छापों का चमत्कार और सत्ता का संस्कार
असल में ये छापे खुद को शुद्ध करने की प्रक्रिया हैं, जहां नेता खुद ही पकड़ते हैं, खुद ही डांटते हैं, और फिर खुद को चाय पर भी बुला लेते हैं। जनता देख रही है और ताली भी बजा रही है, क्योंकि नाटक रोज़...

बात बेलगाम
– बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ व्यंग्यकार एवं पत्रकार
टोंक में जैसे ही सचिन पायलट ने भाषण दिया, मौसम विभाग ने बताया कि प्रदेश की सियासत में अचानक गर्मी बढ़ गई है। मंत्री खुद छापे मार रहे हैं। यह सुनकर चोर-बाजारियों ने चैन की सांस ली, क्योंकि मंत्रीजी आएंगे तो पहले कैमरे को सजाएंगे, फिर सवालों का मंच तैयार करेंगे, और उसके बाद कहीं जाकर दरवाज़ा खटखटाएंगे। अब जनता उलझन में है, छापा सरकार पर पड़ा या सरकार ने खुद पर छापा डाला? लगता है, अब राज चलाने का नया तरीका शुरू हो गया है— “अपने घोटाले, अपनी ही जांच!” पायलट साहब ने जो कहा, वह सीधे दिल पर लगा। इतनी बड़ी मिलावट और जमाखोरी बिना किसी राजनीतिक छांव के कैसे हो सकती है? उधर, कालाबाजारी करने वाले भी खुद को देश सेवा का भागीदार बता रहे हैं। कहते हैं, “हम तो व्यवस्था के साथ कदम मिलाकर चल रहे हैं!” असल में ये छापे खुद को शुद्ध करने की प्रक्रिया हैं, जहां नेता खुद ही पकड़ते हैं, खुद ही डांटते हैं, और फिर खुद को चाय पर भी बुला लेते हैं। जनता देख रही है और ताली भी बजा रही है, क्योंकि नाटक रोज़ बदलता है और टिकट भी नहीं लगता। राजनीति का नया मंत्र यही है, “बोलो कुछ भी, पकड़ो किसी और को!”
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राजस्थान टुडे, जुलाई 2025
राजनीति के साधु कम, बयान मंत्री ज़्यादा
बालमुकुंद आचार्य अब राजनीति के साधु कम, “बयानमंत्री” ज़्यादा लगने लगे हैं। किसी भी गंभीर मामले में जांच की मांग करना उनका प्रिय शगल बन चुका है। जैसे ही कोई विवाद उठे, आचार्यजी तुरंत सामने आते हैं, मानो जांच एजेंसियों ने उन्हें “मानद प्रवक्ता” नियुक्त कर दिया हो। सालेह मोहम्मद के सचिव की गिरफ्तारी पर भी उन्होंने बिना देर किए पूरे खानदान की छानबीन की अपील कर डाली। लगता है जैसे बालमुकुंदजी को हर फाइल पहले से दिख जाती है और हर केस में अंतिम फैसला सुनाने का विशेष अधिकार प्राप्त है। उनके बयान इतने नियमित हो चुके हैं कि अगर एक दिन न दें, तो मीडिया को शक हो जाए कि स्वास्थ्य तो ठीक है ना? राजनीति में गंभीरता ज़रूरी है, पर बयानबाज़ी से जब हर मुद्दा व्यक्तिगत मिशन बन जाए, तब लगता है— यह नेता नहीं, हर मंच का “स्वचालित प्रवक्ता” है।
बजरी-राजनीति का बहता सोना
राजस्थान में बजरी क्या हुई, राजनीति का बहता सोना बन गई। भीलवाड़ा के सहाड़ा क्षेत्र में भाजपा विधायक लादूलाल पितलिया अचानक जाग गए हैं। बोले— “लीज के नाम पर नदियों का चीरहरण हो रहा है।” अरे भइया, डेढ़ साल से आपकी ही सरकार है, अफसर आपके, पुलिस आपकी, नेता आप, फिर चोर कौन? क्या ये वही “अदृश्य शक्तियां” हैं जो चुनाव से पहले दिखती थीं? पितलिया कहते हैं— “मैं मुख्यमंत्री से बात करूंगा।” लगता है मुख्यमंत्री से मिलने के लिए अब विपक्ष जैसा नाटक करना पड़ेगा। शायद पोस्टर लेकर धरने पर भी बैठ जाएं— “मैं अपनी ही सरकार से नाराज़ हूं!” सरकार ने 35 करोड़ की विकास योजनाएं घोषित कीं— पर जब पुलिया बनेगी तब बनेगी, फिलहाल बजरी के ट्रैक्टर पहले निकल लें। वैसे एक बात तो माननी पड़ेगी, विधायक ने राजनीति का नया फार्मूला दिया है: “सत्ता में रहो, विरोध में दिखो, और जिम्मेदारी किसी और पर थोप दो!” बजरी बहे या शासन, जनता को बस धूल फांकनी है।
पहले चरण वंदना.., फिर विकास
