ब्रेन सर्जन ने किया नोटों का ट्रांसप्लांट
राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल के एक नामी न्यूरो सर्जन ने ऐसा ऑपरेशन किया कि ईमानदारी खुद आईसीयू में पहुंच गई। ब्रेन सर्जरी के कॉइल की जगह उन्होंने नोटों की नसें जोड़ लीं। जब एसीबी की टीम ने...

बात बेलगाम
बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ व्यंग्यकार
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राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल के एक नामी न्यूरो सर्जन ने ऐसा ऑपरेशन किया कि ईमानदारी खुद आईसीयू में पहुंच गई। ब्रेन सर्जरी के कॉइल की जगह उन्होंने नोटों की नसें जोड़ लीं। जब एसीबी की टीम ने दबोचा, तो बोले- जो चाहिए ले लो, मुझे छोड़ दो। लगा जैसे डॉक्टर नहीं, चलता-फिरता एटीएम बोल रहा हो! रिश्वत की रकम प्लॉट में फेंकी गई, मानो नोट भी शर्म से जमीन में समा जाना चाहते हों। घर से नकदी, प्रॉपर्टी और लॉकर मिले। नैतिकता तो जैसे सर्जरी टेबल पर ही दम तोड़ चुकी थी। उधर डॉक्टरनी ने लॉकर खोलने से इनकार कर दिया, बोलीं- आज करवा चौथ है। शायद सोच रही थीं कि चांद निकलेगा तो पाप भी डूब जाएगा। और बाहर खड़े साथी बोले डरिए नहीं, हम आपके साथ हैं। सच तो यह है इलाज दिमाग का था, लेकिन सिस्टम की रीढ़ टूट चुकी है।
मास्क में मंत्री, बेनकाब हुआ सिस्टम
जंगल वही था, बाघ वही। बदला तो बस देखने वाला। राजस्थान के वन मंत्री आम सैलानी बनकर रणथंभौर पहुंचे, टोपी-मास्क में छिपे रहे और सिस्टम की पोल खोल दी। टिकट खुद बुक की, पैसा खुद दिया और तीन घंटे तक अफसरों की बिना स्क्रिप्ट वाली सफारी देखी। जो व्यवस्था फाइलों में शेर बनती है, वह जमीन पर खरगोश निकली। जंगल में शिकार बंद है, पर मंत्रीजी ने खामियों का शिकार कर ही लिया। गाइड बोले, ‘सर, बाघ नहीं दिखा।’ मंत्री मुस्कराए ‘कोई बात नहीं, भ्रष्ट व्यवस्था तो खूब दिख रही है!’
इंजीनियरिंग कॉलेज का नंबरों वाला जलसा
जोधपुर के प्रमुख इंजीनियरिंग कॉलेज ने गणित को ही नया मतलब दे दिया। जहां 100 में 137 नंबर पाना अब ‘नॉर्मल’ लगने लगा है! 800 मार्कशीटों में सात सब्जेक्ट्स में ‘अधिक अंक’ देने का कारनामा देखकर तो खुद कैलकुलेटर भी हक्का-बक्का। लगता है कॉलेज ने सोचा, ‘छात्रों की मेहनत को थोड़ी पिंकी-लविंग एक्स्ट्रा दे देते हैं।’ छात्र सीधे सुपरस्टार बन गए। कक्षा में नहीं, मार्कशीट में! शिक्षक अब सोच रहे होंगे, ‘पढ़ाना छोड़ो, अंक छाप दो, भविष्य सुरक्षित।’ परीक्षा का उद्देश्य अब सिर्फ अंकबढ़ाई का मज़ाक बन गया। सोशल मीडिया पर हंगामा मचा, ‘IIT, AIIMS, सब पीछे, जोधपुर का यह कॉलेज नंबरों की दुनिया में नंबर वन।’ स्टूडेंट्स खुशी से उड़ रहे हैं, यूनिवर्सिटी का नाम बन गया, ‘अंकबढ़ाई का अड्डा।’ कयास लग रहे हैं कि अगले साल कॉलेज नया कोर्स शुरू करेगा, ‘अंकबढ़ाई इंजीनियरिंग,’ जहां 100 में 200 नंबर लेना भी सामान्य हो जाएगा। गणित अब सिर्फ किताबों में, मार्कशीट में तो बस मज़ाक, मस्ती और चमक!
