सब जग होरी, या ब्रज होरा
प्रेम का एक अपना अनुशासन है। प्रेम की अपनी मर्यादा है। सदियों से भगवान राधा-कृष्ण के इसी अटूट प्रेम और समर्पण की असंख्य कहानियां हमारे विपुल साहित्य और इतिहास के पन्नों पर दर्ज...

-हरीश मलिक-
वरिष्ठ पत्रकार
कुदरत मुस्करा रही है। पौधों पर नई कोपलें निकली हैं। खेत-खलिहान और घर-आंगन में कई रंगों के फूल खिले हैं। पीली सरसों मन मोह रही है। नये सृजन को कायनात तैयार है। जैसे कुदरत अपनी केचुली बदल रही है। वासंती बयार चारों ओर अपनी मोहक अदाएं दिखा रही है। ऐसे में जंगल में मोर ही नहीं, मन-मयूर का भी नाच उठना स्वभाविक है। अपने आसपास वसंत को महकते देखिए। महसूस कीजिए कि कुदरत वसंत के रंग में रंगी है। सारी कायनात मुस्कराकर निश्छल प्रेम को बयां कर रही है। उसी प्रेम को जो सदियों से है। प्रेम का एक अपना अनुशासन है। प्रेम की अपनी मर्यादा है। सदियों से भगवान राधा-कृष्ण के इसी अटूट प्रेम और समर्पण की असंख्य कहानियां हमारे विपुल साहित्य और इतिहास के पन्नों पर दर्ज हैं।
मुरली मनोहर कान्हा और श्रीजी के इसी अद्भुत और अलौकिक प्रेम का एक रंग है ब्रज की होली। उनके किशोरवय रूप के हास-परिहास और अल्हड़ मस्ती का सम्मान है ब्रज की होली। गोपियों और ग्वालों की पिचकारी के बीच लठमार और छड़ीमार का नाम है ब्रज की होली। होली के रंगे में डूबे हुरियार के जोश और हुरियारिनों के प्रेमल उल्लास का नाम है ब्रज की होली। टेसू के फूलों से बने प्राकृतिक रंगों से रंगे खिलखिलाते चेहरों का नाम है ब्रज की होली… और बसंत पंचमी से लेकर फाल्गुन पूर्णिमा तक ब्रज के मंदिरों और कृष्ण लीलास्थलों पर उड़ते अबीर-गुलाल के बेशुमार बादलों का नाम भी है ब्रज की होली।
इंद्रधनुषी रंगों का पर्व होली हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है। पूरे भारतवर्ष में यह रंगोत्सव बेहद धूमधाम के साथ मनाया जाता है। लेकिन कान्हा की लीलास्थली ब्रज में इसका अलग ही जोश और उत्साह देखने को मिलता है। वसंत पंचमी से ब्रज में होली की शुरुआत करने की परम्परा एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व रखती है। इसे लेकर कई धार्मिक आख्यान और लोककथाएं भी प्रचलित हैं, जो इस खास दिन से होली के उत्सव की शुरुआत को जोड़ती हैं। भगवान श्री कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा और ब्रज में यह रंगोत्सव 40 दिनों तक मनाया जाता है। इसकी शुरुआत वसंत ऋतु के प्रवेश करते ही हो जाती है। वसंत पंचमी पर ब्रज के कई मंदिरों में और होलिका दहन स्थलों पर होली का ढांडा (लकड़ी का टुकड़े, जिसके चारों ओर जलावन लकड़ी, कंडे, उपले आदि लगाए जाते हैं) गाड़े जाने के साथ ही इस रंगोत्सव की शुरुआत हो जाती है।
