बोल हरि बोल
अपन भी आज बिना चिंतन के बैठे हैं। अपनी मर्जी से नहीं, जब लिखने कहा गया तो ऐसे ही मूर्खता करने बैठ गए! कहा गया कि आजकल जो चल रहा है, उस पर एक नजर मारिए और अपनी तीरे नजर से लिख डालिए। जिसको समझ आया वो...

– हरीश मलिक –
अप्रैल महीने की शुरुआत मूर्खता दिवस से होती है। मूर्खानंद की बातों पर आंखें गोल और लब हंसने के लिए खुल जाते हैं। ऐसे ही व्यंग्य का कटाक्ष भी चेहरे पर क्लोज-अप मुस्कान ले आता है। तो क्या मूर्खानंद और व्यंग्य में करीबी रिश्ता है? यह गंभीर चिंतन का विषय हो सकता है। वैसे मूर्खता के लिए ज्यादा चिंतन की दरकार नहीं है। बिना चिंतन के भी कई लिक्खाड़ व्यंग्य पेल देते हैं। अपन भी आज बिना चिंतन के बैठे हैं। अपनी मर्जी से नहीं, जब लिखने कहा गया तो ऐसे ही मूर्खता करने बैठ गए! कहा गया कि आजकल जो चल रहा है, उस पर एक नजर मारिए और अपनी तीरे नजर से लिख डालिए। जिसको समझ आया वो व्यंग्य मान लेगा, वरना मूर्खता में तो आपका फोटू सुरिंदर शर्मा से मीलों आगे ही है। आसपास नजर डाली तो पहला किस्सा कई रंग वाली जेब (औरंगजेब) का नजर आया!
औरंगजेब की कब्र
ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘छावा’ के बाद विकी कौशल के साथ-साथ औरंगजेब भी छाया हुआ है। औरंगजेब का किरदार निभाने वाले बेचारे अक्षय खन्ना बेहद दुःखी हैं। इतने बरस बाद मुश्किल से किसी फिल्म में अच्छा अभिनय हो पाया। लेकिन लोग उनके उम्दा अभिनय को भूलकर असली औरंगजेब के पीछे ही पड़ गए। उनकी एक्टिंग की बजाए औरंगजेब की क्रूरता की गली- गली में चर्चा है। उसकी अगली-पिछली पीढ़ियों के इतिहास खंगाले जा रहे हैं। यहां तक कि सदियों से चैन की नींद ले रहे औरंगजेब को खुल्ताबाद में अब अपनी कब्र की चिंता सताने लगी है। ना जाने कब मिट्टी का ढेर, मिट्टी हो जाए। लेकिन सबक लेने वाली बात ये है- जॉनी तुम्हारे पाप मरने के बाद भी तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेंगे।
https://rajasthantoday.online/april-2025
कैश में लग गई आग
योर ऑनर! आजकल तो आप भी खूब सुर्खियों में हैं। कहीं कैश की आग में जल रहे हैं, तो कहीं रेप की कोशिश और प्रयास को नए सिरे से परिभाषित करने में लगे हैं। कैश का मसला तो वाकई कुछ ज्यादा हो गया। लोग बात का बतंगड़ बना देते हैं, लेकिन यहां तो फायर का फतंगड़ बन गया है। ये तो सुप्रीम कोर्ट से संसद तक का मुद्दा बन गया है जी। मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक अदालत की इज्जत ‘बढ़ाते’ मीम्स और सवाल बिखरे हैं। और लोग- बाग हैं कि कैश की आग में बाग- बाग हुए जा रहे हैं। आज पकड़ में आए हो चचा। दूसरों का फैसला करते- करते बहुत डकार लिया, अब जनता की डकार लेने की बारी है। अपन ज्यादा नहीं लिखेंगे। मामला कभी भी अवमानना का बन सकता है, इसलिए थोड़े लिखे को ज्यादा समझना।
सरजी की बज गई बीन
दूध का जला तो छाछ फूंक-फूंककर पीता है, लेकिन सरजी की तो छाछ भी जली हुई निकली है। मुफ्त का चंदन घिसते- घिसते बैसाखनंदन बन गए! बुजुर्गों ने क्या खूब कहा है कि बंदे को औकात से बढ़कर नहीं बोलना चाहिए। लेकिन सरजी ने तो पूरे जन्म की गारंटी ले ली थी। इस जन्म में तो कोई उनको हरा नहीं सकता, लेकिन जनता- जनार्दन को ‘पैर की जूती’ नहीं समझने का। वह सत्ता के सिंहासन पर बैठा सकती है तो तशरीफ के नीचे से यकायक कुर्सी भी छीन लेती है। दरअसल, कुर्सी की भी अपनी मूर्खताएं होती हैं। उस पर कई वज्र मूर्ख भी बैठ जाते हैं। बैठने से पहले दावों, वादों और बातों से ठीक-ठाक लगते हैं। पर उनकी मूर्खता कुर्सी पर बैठने के बाद प्रकट हो ही जाती है। कुर्सी रूठी तो अब ना तीन में तेरह में हैं सरजी। बंदा दिल पे ले सकता है, इसलिए धोबी वाला मुहावरा नहीं लिखा।
ऐसा रोना भी क्या रोना
अप्रैल के पूरे महीने आईपीएल का सीजन एक बार फिर शबाब पर रहने वाला है। कैप्ड और अन-कैप्ड दोनों तरह के खिलाड़ी रन और पैसा खूब कूटने में लगे हैं। पर ई का हुआ? चैंपियंस ट्रॉफी जीतने वाले कप्तान रोहित शर्मा रोए जा रहे हैं। इतना तो भाई तब भी नहीं रोया था, जब पाकिस्तान से मैच में सपाट क्लीन बोल्ड हो गया! पैसे-कार के लिए करोड़पति रोहित को रोता देखकर रोना आ रहा है। शमा मोहम्मद फिर ट्वीट मारेंगी कि ड्रीम-11 के विज्ञापन में रोते हुए रोहित ‘मोटे’ भी लग रहे हैं। भइया मोटा-पतला होना तो आपकी अपनी च्वाइस है। लेकिन थोड़े से पैसे के लिए ऐसे विज्ञापन क्यों करते हो, जिससे युवा उत्साहित होकर अपना बैंक बैलेंस भी गंवा बैठें।






No Comment! Be the first one.