होली हो तो राज साहब जैसी हो
उनके यहां होली के दिन पूरी फिल्म इंडस्ट्री उमड़ने से कपूर परिवार से ही नहीं,बाकी कई फिल्म हस्तियाँ भी परस्पर मिल लेती थीं । इसलिए हर कोई होली के दिन आर के स्टूडियो में खिंचा चला आता...

सुधांशु टाक
लेखक, समीक्षक
1950 के दशक की शुरुआत । हिंदी सिनेमा के शोमैन राज कपूर की फिल्म “आवारा” सुपरहिट साबित हो चुकी थी । देश ही नहीं विदेशों तक में इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता की नई गाथा लिख डाली थी । उनके द्वारा स्थापित आर के स्टूडियो की चर्चा देश विदेश में थी । मार्च महीने की शुरुआत थी । “आवारा” के बम्पर हिट होने से राज कपूर बेहद खुश थे । उन्होंने अपने पिता पृथ्वीराज कपूर की अनुमति से आर के स्टूडियो में सामूहिक होली मनाना शुरू करने की अनुमति मांगी । पृथ्वीराज कपूर भी अपने होनहार बेटे के इस कदम से बहुत खुश हुए । उन्होंने कहा जश्न भव्य होना चाहिए । अब राज कपूर के पास आर के स्टूडियो के लम्बे चौड़े परिसर में न तो जगह की कोई कमी थी । न ही उनके बड़े दिल में । वह होली के इस दिन मेहमान नवाजी पर दिल खोल कर खर्च करते थे । कितने ही लोगों को होली के दिन अपने यहां दावत देने के निमंत्रण देने का काम वह कई दिन पहले ही शुरू कर देते थे ।
सबसे बड़ी बात यह थी कि सभी धर्म के लोग इस होली में आते थे । फिर कुछ ऐसा बन गया था कि किसी को राज कपूर का इसके लिए बुलावा भी नहीं आता था तब भी वह वहां निसंकोच चला आता था । असल में कई बार तो उस होली पर वह अगले बरस की होली का निमंत्रण भी तभी लोगों को दे देते थे । राज कपूर ने यूं तो तभी नए नए शिखर छूना शुरू किया था लेकिन वह तब भी जमीन से जुड़े व्यक्ति थे । अपने यहां आए हर मेहमान के सम्मान और उनके खाने-पीने का राज कपूर खुद पूरा ख्याल रखते थे ।
राज कपूर बेहद सफल और लोकप्रिय अभिनेता, निर्माता, निर्देशक होने के साथ सर्वाधिक प्रतिष्ठित फिल्म घराने के रूप में स्थापित हो गए थे । इसलिए हर कोई उनसे मिलना-जुलना चाहता था। साथ ही उनके यहां होली के दिन पूरी फिल्म इंडस्ट्री उमड़ने से कपूर परिवार से ही नहीं,बाकी कई फिल्म हस्तियाँ भी परस्पर मिल लेती थीं । इसलिए हर कोई होली के दिन आर के स्टूडियो में खिंचा चला आता था।
इस होली से कई हस्तियों की अविस्मरणीय यादें भी जुड़ी है ।उस जमाने में जिस भी छोटे-बड़े कलाकार को राज कपूर के यहां होली खेलने का न्योता मिलता था वह बहुत गर्व महसूस किया करता था क्योंकि इससे इंडस्ट्री में उसकी हैसियत का अंदाजा होता था।
राज कपूर की होली पार्टी में एक बड़े टैंक में रंग व दूसरे में भंग तैयार किए जाते थे और हर आने वाले को उन दोनों से सराबोर किया जाता था। बताते हैं कि हर आने वाले का पहला स्वागत रंग भरे टैंक में डुबकी लगवा कर किया जाता।