वसंत का चरमोत्कर्ष होली मन को आनंदित करने वाला त्योहार है। ब्रज में होली जितनी तरह से मनाई जाती है, उतने प्रकार से विश्व में कहीं नहीं मनाई जाती। यहां रंगों की होली, गुलाल की होली, लठमार होली, लड्डूमार होली, फूलों की होली, गोकुल की छड़ीमार होली, होलिका दहन, कीचड़ की होली, धुलेंडी, अबीर की होली, दही और हल्दी की होली मनाई जाती है। इसके साथ ही होली पर मुखराई का चरकुला नृत्य, भगवान बलदाऊ एवं रेवती मैया के श्रीविग्रह के समक्ष बलदेव का प्रसिद्ध हुरंगा, मंदिरों में फाग और समाज गायन, फालैन में होली से पंडा का गुजरना सहित दर्जनों तरीकों से होली के उल्लास को जीवंत किया जाता है। ब्रज में खासतौर से लोग मथुरा, वृंदावन, बरसाना, नंदगांव, गोकुल, दाऊजी की होली देखने आते हैं। बरसाना की लड्डू होली जग प्रसिद्ध है, जो लठमार होली से एक दिन पहले मनाई जाती है। इस दिन टनों लड्डू राधारानी मंदिर के परिसर में लुटाए जाते हैं।
धार्मिक परम्परा के अनुसार वसंत पंचमी के दिन मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर, वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर, बरसाना में राधारानी मंदिर समेत कई मंदिरों में सुबह की आरती के बाद सबसे पहले भगवान को गुलाल का टीका लगाकर होली के इस पर्व का शुभारम्भ करते हैं। इस दिन मंदिर में श्रद्धालुओं पर भी जमकर गुलाल उड़ाया जाता है। वसंत पंचमी से भगवान कृष्ण की होली के खेल की शुरुआत मानी जाती है और इसे श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ रंग खेलते हुए प्रेम और उल्लास का संदेश दिया था। ऐसे में ब्रजवासियों के लिए वसंत पंचमी से ही होली का पर्व शुरू हो जाता है। यह होली भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम, आनंद और रंगों के खेल का प्रतीक मानी जाती है। इसके बाद रंगपंचमी वाले दिन इस रंगोत्सव का समापन होता है।
होली के जितने रंग हैं, ब्रज में उससे ज्यादा उसे मनाने के निराले ढंग हैं। ब्रज की होली एक खास विशेषता यह भी है कि यहां होली खेली-मनाई ही नहीं जाती, बल्कि गाई भी जाती है। होली का वर्णन रसिक संतों और अष्ट छाप के कवियों ने भी अपनी वाणी में किया है। ढांडा गढ़ने के साथ ही मंदिरों में रोज सुबह-शाम होली के गीतों का गायन भी आरंभ हो जाता है। इसके कई मनभावन होली गीत हैं, जो इन दिनों ब्रजवासियों की जुबां पर रहते हैं। इनमें ‘आज बिरज में होरी रे रसिया, होरी रे रसिया बरजोरी रे रसिया, कौन के हाथ कनक पिचकारी, कौन के हाथ कमोरी रे रसिया’। ‘होरी खेलन आयौ श्याम, आज याहि रंग में बोरौ री, कोरे-कोरे कलश मंगाओ, रंग केसर घोरौ री’। ‘नैनन में पिचकारी दई, मोय गारी दई, होरी खेली न जाय, होरी खेली न जाय’ आदि प्रसिद्ध हैं। ऐसे ही कई गीत होली को और खास बनाते हैं। ये गीत ब्रज में ही नहीं, बल्कि कई और प्रदेशों की होली के अवसर पर सुनने को मिलते हैं। ब्रज भाषा साहित्य में होली संबंधी पदावलियों का उल्लेख प्रचुरता से मिलता है। पिछले लगभग 500 वर्षों में विभिन्न वैष्णव परम्परा से जुड़े रसिक संतों, कवियों ने ब्रज की होली को विविधताओं के साथ लिखा और गाया है।
आइए, ब्रज की कुछ प्रसिद्ध होली के बारे में भी जान लेते हैं…
बरसाना की लठमार होली
