इतिहास के संदूक से गहलोत की दूरबीन
अशोक गहलोत राजनीति के वो अनुभवी नाविक हैं, जिनकी नाव चाहे कितनी ही बार राजस्थान की लहरों में हिचकोले खा ले, लेकिन जब भी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय सागर में कोई तूफान उठता है, वो तुरंत अपनी दूरबीन...

बात बेलगाम
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बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ पत्रकार
अशोक गहलोत राजनीति के वो अनुभवी नाविक हैं, जिनकी नाव चाहे कितनी ही बार राजस्थान की लहरों में हिचकोले खा ले, लेकिन जब भी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय सागर में कोई तूफान उठता है, वो तुरंत अपनी दूरबीन लेकर मचान पर चढ़ जाते हैं। हालिया भारत-पाक सीज़फायर की घोषणा पर जैसे ही अमेरिका का नाम आया, गहलोत जी ने अपने इतिहास के संदूक से एक पुरानी दूरबीन निकाली, जिस पर नेहरू और इंदिरा जी की तस्वीरें जड़ी थीं, उन्होंने उस दूरबीन से 1961 का गोवा देखा, 1974 का सिक्किम देखा, और फिर सीधे 2025 की मोदी सरकार की छत पर निशाना साधा। इतिहास के खजाने से किस्से निकालने में उन्हें वैसी ही महारत है, जैसे कोई रसोई में से सूखे मसाले छांटकर नई रेसिपी बना दे। फर्क बस इतना है कि ये रेसिपी ट्विटर पर परोसी जाती है, और स्वाद कुछ-कुछ खट्टी स्मृतियों जैसा होता है। गहलोत जी का व्यंग्य और विवेक, दोनों उस ताले जैसे हो गए हैं जो हर तिजोरी में फिट बैठता है– चाहे तिजोरी पुरानी हो या राजनीति नई। फर्क बस इतना है कि चाबी अब जनता के हाथ में है, और वह तय करेगी कि इतिहास की दूरबीन से देखना है या भविष्य की आंख से। कहना न होगा, गहलोत जी इतिहास के वो पन्ने हैं, जो हर बहस में अचानक खुल जाते हैं– और फिर बंद करने में समय लग जाता है।
डोटासरा का लोकतांत्रिक अखाड़ा– शेर भी, सेनापति भी!
राजस्थान की राजनीति में अगर कोई नेता शब्दों के भाले फेंकने में पद्म विभूषण मांग सकता है, तो वो हैं गोविंदसिंह डोटासरा। बयान ऐसे देते हैं कि सुनने वाला सोच में पड़ जाए- ये नेता हैं या ‘कथकली’ के कलाकार, हर बात में नाटकीयता का पुट ज़रूर मिलेगा। हालिया बयान में डोटासरा बोले– “परेड आतंकियों की होनी चाहिए, ना कि जनता की आवाज़ उठाने वालों की।” सुनकर लगा जैसे साक्षात् लोकतंत्र खुद कंधे पर झोला टांगे उनके पीछे चल पड़ा हो! पर असलियत ये है कि जब उनके नेता सत्ता में थे, तब किसी की आवाज़ उठती तो धारा 144 पहले और सवाल बाद में आते थे। डोटासरा जी अपने कार्यकर्ताओं को शेर कहते हैं– वो भी ऐसे शेर जो ट्विटर पर गुर्राते हैं, कोर्ट समन पर बिल्ली बन जाते हैं, और चुनाव में ईवीएम देखते ही गुफा की तलाश शुरू कर देते हैं। “शेर हैं हम” की हुंकार सुनकर जंगल के असली शेर भी शर्म से सिर झुका लेते होंगे। उनके बोलते वक्त संविधान जेब में, और विपक्ष की खाल मुंह में! राजनीति को अखाड़ा बनाना कोई इनसे सीखे– जहां भाषण तलवार, बयान ढाल, और हर माइक एक युद्धघोष!
