाज में जनता पर वादों की ऐसी पिचकारी चलाते हैं कि हर तरफ रंग ही रंग नजर आने लगता है— मुफ्त बिजली का गुलाबी, फ्री राशन का हरा, बेरोजगार भत्ते का पीला और मुफ्त स्कूटी का आसमानी!
पुरानी कहावत है— ‘मुफ्त का चंदन घिस मेरे लाला… दो चार को और बुला ला।’ जनता भी इसी तर्ज पर अपने पूरे फगुआ मूड में होती है। नेताओं के वादों पर ऐसे लपकती है जैसे कोई होली पर मुफ्त गुझिया बांट रहा हो! कोई नेता कहता है, “हम हर घर टीवी देंगे!” तो जनता ऐसे झूम उठती है मानो अब अमिताभ बच्चन उनके घर पर साक्षात् ‘कौन बनेगा करोड़पति’ खेलने आ रहे हैं! मुफ्त बिजली के वादे पर जनता ऐसे नाचने लगती है जैसे जीवन में बस यही एक कमी थी।
करदाता की लट्ठमार होली
इन सब के फेर में बेचारा ईमानदार करदाता खुद ही अपने मुंह पर गहरा रंग पोत दुविधा में पड़ जाता है— “भाई, हम ही रंग डलवा रहे, हम ही पानी भर रहे, और रंगने का मजा कोई और ले रहा है!” मेहनत से कमाने वाले सोचते हैं कि वे गलत दुनिया में पैदा हो गए। यहां पसीना बहाने वाला टैक्स भरता है और फ्रीबी प्रेमी गुलछर्रे उड़ाने के लिए ‘प्रोत्साहन राशि’ पाते हैं! न चाहते हुए भी करदाता को लट्ठमार होली की लाठियां खानी पड़ती हैं।
इस लोकतंत्र की महिमा तो देखिए— जो जितना आलसी, वह उतना ही ‘भाग्यशाली’। सरकारी योजनाओं का असली लाभार्थी वही है, जो दिन भर नुक्कड़ पर बैठकर चाय सुड़कता है, सरकार को कोसता है और ‘अगली स्कीम’ की भविष्यवाणी भी करता है। गांव की चौपालों में इसी पर बहस छिड़ती है कि इस बार कौन सा फ्री माल मिलेगा? शहरों में चाय की दुकानों पर जश्न का माहौल रहता है— “पिछली बार स्कूटी मिली थी, इस बार लैपटॉप मिल जाए तो मजा आ जाए!”
माल—ए—मुफ्त पर होली की लूर
माल—ए—मुफ्त उड़ाने वाले नेताजी होली के रंग में सराबोर हैं— “हम फ्री सिलेंडर देंगे!” दूसरा ठंडाई गटकते हुए बोलता है, “अरे, हम तो गैस ही मुफ्त कर देंगे!” तीसरा मुंह में पान दबाते हुए बोलता है “भइया, हम मुफ्त में मकान देंगे!” चौथा अपनी पीली बत्तीसी दिखाते हुए बोलता है— “हम मकान में फर्नीचर भी मुफ्त देंगे!” जनता इन महाझूठों की घोषणा पर तालियां पीटते हुए ऐसे हुलसती है, जैसे फागुन में ढोलक की थाप पर लूर ले रही हो!
असली मजा तब आता है जब चुनाव खत्म होते ही नेताजी होली के रंग की तरह अचानक फीके पड़ जाते हैं! जो कल तक घर-घर जाकर मिठाई बांट रहे थे, वे चार साल तक अज्ञातवास में चले जाते हैं। हमारा “फ्रीबीज कहां हैं?” पूछने पर जनता को वही नेताजी ऐसे घूरकर देखते हैं जैसे होली के अगले दिन नहाने के बाद लोग अपनी हरकतों को भुलाकर कहते हैं— “भाई, हमसे कुछ गलती हो गई क्या?”
सवाल उठता है— क्या ये मुफ्त की सौगातें असली लोक-कल्याण है या सिर्फ वोट हथियाने का खेल? क्या बिना मेहनत किए केवल मुफ्त के सहारे कोई देश चल सकता है? नेताजी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, उन्हें तो सत्ता चाहिए। जनता को भी फर्क नहीं पड़ता, उसे तो मुफ्त चाहिए। रोता है बेचारा टैक्स भरने वाला जिसे कोई पूछ ही नहीं रहा!
फ्री का रंग, बाद में पड़े तंग!
अगली बार जब कोई आपको कहे, “भाई, ये फ्री में मिल रहा है”, तो पहले एक बार जरूर सोचिएगा— “आखिर इसकी असली कीमत क्या है?” होली के दिन कोई कहे, “आओ, मुफ्त में रंग लगवा लो!” तो मुफ्तखोर झटपट तैयार हो जाते हैं। लेकिन जब तक समझ आता है कि रंग के साथ-साथ कपड़े, बाल और इज्जत भी बर्बाद हो चुकी है, तब तक देर हो चुकी होती है। तो भाइयों और बहनों, होली खेलो, मज़े करो, लेकिन “फ्रीबीज़” से बचो। क्योंकि इस दुनिया में मुफ्त में सिर्फ रंग लगता है और फिर वो भी छुड़ाना मुश्किल हो जाता है!






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