राजस्थान की राजनीति: सत्ता-संगठन की रस्साकशी और नए समीकरण
राजस्थान की राजनीति इस समय नए मोड़ पर खड़ी है। बजट सत्र के साथ सरकार ने अपनी प्राथमिकताएं जाहिर कर दी हैं, तो विपक्ष भी नए तेवर के साथ सरकार को घेरने में जुटा...

विवेक श्रीवास्तव
वरिष्ठ पत्रकार
राजस्थान की राजनीति इस समय नए मोड़ पर खड़ी है। बजट सत्र के साथ सरकार ने अपनी प्राथमिकताएं जाहिर कर दी हैं, तो विपक्ष भी नए तेवर के साथ सरकार को घेरने में जुटा है। सियासी गलियारों में संगठन और सत्ता के बीच सामंजस्य की बातें हो रही हैं, लेकिन असल सवाल यह है कि मलाई किसे मिलेगी? इस हफ्ते की राजनीति में कई रोचक घटनाक्रम सामने आए, जो सत्ता-संगठन की रणनीति, विपक्ष की नई चालों और प्रशासनिक फेरबदल की चर्चाओं को हवा दे रहे हैं।
भजनलाल सरकार का बजट और सियासी संदेश
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की सरकार ने बजट पेश कर यह साफ कर दिया कि उनका फोकस विकास, रोजगार और कल्याणकारी योजनाओं पर रहेगा। हालांकि, बजट सिर्फ आर्थिक दस्तावेज नहीं होता, बल्कि यह राजनीतिक संकेतों का भी माध्यम होता है।
रोजगार की बड़ी घोषणा, विपक्ष को चौंकाया
बजट सत्र में जब सरकार ने सवा लाख सरकारी नौकरियों और डेढ़ लाख निजी नौकरियों की घोषणा की, तो विपक्ष सकते में आ गया। डिप्टी सीएम और वित्त मंत्री ने जोर देकर कहा कि यह संख्या आगे चलकर चार लाख तक भी पहुंच सकती है। इस दौरान वित्त मंत्री की मंद मुस्कान ने भी कई संकेत दिए। कुछ लोगों का कहना है कि यह मुस्कान सरकार की आत्मविश्वास भरी प्रस्तुति का हिस्सा थी, तो कुछ इसे विपक्ष की घेराबंदी में मिली जीत का भाव मान रहे हैं।
ब्यूरोक्रेसी में हलचल, बड़े बदलाव के संकेत
बजट के बाद प्रशासनिक फेरबदल की चर्चाएं तेज हो गई हैं। सरकार अब तेज रफ्तार में फैसले लेने के मूड में है। लेकिन इस दौरान एक खास बात सामने आई—बजट पेश होने के दिन ब्यूरोक्रेसी का एक महत्वपूर्ण चेहरा सदन में नहीं दिखा। सत्ता के गलियारों में यह चर्चा गर्म रही कि आखिर यह नौकरशाह कहां हैं और क्या यह संकेत है कि सरकार जल्द ही ब्यूरोक्रेसी में बड़े बदलाव करने जा रही है?
वैसे भी बड़े बुजुर्ग कह गए है कि शिखर पर पहुँचने से ज़्यादा मुश्किल उसपर बने रहना होता है!
संगठन बनाम सत्ता: मलाई किसे मिलेगी?
राज्य में संगठन और सत्ता के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। मंत्री किरोड़ीलाल मीणा के नोटिस का क्या होगा, इस पर ब्यूरोक्रेसी भी नजरें गड़ाए बैठी है। उधर, बजट पेश होने के दिन बाबा किरोड़ी मीणा प्रयागराज में कुंभ स्नान करते नजर आए, जिससे राजनीतिक गलियारों में उनके रुख को लेकर अटकलें तेज हो गईं।
सरकार और संगठन के बीच इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि फैसले लेने का असली हकदार कौन है? मलाई किसे मिलेगी, यह सवाल सत्ता पक्ष के भीतर भी सुगबुगाहट पैदा कर रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि संगठन में कुछ चुनिंदा चेहरे ही काम की गारंटी लिए जा रहे हैं, जिससे बाकी लोग असंतुष्ट हैं।
नोटिस की चिंगारी और संगठन की रणनीति
राजनीति में कभी-कभी अनिर्णय भी एक रणनीति होती है। किरोड़ी मीणा को ‘उग्र नेता’ बताते हुए उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग उठी थी, लेकिन जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं हुआ। तीन दिन का जवाब मांगकर संगठन ने कछुआ चाल अपनाई, ताकि मामला सुलझ भी जाए और संगठन का अनुशासन भी बरकरार रहे।
इसी दौरान, विधानसभा घेरने वाले लोगों को एक बड़े नेता ने नसीहत देते हुए कह दिया—“मेरा नाम मत लिखो, मैं तो संगठन का आदमी हूं।” इस बयान के कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने मामले में एक कदम आगे बढ़ते हुए नरेश मीणा के परिवार को जयपुर बुलाकर मुलाकात की और घेराव को स्थगित करा दिया। इससे सरकार की संकट प्रबंधन नीति पर भी चर्चा शुरू हो गई।
नर्मदा यात्रा: कांग्रेस की नई सियासी चाल?
