काम आधा, इरादे अधूरे और धैर्य परीक्षा पर
अब तमाशा ही इतिहास बन गया है। कहीं एक टांग पर कूदकर रिकॉर्ड बने, कहीं बादल हेलिकॉप्टर को धकेल दें, कहीं इंटरव्यू में फेल को टॉपर बना दिया जाए, और कहीं सरकारी दफ्तरों में कुर्सियां ही सबसे ईमानदार...

बात बेलगाम
बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ व्यंग्यकार
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अब तमाशा ही इतिहास बन गया है। कहीं एक टांग पर कूदकर रिकॉर्ड बने, कहीं बादल हेलिकॉप्टर को धकेल दें, कहीं इंटरव्यू में फेल को टॉपर बना दिया जाए, और कहीं सरकारी दफ्तरों में कुर्सियां ही सबसे ईमानदार कर्मचारी निकलें। चारों किस्से हंसी भी दिलाते हैं और हालात पर झकझोर भी देते हैं। काम आधा, इरादे अधूरे और जनता का धैर्य परीक्षा पर।
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एक टांग का इतिहास
लंगड़ी एक्सप्रेस अब जोधपुर से छूट चुकी है। ट्रेनें भले ही घंटों लेट हों, पर यह एक्सप्रेस एक पैर पर ही रिकॉर्ड तोड़ आई। इंडिया बुक हो या एशिया बुक– सबने मानो लिख दिया हो कि “कूदना ही कुशलता है।” उपमुख्यमंत्री जी भी बचपन की यादों में कूद पड़ीं, और जनता ने ताली बजा-बजाकर माहौल और भी लंगड़ाया। खेल विभाग सोच रहा है कि अगर क्रिकेट में एक पैर पर रन बनाए जाएं तो कैसा रहेगा। बजट भी बचेगा, पैड भी आधे खरीदने पड़ेंगे। आयोजक दावा कर रहे हैं कि यह खेल भारतीय संस्कृति का आईना है। सही कहा, क्योंकि हम हर काम आधे मन और आधे कदम से ही तो करते हैं। अब देखना है कि अगली बार सुई में धागा डालने की दौड़ या ताश की गड्डी उठाकर मैराथन कब बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज होती है। फिलहाल, लंगड़ी एक्सप्रेस ने यह साबित कर दिया है कि दुनिया चाहे रॉकेट से चांद पर जाए, हम एक टांग से भी इतिहास लिख सकते हैं।
बादलों की बगावत और मंत्री’जी की लैंडिंग
राजस्थान की राजनीति में जन्मदिन अब आसमानी तमाशे बन गए हैं। राज्य के एक बड़े महकमे के मंत्री’जी ने सोचा था कि मोमबत्ती से पहले हेलिकॉप्टर की गड़गड़ाहट से जनता को रोशन कर देंगे। पर अलवर के आसमान ने मानो कहा, “पांव ज़मीन पर रखिए महाराज!” बादल ऐसे जमा हुए जैसे विरोधी दल का मोर्चा और हेलिकॉप्टर की एंट्री सीधी कट हो गई। नतीजा मंत्री’जी को फिर उसी सड़क पर लौटना पड़ा, जिस पर आम जनता रोज़ धक्के खाती है। फर्क बस इतना कि जनता जाम से लड़ती है और मंत्री’जी का काफिला उससे। मौसम ने साबित कर दिया कि राजनीति में चाहे कितनी भी ऊंचाई मिल जाए, जमीन पर लौटना अनिवार्य है। जनता अब सोच रही होगी, काश हर रोज़ बादल ऐसे ही घेर लें, ताकि नेता’जी हेलिकॉप्टर छोड़ पैदल हमारे बीच दिखें।
इंटरव्यू में टॉपर, ईमानदारी में फेल
भ्रष्टाचार का खेल अब इतना सुसंस्कृत हो गया है कि इंटरव्यू में भी “गुरु मंत्र” काम करता है। आरपीएससी के मंच पर हिंदी का ‘ह’ लिखना न जानने वाले अभ्यर्थी भी 42 में से 30 अंक पा गए। सामान्य ज्ञान शून्य, पर ज्ञान का पिटारा साक्षात्कार कक्ष में खुल गया। लगता है योग्यता अब प्रमाण-पत्र से नहीं, “प्रमोटर” से तय होती है। एसओजी ने जब तगड़ी पूछताछ शुरू की, तो राजकुमार जैसे महामानव ने अभ्यर्थियों को नया पाठ पढ़ाया, “सच मत बोलना, बस भाग जाना।” लेकिन जब खुद पकड़े गए तो घर में बैठकर चुपचाप दर्शन देते मिले। दो घंटे तक गेट बंद रहा, मानो ईमानदारी वहीं अंदर बंधक हो। यह घटना साबित करती है कि हमारी परीक्षाओं में परिश्रम नहीं, पैरवी ही पास होती है। और राजकुमार जैसे पात्र हमें याद दिलाते हैं कि असली “एसआई” वही है, जो सिस्टम इन्फ्लुएंस से भर्ती हो। बाकी सब मेहनतकश तो बस दर्शक बने रह जाते हैं।
हाज़िरी रजिस्टर भरे, मगर कुर्सियां खाली
सरकारी दफ्तरों का हाल तो अब “हाजिरी कम, हाजिरी की कहानियां ज़्यादा” हो गया है। किशनगढ़ में जब प्रशासनिक सुधार विभाग की टीम पहुंची तो दफ्तरों की कुर्सियां भी हैरान रह गईं। “साहब लोग तो आते ही नहीं, रोज़ हम ही ड्यूटी पर बैठे रहते हैं।” 43 रजिस्टर देखे गए, मगर उनमें ज़्यादा नाम तो सिर्फ़ कागज़ पर ही थे। हाज़िरी लगाने का हुनर ऐसा कि कर्मचारी ग़ायब, पर कलम मौजूद! गजेटेड अफ़सरों की आधी फौज नदारद और नॉन-गजेटेड तो जैसे “लापता मोर्चा” निकालकर चले गए। अस्पताल से लेकर पीडब्ल्यूडी तक सब जगह खालीपन ही खंखारता मिला। अब रिपोर्ट बनेगी, नोटिस जारी होंगे और कर्मचारी सोचेंगे, “चलो, अगली बार निरीक्षण से पहले टाइम पर आ जाना।” सरकार कह रही है “पारदर्शिता और जवाबदेही।” लेकिन जनता कह रही है “साहब, हमें तो सिर्फ़ इतना चाहिए कि दफ्तर खुला मिले और कोई काम करने वाला भी।”






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