ऐसा बताया जाता है कि एक बार आरके स्टूडियो में अदाकारा वैजयंती माला ने होली खेलने में आनाकानी की, तो उन्हें रंग भरे टैंक में सात बार डुबकियां लगवाई गईं। राज कपूर के स्टूडियों की होली में शामिल होना उस ज़माने का हर छोटा बड़ा सितारा अपनी शान समझता था। सिर्फ़ देव आनंद नहीं आते थे, क्योंकि उन्हें रंगों से परहेज था। लेकिन यह हंसी ठिठोली अब बंद है ।
राज कपूर साहब की एक फिल्म के गाने “किसी की मुस्कुराहटों पर हो निसार…..” के अंतरे में एक लाइन थी- रिश्ता दिल से दिल के ऐतबार का, जिंदा है हमी से नाम प्यार का…. रियल लाइफ में ये लाइन राज कपूर के लिए एकदम सटीक बैठती थी. वे काफी मिलनसार थे और जिससे भी मिलते थे दिल खोलकर मिलते थे । राज कपूर की खासियत ये थी कि वे खुद तो लोगों से जुड़ते ही थे साथ ही वे लोगों को जोड़ते भी थे । उनके द्वारा आर के स्टूडियो में मनाया जाने वाला लाजवाब होली उत्सव भी इसी का अंग था । राज कपूर एक वट वृक्ष के तरह थे और हुनर के साथ-साथ उनके पास सलीका भी था। इसलिए उन्हें लोग मानते थे और उनका इतना सम्मान भी करते थे। 1988 में राज कपूर साहब नहीं रहे । उसके बाद कपूर खानदान में होली को लेकर वैसा उल्लास नहीं रहा । उनके जाने के बाद आयोजन हुए लेकिन वो गर्मजोशी नहीं थी । राज साहब के बाद अमिताभ बच्चन और जावेद अख्तर की होली भी काफी चर्चा में रही । लेकिन जो रुतबा राज कपूर की होली का था वो उनके साथ ही हमेशा-हमेशा के लिए चला गया। लेकिन आज भी जब होली के आयोजनों की बात होती है तो लोग कहते हैं कि होली हो तो राज साहब जैसी हो !!
अमिताभ बच्चन और होली पार्टी का अनोखा संयोग
ऐसे ही एक होली के कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन भी पहुंच गए। उस दौर में अमिताभ बच्चन की लगातार 9 फिल्में असफल होने के बाद वह बेहद निराश थे । उसी अवस्था में वे आरके स्टूडियो चले आए। तब राज कपूर ने उनसे कहा “आज कोई धमाल हो जाए, देखो कितने सारे लोग आए हैं सब तुम्हारी प्रतिभा देख सकेंगे।”
तब पहली बार अमिताभ बच्चन ने अपनी आवाज में ‘रंग बरसे भीगे चुनर वाली’ गाया और इस कदर झूमे कि सब उनके दीवाने हो गए। सालों बाद यश चोपड़ा ने उसे गाने को अपनी फिल्म सिलसिला में इस्तेमाल किया था। अमिताभ आज भी आर के स्टूडियो की होली को बहुत याद करते हैं ।
किन्नरों के संग था राज कपूर का खास रिश्ता
राज कपूर हर साल किन्नरों के साथ होली सेलिब्रेशन करते थे। उनका किन्नरों के साथ खास रिश्ता था । उनका इस कम्यूनिटी पर अटूट विश्वास था । राज हर साल किन्ररों के साथ होली खेलते, रंग-गुलाल के साथ महफिल सजा करती थी। कहते हैं राज कपूर आरके स्टू़डियो से सब फिल्मी सितारों के चले जाने के बाज शाम 4 बजे किन्नरों के साथ महफिल सजाते थे । किन्नर खुद उनसे मिलने आते थे, स्टूडियो में नाचते-गाते और खूब होली खेला करते थे । ये राज कपूर के खास मेहमान होते थे ।