राजनीति में रणनीति के तहत यात्राएं कराई जाती हैं। कांग्रेस में भी अंदरूनी खींचतान जारी है। गमछा पार्टी को किनारे करने की रणनीति पर काम चल रहा है।
दिल्ली से एक नई सियासी चाल चली गई और पश्चिमी राजस्थान के हरीश चौधरी को नर्मदा यात्रा पर भेज दिया गया। इसका सीधा मकसद था—नेता की लोकप्रियता को संभालना और नए समीकरण गढ़ना। दिलचस्प बात यह रही कि कभी उनके गुरु रहे बड़े नेता ने इस राजनीतिक यात्रा पर कोई व्यक्तिगत बधाई नहीं दी। राजनीतिक विश्लेषक इसे गुरु-शिष्य की बढ़ती दूरी के संकेत के रूप में देख रहे हैं।
विधानसभा में हंगामा और निलंबन
बजट सत्र के दौरान राजनीति का पारा तब चढ़ा, जब मंत्री अविनाश गहलोत ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को “आपकी दादी” कहकर संबोधित कर दिया। कांग्रेस इस बयान से भड़क उठी और प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा समेत कई विधायक वेल में पहुंच गए।
भाजपा ने इस हंगामे को आसन के साथ दुर्व्यवहार करार दिया और निलंबन प्रस्ताव पारित करवा दिया, जिससे डोटासरा समेत छह विधायकों को सत्र से बाहर कर दिया गया। कांग्रेस ने विरोध में विधानसभा में रातभर धरना दिया और भजन गाए। यह दिलचस्प था, क्योंकि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने पहले ही विपक्ष को भजन करने की सलाह दी थी।
केसरिया पार्टी में जिलों की कुर्सी का खेल
भाजपा में जिला अध्यक्ष बनना अब मंत्री बनने से भी मुश्किल हो गया है। संगठन के भीतर इसे लेकर भारी मंथन हुआ। जयपुर में सबसे अधिक लोग इस पद के लिए कतार में थे, लेकिन टिकट उन्हीं को मिला, जिनकी गोटियां सही जगह फिट हो गईं। इस बार भी पार्टी ने संगठन के भीतर ही एक अनुभवी व्यक्ति को यह जिम्मेदारी दी।
सवाल यह उठ रहा है कि आखिर किसके कहने पर नियुक्तियां हुईं? कौन है वह प्रभावशाली व्यक्ति जिसने संगठन को अपनी ओर झुका लिया? सत्ता के गलियारों में यह सबसे बड़ा राजनीतिक पहेली बन गया है।
क्या होगा आगे?
राजस्थान की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर रही है।
1. ब्यूरोक्रेसी में बड़े बदलाव: बजट के बाद नौकरशाही में व्यापक फेरबदल की उम्मीद है।
2. संगठन और सत्ता के बीच समन्वय: भाजपा के भीतर यह देखना दिलचस्प होगा कि मलाई किसे मिलेगी और किसे दरकिनार किया जाएगा।
3. कांग्रेस की रणनीति: विपक्ष का अगला कदम क्या होगा? क्या वे आक्रामक रणनीति अपनाएंगे या नई राजनीतिक चाल चलेंगे?
4. विधानसभा की राजनीति: क्या भाजपा और कांग्रेस के बीच टकराव और बढ़ेगा?
भजनलाल सरकार अब पूरी तरह टॉप गियर में है, जबकि विपक्ष भी नई रणनीति के साथ वापसी करने की कोशिश कर रहा है। आने वाले दिनों में राजस्थान की राजनीति में और दिलचस्प मोड़ आ सकते हैं।






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