गली का डॉग — अब थोड़ा परेशान, थोड़ा हैरान
यह व्यंग्य आलेख गली के डॉग को केंद्र में रखकर दिखाता है कि कैसे एक साधारण, निश्चिंत जीवन जीने वाला डॉग अचानक एक कोर्ट फ़ैसले के बाद चर्चा, भ्रम और असहजता का पात्र बन जाता है। जिसे न पहचान चाहिए थी, न...

इस देश की गलियों में अगर कोई प्राणी सबसे ज़्यादा स्थायी है, तो वह है गली का डॉग। सरकारें आती-जाती रहीं, मौसम बदले, मोहल्लों के नाम बदले, लेकिन डॉग वहीं का वहीं—कभी उसी नाली के पास, कभी उसी चबूतरे पर, और कभी उसी दुकान के सामने, जहाँ से उसे वर्षों पहले पहली बिस्किट मिली थी। तभी से उसने तय कर लिया कि यह इलाका उसका है, और वह इसका।
लेकिन हाल के दिनों में गली का डॉग कुछ बदला-बदला सा है। पूँछ तो हिलती है, पर आत्मविश्वास के साथ नहीं। आँखों में वही पुरानी चमक है, मगर उसमें अब थोड़ी उलझन भी घुल गई है। वजह यह नहीं कि बिस्किट कम हो गई है या रोटी बासी मिलने लगी है, बल्कि वजह है—कोर्ट का फ़ैसला। ऐसा फ़ैसला, जिसने डॉग को खुश करने के बजाय उसे परेशान और हैरान कर दिया है।
गली का डॉग कोई साधारण प्राणी नहीं होता। उसे पता होता है कि कौन-सा घर किराए पर है, कौन-सा मकान मालिक बाहर गया है, किस गेट की कुंडी ढीली है और किस बच्चे को देखकर भौंकना है ताकि दिन भर का मनोरंजन पूरा हो जाए। वह मोहल्ले का अनौपचारिक सीसीटीवी है—बिना बिजली, बिना रखरखाव, और बिना वेतन।
पर अब समस्या यह है कि डॉग खुद नहीं समझ पा रहा कि उसका स्टेटस क्या है। पहले वह बस गली का डॉग था—न ज्यादा सवाल, न ज्यादा जिम्मेदारी। अब लोग उसे देखकर फुसफुसाते हैं, “ये वही वाला है…” और डॉग सोच में पड़ जाता है—“वाला कौन सा?”
सुबह पाँच बजे से उसकी ड्यूटी शुरू होती है। मॉर्निंग वॉक करने वालों को वह पहले की तरह ही देखता है, लेकिन अब भौंकने से पहले रुकता है—सोचता है, “भौंकूँ या शालीन बना रहूँ?” दूधवाले से पुरानी संधि अब भी है, मगर उसमें भी संकोच आ गया है। कहीं ऐसा न हो कि ज़्यादा दोस्ती को कोई गलत मतलब दे दे।
गली का डॉग हमेशा लोकतंत्र में विश्वास करता रहा है। वह सब पर समान रूप से भौंकता था। अब भौंकने में भी आत्मचिंतन आ गया है। जिसे देखकर वह पहले बिना सोचे दौड़ाता था, अब उसे नाप-तोल कर देखता है—“ये शिकायत करने वाला तो नहीं लग रहा?”
सबसे बड़ी हैरानी तो डॉग को खुद पर है। वह कभी खुद को “आवारा” नहीं मानता था। अब लोग उसे समझाने लगे हैं कि वह विशेष श्रेणी में आता है। डॉग सोचता है, “मैं तो बस यहाँ बैठा था, ये सब बीच में कहाँ से आ गया?”
मोहल्ले में नए लोग पहले घर ढूँढते थे, अब डॉग को देखकर राय बनाते हैं। कुछ ज़रूरत से ज़्यादा प्यार दिखाते हैं, कुछ ज़रूरत से ज़्यादा डरते हैं। डॉग दोनों से असहज है। उसे न हीरो बनना था, न मुद्दा।
रात के सामूहिक भौंक कार्यक्रम में भी अब वैसी ऊर्जा नहीं रही। सीनियर डॉग अनुभव बाँटते हैं—“पहले हालात आसान थे।” छोटे डॉग पूछते हैं—“अब क्या करेंगे?” किसी के पास जवाब नहीं है।
विडंबना यह है कि डॉग को न घर चाहिए था, न पहचान, न चर्चा। उसे बस अपनी गली चाहिए थी। लेकिन फैसलों की दुनिया ने उसे वहाँ ला खड़ा किया है, जहाँ वह खुद से पूछ रहा है—“क्या अब गली भी वैसी ही रहेगी?”
जिस डॉग ने कभी कुछ माँगा नहीं, वही आज सबसे ज़्यादा परेशान और हैरान है। वह अब भी वहीं बैठा है, उसी चबूतरे पर, पर इस बार आँखें बंद करके नहीं—आँखें खोलकर सोचते हुए, कि इतना बड़ा फ़ैसला उसके लिए ज़रूरी भी था या नहीं।






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