राधा रानी की जन्मस्थली बरसाना की होली की अनोखी छटा दूर- दूर तक फैली है। बरसाना में होली का मजा कुछ और ही है। हर किसी के मन में बरसाना में होली मनाने की इच्छा रहती है। लठमार होली से पहले यहां लड्डूमार होली होती है। यह होली श्री राधा रानी के श्रीजी मंदिर में खेली जाती है। बरसाने की लठमार होली भगवान कृष्ण के काल में उनके द्वारा की जाने वाली लीलाओं का एक हिस्सा है। जिस परम्परा को आज भी यहां के ‘गोप-गोपियां’ जीवंत कर रहे हैं। नंदगांव से कान्हा अपने गोप-ग्वालों के साथ होली खेलने बरसाना जाया करते थे। इस दिन नंदगांव से आए ग्वालों पर बरसाना की ग्वालिनें लठ बरसाकर होली खेलती हैं। उनके हास-परिहास के बीच उन्हें सबक सिखाने के लिए राधा और गोपियां उन पर प्रेमल हृदय से लठ बरसाती थीं। इससे बचने के लिए वह ढालों का उपयोग किया करते थे, जो धीरे-धीरे होली की परंपरा बन गई। आज बरसाना की लठमार होली देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है।
बलदेव का हुरंगा
बलदेव के दाऊजी मंदिर में कृष्ण और बलदाऊ के स्वरूप में मौजूद गोप-ग्वाल (बलदेव कस्बे के अहिवासी ब्राह्मण समाज के पंडे) राधारानी की सखियों संग होली खेलते हैं। यह सिलसिला बलदाऊ से होली खेलने की अनुमति लेने के साथ शुरू होता है। देवर के रूप में आए पुरुषों का दल एक तरफ, तो भाभी के स्वरूप में मौजूद समाज की महिलाओं का दल दूसरी ओर होता है। दोनों ओर से पहले होली की तान और गीतों के माध्यम से एक-दूसरे पर छींटाकशी होती है। इसके बाद महिलाओं पर रंग बरसता है। जवाब में महिलाएं पुरुषों के कपड़े फाड़कर उनका पोतना (कोड़े जैसा गीला कपड़ा) बनाती हैं और उन पर बरसाती हैं। होली के रंगे में डूबे हुरियार जोश और उल्लास का पर्व मनाते हैं।
छड़ी मार होली
गोकुल में लाठी की जगह छड़ी से होली खेली जाती है। यहां छड़ीमार होली के दिन गोपियों के हाथ में लट्ठ नहीं, बल्कि छड़ी होती है और ये होली खेलने आए कान्हा के स्वरूपों पर छड़ी बरसाती हैं। इस दिन कान्हा की पालकी और पीछे सजी-धजी गोपियां हाथों में छड़ी लेकर चलती हैं। गोकुल में छड़ीमार होली का उत्सव सदियों से चला आ रहा है। ब्रज में होली खेलने के दौरान गालियां भी सुनाई जाती हैं। ब्रज गोपिका उलाहने के रूप में प्रेम पगी गाली देती हैं।
श्री द्वारकाधीश मंदिर होली
होलिका दहन के अगले दिन धुलेंडी होती है। इस दिन पूरे ब्रज में सभी ब्रजवासी एक दूसरे को रंग और गुलाल लगाते हैं व गले मिलते हैं। सभी मंदिरों में होली होती है। मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर में भी इस दिन होली का विशेष आयोजन होता है। इस दिन वृंदावन में परम्परा है कि दोपहर 2 बजे तक ही होली होती है। उसके बाद लोग नए-नए कपड़े पहनकर मंदिर जाते हैं।
होलिका दहन
पूरे ब्रज में होलिका दहन को विधि-विधान से मनाया जाता है। ब्रज क्षेत्र में हर गांव, कस्बे और शहर के चौराहों पर लकड़ियों, घास, फूस, गाय के गोबर से बने उपलों, गूलरी आदि की होली रखी जाती है। सुबह घरों से महिलाएं नए-नए कपड़े पहनकर होली पूजन करने जाती हैं। उसके बाद शाम को शुभ मुहूर्त में होलिका दहन किया जाता है।
यह सनातन सत्य है कि होली की बात हो और ब्रज का नाम न आए, ये तो हो नहीं सकता। ब्रज की होली के बारे में प्रसिद्ध है कि जहां देश भर में होली अधिकतम 3-5 दिन तक तक मनाई जाती है। वहीं ब्रज क्षेत्र में इस त्योहार के अबीर-गुलाल और रंग 40 दिन तक उड़ते हैं। इसीलिए यहां की होली पर एक कहावत सटीक बैठती है- सब जग होरी, या ब्रज होरा!






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