मुझ पर तेरा गुलाल
तुम बिन फीके ही लगे, ये होली के रंग । हर दिन ही त्यौहार है, तुम जो मेरे संग ।।

दिनेश सिंदल, जोधपुर
- मुझ पर तेरा गुलाल
होली पर मैं हो गया, अब के मालामाल।
सारी दुनिया छोड़कर, मुझ पर तेरा गुलाल ।।
तन रंगों से रच गया उस पर बाजी चंग।
मन छूटा फिर हाथ से, जैसे कटी पतंग ।।
होली पर यूं दोस्तों, जीती मैने जंग।
वो सब मेरा हो गया, जिस पर मेरा रंग ।।
तुमने अपने प्यार का, कर डाला इजहार ।
फागुन की पिचकारियां, मुझ पर कईं हजार ।।
होली पर मुझको मिला, अब के ये उपहार।
मन की कोरी स्लेट पर, तेरे रंग हजार।।
- तुम जो मेरे संग
तुम बिन फीके ही लगे, ये होली के रंग ।
हर दिन ही त्यौहार है, तुम जो मेरे संग ।।
आधे मन पूरे हुए, तन परकोटा फांद ।
होली को कब दोस्तों, भाया आधा चांद ।।
हवा निगोड़ी यूं चली, घूंघट दिया उछाल।
गोरी के रंगे बिना, गाल हो गए लाल ।।
सतरंगी तेरी चुनर, गाल सुर्ख कचनार ।
तुम बिन कैसे आएगा, रंगों का त्यौहार ।।
मन पर मेरे है चढ़ा, जब से तेरा रंग।
क्यों खेलूं होली बता, अब दुनिया के संग।।
3 जैसे कटी पतंग
सुध- बुध खोई प्यार में, पीकर तेरी भंग।
तेरी बाहों में गिरी, जैसे कटी पतंग ।।
गीत रचूं मैं सजना, तू दे उसको राग ।
तब पूरा होगा यहां, ये होली का फाग।।
दुनिया पर सब रंग थे, हरा गुलाबी लाल।
मैने तेरे प्यार का, रक्खा रंग सम्भाल।।
दूर कहीं बजाते सुने, जब होली के गीत।
याद आई अपनी मुझे, पहली पहली प्रीत ।।
मिलकर दोनों हो गए, जैसे ही इकरंग।
हम दोनों के गीत अब, गाती है यह चंग।।
4 कोयलिया की कूक
मन ने मन से प्रेम की, बात करी दो टूक।
फागुन में सुन पेड़ पर, कोयलिया की कूक।।
धानी चुनर ओढ़कर, धरा सजाए सेज।
रंगता तन – मन साथ में, ये फागुन रंगरेज।।
मौसम चाहे हो भले, कितना ही प्रतिकूल
फागुन में खिल जाएंगे, ये टेसू के फूल ।।
लाल, गुलाबी, बैंगनी, तन पर डाले रंग।
मन पर कैसे डालता, जो था मन के संग।।
तुमसे ही तो रंग है, तुमसे गीत हजार।
तुम बिन कैसे आएगा, होली का त्यौहार।।
5 जब हो तेरा दीद
होली, दीवाली यहां, बैसाखी औ’ ईद।
मन जाए त्यौहार सब, जब हो तेरा दीद।।
समझाता है ये हमें, होली का त्यौहार।
तुम रंगों के नाम पर, बाँटों सबको प्यार।।
नशा प्रेम का सब करें, घुटे चकाचक भंग।
नाचे होली- ईद में हिंदू- मस्लिम संग ।।
गाती है हरदम यहां, ये होली की चंग।
सब के होठों गीत हो, सबके तन पर रंग।।
दुनिया चाहे डाल दे, उस पर रंग हजार।
दूजा उस पर क्या चढ़े, चढ़ता जिस पर प्यार।।
6 जल जाता प्रहलाद
होली हो की साँच की, मत कर उसको याद।
अब हंसती है होलिका, जल जाता प्रहलाद।।
समझाती मुझको यहां, ये होली की आग।
पहले जलना है तुझे, फिर होंठों पर फाग।।
मन पर मन भर मैल था, तन पर मला गुलाल।
सात स्वरों में खो गए, होली के स्वर – ताल ।।
थे उधार के रंग सब, थी उधार की भंग।
होली की इस बार तो, फीकी रही तरंग।।
दिल में तो जलती रही, है होली की आग।
होंठों से गाते रहे, हम पानी का राग।।
7
लगे आपको गालियां, ये होली के गीत।
इन में देखी है मगर, हमने केवल प्रीत।।
चेहरे सब काले मिले, मन यूं हुआ अधीर।
अबके फागुन में मिले, किसके रंग- अबीर।।
अब तक तो चलते रहे, धूप- छांव के संग।
आई बारिश क्या करे, कच्चे जिनके रंग।।
हरा, गुलाबी, बैंगनी, नीला, पीला, लाल।
रंग सभी तेरे लिए, हमने रखे सम्भाल।।
सच हमसे ये अंत तक, करता है संवाद।
जल जाती क्यों होलिका, बच जाता प्रहलाद।।






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