बताया जाता है कि राज कपूर को किन्नर समाज पर इतना भरोसा था कि अपनी फिल्मों के गानों का अप्रूवल भी वो उन्हीं से लेते थे । ऐस ही कुछ 1985 में आई फिल्म राम तेरी गंगा मैली के साथ भी हुआ था । राज ने अपनी इस फिल्म के गाने भी होली के आयोजन पर किन्नरों को सुनवाए थे । कहा जाता है कि सभी गानों को किन्नरों की मंजूरी मिली, लेकिन एक गाना उन्होंने रिजेक्ट कर दिया। उनके नामंजूर करने पर राज कपूर ने संगीतकार रविंद्र जैन को बुलाकर उसे बदलने को कह दिया । इसके बाद “सुन साहिबा सुन….” गाना बना । किन्नरों को सबसे ज्यादा सुन साहिबा सुन गाना ही पसंद आया था । इस गाने पर सभी नाच उठे थे । किन्नरों ने राज कपूर से कहा था, ‘देख लेना ये गीत सालों चलेगा और ऐसा ही हुआ’. इतिहास गवाह है कि ये गाना फिल्म और उस दशक का सबसे हिट गाना था। आज के दौर में भी इस गाने पर कई रीमिक्स बनाए जाते हैं ।
सबसे पसंदीदा त्यौंहार का एक भी गाना अपनी फिल्म में नहीं रखा राज कपूर ने
राज कपूर हिंदी पर्दे के चार्ली चैपलिन थे । उन्होंने न केवल फिल्मों का निर्माण किया बल्कि कई फिल्मों का निर्देशन भी किया । परंतु खास बात यह है कि अपनी जिंदगी में साल-दर-साल जोरदार होली मनाने वाले राज कपूर ने अपनी किसी फिल्म में कभी कोई होली गीत नहीं रखा । यह बहुत ही आश्चर्य चकित करने वाली बात है कि जो राज कपूर अपनी फिल्मों के साथ-साथ इन फिल्मों के मधुर गीतों के लिए याद किए जाते हैं, उन्होंने अपनी फिल्म में किसी होली गीत को जगह नहीं दी । उनकी आग, बरसात, आवारा, श्री 420, संगम, मेरा नाम जोकर, बॉबी, सत्यम शिवम सुंदरम, प्रेम और राम तेरी गंगा मैली आप देख लीजिए। इन फिल्मों में एक से बढ़ एक रोमांटिक गाने हैं । प्यार का इजहार करने वाले और दर्द भरे भी । इनमें नाचने-झुमाने वाले म्यूजिकल भी हैं, परंतु एक भी होली गीत आपको नहीं मिलेगा ।
सिनेमा के जानकारों को यह बात आज भी चकित करती है ।
देवा आनंद होली पार्टी से दूर रहते थे
फेमस आर के स्टूडियों की होली का इंतजार फिल्म इंडस्ट्री के लोग पूरे साल किया करते थे । सिर्फ यही नहीं हर कोई यहां से बुलावे का बेसब्री से इंतजार भी किया करते थे । सिर्फ देव आनंद होली के हुड़दंग से दूर रहते थे । कहते हैं कि देव आनंद को होली खेलना पसंद नहीं था। वह हमेशा इस त्योहार से दूर रहते थे। देव साहब को लगता था कि होली खेलने से उनका सुंदर सजीला चेहरा हमेशा के लिए खराब हो जाएगा । राजकपूर इस बात को अच्छी तरह जानते थे, इसलिए उन्होंने कभी देव साहब पर होली खेलने के लिए जोर नहीं डाला ।हालांकि देव साहब राजकपूर अच्छे दोस्त माने जाते थे ।
नर्गिस का जिम्मा था कोई भूखा ना जाए
आरके स्टूडियो की ख़ास होली के हुडदंग में कोई भूखा ना चला जाए, इसकी जिम्मेदारी प्रसिद्ध अदाकारा नर्गिस पर हुआ करती थी। उनकी धाक ऐसी रहती कि भांग की मस्ती होने के बाद हर कोई बिना पेट भर खाये आरके स्टूडियो से बाहर नहीं निकलता था । राज कपूर की होली को एक ज़माने में ‘भांग और फूड फेस्टिवल’ भी कहा जाता था। 70 के दशक की शुरुआत में आरके फिल्म्स की फिल्में नहीं चलने के कारण आरके स्टूडियो की होली फ़ीकी हो गई थी, लेकिन फिल्म ‘बॉबी’ के हिट होते ही कपूर्स फ़िर फॉर्म में आ गए।






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