राजस्थान में योजनाएं अब फाइलों में नहीं, पांवों में फंसी हैं! जोधपुर में शिक्षा मंत्री मदन दिलावर का कार्यक्रम था– “वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान”, मगर प्यासे बनाड़ के लोग न गंगा मांगे, न सरोवर– बस बोले, बालिकाओं के लिए स्कूल दे दो महाराज! और जैसे ही पूर्व सरपंच गोपाराम ने पांव पकड़ लिए, मंत्री जी तमतमा उठे— “अब तो बिल्कुल नहीं करूंगा!” वाह! लोकतंत्र में अब मांग का तरीका भी तय होगा? पहले आवेदन दो, फिर ट्वीट करो, फिर नेता जी की आरती उतारो, फिर पांव पकड़ो, तब शायद एक बालिका स्कूल मिलेगा– वो भी तब जब मंत्रीजी का मूड अच्छा हो। गोपाराम ने कान भी पकड़ लिए, मगर मंत्री बोले– “ऐसे माफ़ी नहीं मिलेगी!” मतलब, अब शायद 108 बार “जय दिलावरजी की” बोलो, तब जाकर बालिकाओं को स्कूल नसीब हो। शायद अगली कैबिनेट मीटिंग में एक नई योजना आए– “पांव पकड़ो, नीति पाओ!” शिक्षा मंत्रालय अब “शिष्टाचार मंत्रालय” बन चुका है। अगर पहले चरण वंदना करो, तभी विकास की कोई वंदना सुनाई देगी। मगर बालिकाएं पूछती हैं– “क्या हमारे स्कूल की किस्मत सिर्फ चरणों में गिरी मांग पर टिकी है?”
शांति की खोज में राजनीतिक यात्रा
अमीन खान साहब इन दिनों राजनीति में ‘आत्मा की शांति’ की खोज में हैं। कभी कांग्रेस के मज़बूत मीनार थे, अब हर पार्टी में छत तलाशते फिर रहे हैं। पहले बोले– “मैं तो वफादार कांग्रेसी हूं,” लेकिन जब टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय को आशीर्वाद दे आए। पार्टी ने भी कहा– “आपका वफादारी टेस्ट फेल है, छह साल के लिए ‘विश्राम’ लें। “फिर शुरू हुआ ‘मुलाक़ात महायज्ञ’। पहले गहलोतजी से मिलने पहुंचे, लेकिन रूट बदल गया– शायद जीपीएस में कांग्रेस का नैतिक कंपास खराब हो गया था। समर्थक भी भड़क उठे– “ये रूट कौन बदलवा गया?” सभी उंगलियां हरीश चौधरी की तरफ उठीं, जैसे राजनीति कोई क्राइम थ्रिलर हो गई हो। और अब, साहब सीधे पहुंच गए राजेंद्र राठौड़ के द्वार! वही राठौड़, जो विपक्ष में बैठकर कांग्रेस पर रोज़ तीर चलाते हैं, आज अमीन खान को फूलों की माला पहना रहे थे। राजनीति भी गजब है– जहां कल तक विरोधी थे, आज वही संभावित मित्र हैं। लगता है अमीन खान अब “राजनीति की ऊंची दुकान और फीका पकवान” का पोस्टर बनना चाहते हैं। अगले मोड़ पर किसके गले लगेंगे, ये तो बस उनके अगले ‘रूट’ से ही पता चलेगा!
रेल लाइन की पटरियों पर चुनावी इंजन
सिरोही तक रेल पहुंचने की घोषणा से रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव इतने भावुक हो गए कि लगा मानो खुद पटरी बिछाने निकल पड़ेंगे। वर्षों से अटकी मांग पर “अबकी बार रेल हमारी यार!” का नारा बुलंद हो गया है। भले ही अभी सिर्फ फाइनल लोकेशन सर्वे की स्वीकृति मिली हो, लेकिन जश्न ऐसे मन रहा है जैसे बुलेट ट्रेन पहुंच गई हो! जनता खुश है— कम से कम कागज पर तो रेल आई! मंत्रीजी ने रोजगार, व्यापार, पर्यटन, संगमरमर, ग्रेनाइट, उर्वरक सब गिनवा दिए। बस यह नहीं बताया कि सर्वे के बाद काम कब शुरू होगा, और पटरी पर ट्रेन कब चलेगी— या फिर यह भी किसी “चुनावी टाइम टेबल” में शामिल है? विकास की ये घोषणाएं अक्सर चुनावी बजट की तरह होती हैं— सुनने में शानदार, जमीन पर लाचार। सिरोही के लोग आज भी सोच रहे हैं कि जिस रेल को बिछाने की बात हो रही है, कहीं वो बयान वाली पटरियों पर तो नहीं दौड़ेगी? अब सिरोही को इंतजार है—रेल का नहीं, वादों से खाली प्लेटफॉर्म पर असली इंजन आने का। वरना कहीं ऐसा न हो कि लोग टिकट कटवाने से पहले ही कह उठें— “साहब, ये ट्रेन तो सिर्फ घोषणा स्टेशन तक ही जाती है!”






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