भूल फागुन में
सच्चों का तो मैं हूं सदा क़ाएल, झूठे भी हैं क़ुबूल फागुन में।प्रेम के रंग तो यहां भी नहीं, गांव आया फ़ुज़ूल फागुन...

रितेश त्रिपाठी, बड़ौदा
ग़ज़ल :
भंग पीकर की भूल फागुन में,
बातें कर दी फ़ुज़ूल फागुन में।
सच्चों का तो मैं हूं सदा क़ाएल,
झूठे भी हैं क़ुबूल फागुन में।
प्रेम के रंग तो यहां भी नहीं,
गांव आया फ़ुज़ूल फागुन में।
आई है साली खेलने होली,
क्यों रहूं बा-उसूल फागुन में।
तोड़कर दिल हमारा हंसकर वो,
कहते हैं ‘जस्ट कूल’ फागुन में।
कल जो कोरोना में उदास-से थे,
खिल उठे हैं वो स्कूल फागुन में।
मां के आने से घर में है जैसे,
नेमतों का नुज़ूल फागुन में।
चाहता है ‘ऋतेश’ बस इतना,
हो न कोई मलूल फागुन में।
2
प्यार उसका लगता है वैसे तो चंदन की तरह।
किन्तु लड़ भी लेती है वो एक नागन की तरह।
देखने में श्रीमती लगती है सज्जन ही मगर,
पर्स मेरा खाली कर देती है रहज़न की तरह।
मैं मुहब्बत जब जताऊं कहती है चिल्लाके वो,
मेरे मुंह क्या लगते हो तुम दंतमंजन की तरह।
क्या गजब का दौर फैशन का चला है देश में,
अब नयी पतलून भी लगती है उतरन की तरह।
बेबी बेबी बोलकर मैडम बुलाती है हमें,
हाल अपना है बुढ़ापे में भी बचपन की तरह।
जाने किस चक्की का आटा खाती हेमा मालिनी,
होके सत्तर की भी वह लगती है पचपन की तरह।
इसलिए ही दर्द मेरा दिख नहीं पाता ‘ऋतेश’,
मेरे चेहरे पर हंसी रहती है चिलमन की तरह।
3
उसका मेरे दिल को यूं ही तोड़ना अच्छा लगा
तोड़कर दिल ‘जस्ट चिल’ फिर बोलना अच्छा लगा ।
इस अदा से प्लीज़ तुमने बोला मुझको बार बार
झूठे बर्तन भी तुम्हारे मांजना अच्छा लगा।
बढ़ती मंहगाई ने मेरा दिन बनाया इस तरह
हां पड़ोसन का टमाटर मांगना अच्छा लगा।
‘बाय हेन्डसम ‘ चलते चलते उसने मुझको क्या कहा,
आज पहली बार मुझको आइना अच्छा लगा।
पीछे मुड़ मुड़ के वो उसका देखना मुझको गजब
उसके पीछे धूप में भी दौड़ना अच्छा लगा।
ट्रेन चलने के लिए जब मारने सीटी लगी,
झूठा झूठा उसका मुझको रोकना अच्छा लगा ।
दो बजे जब रात को बिजली हुई थी गुल तभी,
सामनेवाली का छत पर घूमना अच्छा लगा।
खूब हॉरर फिल्में मैंने देख रक्खी थी अतः,
पत्नी का घूंघट हटा कर देखना अच्छा लगा।
बारिशों में भीगकर बीमार सब होने लगे
डाक्टर को लोगों का वो भीगना अच्छा लगा
चोर नेताओं को लेकर जाती कश्ती पलटी जब,
माँ कसम उस नाव का तब डूबना अच्छा लगा ।
इक से बढ़कर एक ग़म हमको सताते थे “ऋतेश”
आपको पाकर हरिक ग़म भूलना अच्छा लगा।
4
तेरी ज़ुल्फ़ों की काली रात में रहकर हुआ घाटा,
मेरी हड्डी लगी दुःखने, विटामिन डी हुआ आधा।
तू हंसकर देखती जब भी, मुझे लगता है तब ऐसा,
पकड़ने के लिए मछली, किसी ने डाला है कांटा।
ये लड़के लड़कियों के हॉस्टल को देखते ऐसे,
बटर रोटी की जानिब देखता हो ज्यों कोई भूखा।
मुझे डर है कि दोनों ने कहीं कर ली न हो शादी,
तेरी मुर्गी हुई गायब, मेरा मिलता नहीं मुर्गा।
मेरी डीपी वो अक्सर ज़ूम कर के देखती रहती,
मगर जब पास आता हूँ तो कहती है मुझे भैया।
मचलता था, उछलता था, जिसे छूने को मेरा दिल,
उसी ने अपने बच्चे से मुझे बुलवा दिया मामा।
बनाती रील वो जब भी तो यह भी भूल जाती है,
बिचारा भूखा है बच्चा, पकाना है अभी खाना।
कुरेदे जा रही है घावों को यह पूछकर साली,
“मेरी दीदी से कर के आप शादी ख़ुश तो हो जीजा? “
मैं इस कारण भी देखा करता हूं औरों की पत्नी को,
हमेशा दूजे की गलती पे हंसना लगता है अच्छा।
बनाने राम बेटे को, पढ़ाई उसको रामायण,
असर इसका हुआ उल्टा, वो रावण-सा मगर निकला।
मुझे तबसे दवाओं की ज़रूरत कम ही पड़ती है,
हंसाकर लोगों को जबसे मैं ख़ुद भी ख़ुश रहा करता।






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