पदोन्नति का प्रमोशनल इंटेलिजेंस
राजस्थान पुलिस की इंटेलिजेंस शाखा में तैनात आईपीएस राजकुमार गुप्ता ने रिटायरमेंट के दिन कुछ ऐसा कर दिखाया जो बड़े-बड़े अफसर भी सपने में सोचते हैं— जाते-जाते दो-दो पदोन्नतियां ले उड़े! सरकार भी असमंजस में पड़ गई— उन्हें बधाई दी जाए या रिलीविंग ऑर्डर? गुप्ता जी का सरकारी करियर एकदम मसालेदार रहा। एसडीआरएफ की कमान को लेकर जो कुर्सी-प्रेम उपजा, उसमें अफसर कम और कुर्सी ज़्यादा प्रतिष्ठित हो गई। जब तबादला आदेश आया, तो उन्होंने कुर्सी नहीं छोड़ी और जब कोर्ट की रोक लगी, तो कुर्सी भी अदालत की संपत्ति बन गई! ऐसे ही अधिकारियों से प्रेरणा लेकर कुर्सियां स्थायी संपत्ति घोषित की जानी चाहिए। सरकार ने भी कमाल किया— एक तरफ प्रमोशन का लड्डू थमाया और दूसरी तरफ वेतनमान में एक चरण की कटौती कर दी, जैसे मिठाई के साथ कड़वी गोली मुफ्त! जनवरी 2025 से उनका प्रमोशन मान्य होगा, यानी रिटायरमेंट के बाद भी उनका ओहदा बोलेगा— “मैं तो चला, लेकिन मेरी फाइलें अब भी दौड़ रही हैं!” गुप्ता जी ने रिटायर होते-होते ये तो साबित कर ही दिया कि सच्चा इंटेलिजेंस वो नहीं जो दूसरों की खबर रखे, बल्कि वो है जो रिटायरमेंट को भी प्रमोशनल मौके में बदल दे!
आक्या और भ्रष्टाचार का भूत
रात के ग्यारह बजे विधायक चंद्रभानसिंह आक्या का काफिला चित्तौड़ लौट रहा था। पर रुकिए! यह कोई सामान्य वापसी नहीं थी, यह तो जैसे भ्रष्टाचार की अर्थी निकालने का समय था! ओछड़ी टोल प्लाज़ा के पास उन्होंने देखा कि परिवहन विभाग का इंस्पेक्टर एक गाड़ी वाले से ‘अनौपचारिक टैक्स’ वसूल रहा था। विधायक की आंखें ऐसे चमकीं जैसे रावण ने संजीवनी बूटी देख ली हो। वो गाड़ी से उतरे, और गरजे, “ये क्या तमाशा है?” इंस्पेक्टर की हालत तो ऐसे हो गई जैसे प्रैक्टिकल में बिना तैयारी के छात्र की। विधायक ने लताड़ लगाई, जनता ताली बजा रही थी, जैसे ‘रियलिटी शो’ का फिनाले चल रहा हो। कहते हैं, इंस्पेक्टर इतनी तेज़ी से भागा कि चीता भी शरमा जाए। विधायक जी बोले, “राजनीति में पहली बार इतना खुला भ्रष्टाचार देखा।” भाई साहब! पहली बार देखा या पहली बार रुककर देखा? खैर, मानना पड़ेगा— जो काम सीबीआई और एसीबी न कर पाई, वो हमारे विधायक ने चंद मिनटों में कर दिखाया! आशा है अगली बार वो कोई और ‘भूत’ भी पकड़ लाएं— जैसे महंगाई, बेरोजगारी और गड्ढों का! जनता कह रही है—”विधायक नहीं, भ्रष्टाचार के भस्मासुर हैं आक्या !”
वीआईपी दर्शन और डिप्टी सीएम की लाइन
भक्तों की भीड़ में जैसे ही एक ख़ास साड़ी चमकी, लगा कोई बड़ी हस्ती आई है। लोग सोच ही रहे थे कि शायद फिर कोई वीआईपी लाव-लश्कर लेकर सीधा खाटू वाले बाबा की आरती थाली में उतरने वाला है, तभी पता चला— अरे ये तो डिप्टी सीएम दिया कुमारी हैं! और चौंकाने वाली बात ये कि लाइन में खड़ी हैं! अब राजस्थान की गर्मी में आम जनता की तरह लाइन में लगना कोई सामान्य सियासी अभ्यास तो है नहीं। नेताओं के लिए लाइन में लगना वैसे ही होता है जैसे बुलेट ट्रेन को बैलगाड़ी की रफ्तार से चलाना। मगर दिया जी ने ये कारनामा कर दिखाया। लोग बोले— “देखो, नेता भी इंसान हो सकते हैं!” और कुछ बोले— “सादगी नहीं, स्टाइल में साधु बनना है अब राजनीति का नया ट्रेंड।” अब अफसर बेचारे परेशान, बोले— “मैडम अगर सब ऐसे लाइन में लगने लगे तो हमारे लाल बत्ती वाले बोर्ड का क्या होगा?” पंडित जी भी बोले— “अब वीआईपी आरती पैकेज कौन खरीदेगा?” मगर दिया कुमारी मुस्काईं— जैसे कह रही हों, ‘प्रभु के दरबार में सब बराबर हैं… और राजनीति में कैमरे बराबरी के गवाह!’






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