डिस्टेंस डिग्री से फास्ट ट्रैक प्रमोशन
भाई साहब, ये देश बड़ा ही अद्भुत है। यहां सड़क बनाने वाला इंजीनियर अगर ‘डिस्टेंस’ से बीटेक कर ले तो सड़क की दूरी घटा नहीं सकता, लेकिन प्रमोशन की दूरी जरूर घटा लेता है। सुप्रीम कोर्ट कहे कि ‘नियमों का पालन करो’, पर साहब लोग नियमों को भी ‘डिस्टेंस मोड’ में पढ़ लेते हैं। अब ज़रा सोचिए जहां आम आदमी को 15 साल खटनी पड़ती है, वहां डिस्टेंस बीटेक वाला इंजीनियर सिर्फ 5 साल में ही ‘एक्सईएन’ की कुर्सी पर विराजमान। यानी डिग्री दूर से मिली, कुर्सी पास से। जनता कह रही है, ‘हमारे पंखे-पानी की लाइनें भी क्या डिस्टेंस मोड में जुड़ जाएंगी?’ अधिकारियों को फर्क नहीं पड़ता, उनके लिए तो प्रमोशन की सीढ़ियां लिफ्ट की तरह हैं। कोर्ट को मानिए, वरना कल को चायवाला भी कहेगा, ‘मैंने डिस्टेंस से एमबीए किया है, अब मुझे कंपनी का सीईओ बना दो।’ कुल मिलाकर, सिस्टम भी अब यही कह रहा है, ‘काम कीजिए धीरे-धीरे, लेकिन प्रमोशन पाईए डिस्टेंस वाले स्पीड ब्रेकर कूदकर।’
बिस्कुट का लोकतंत्र
राजस्थान की राजधानी जयपुर के बड़े अस्पताल में नज़ारा किसी फ़िल्मी शूटिंग से कम नहीं था। एक प्रमुख राजनीतिक दल के कार्यकर्ता कैमरे के सामने मरीजों को बिस्कुट थमाते नज़र आए। फ्लैश चमका, मुस्कान बिखरी, और जैसे ही क्लिक हुआ, बिस्कुट वापस! मरीज हक्का-बक्का, कैमरा खुश और राजनीति तृप्त। वीडियो सोशल मीडिया पर आया तो जनता ने पूछा ये अस्पताल है या फोटो स्टूडियो? गरीब मरीजों की भूख भले अधूरी रह गई, मगर नेताजी की इमेजिंग पूरी हो गई। जयपुर के अस्पतालों में जहां लोग दवा और सेवा की उम्मीद करते हैं, वहां अब ‘बिस्कुट पॉलिटिक्स’ का मुफ्त शो भी मिलने लगा है। असल सवाल ये नहीं कि मरीजों ने बिस्कुट खाए या नहीं, सवाल ये है कि फोटो की भूख बड़ी थी या जनता की भूख? सेवा का बिस्कुट अगर वापस ले लिया जाए तो लोकतंत्र की चाय भी बेस्वाद हो जाती है।
रावण की राजनीति
कोटा में इस बार दुनिया का सबसे ऊंचा रावण खड़ा रहा, मगर जला नहीं। फायर ब्रिगेड आग लगाने में फेल हुई और आयोजक हाथ मलते रह गए। जयपुर में पेट्रोल डाला तो रावण ने मानो आंखें तरेर दीं और बोला महंगाई में आग लगाओगे? शर्म करो! असल में रावण भी नेताओं की तरह हो गया है। मंच पर ऊंचा-ऊंचा खड़ा, हर साल बड़े वादे करता है, इस बार जलूंगा। लेकिन वक्त आने पर बस धुआं देता है, जलता नहीं। जनता ताली बजाती रह जाती है, बच्चे पटाखों की जगह मोबाइल से वीडियो बनाते रहते हैं, और आयोजक सोचते रह जाते हैं कि अगली बार शायद जल ही जाए। लोग बोले रावण असली नेताओं जैसा है। जितना भी जलाने की कोशिश करो, ये जलते नहीं, बल्कि जनता को ही रोज़ जलाते रहते हैं।






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