मुक्त छंद कविता या कविता की कला से मुक्ति
कविता सिर्फ शब्दों का खेल नहीं, बल्कि भावनाओं का गहरा समंदर है। पर क्या आज की मुक्त छंद कविता अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है? क्या यह सिर्फ विचारों का सूखा संप्रेषण बन कर रह गई है? इस लेख में, दिनेश...

दिनेश सिंदल,
कवि, लेखक
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साहित्य एक कला है। कला का गुण यह है कि वह हमारी चेतना और मस्तिष्क को इस प्रकार जागरुक कर देती है कि संसार की हर वस्तु, हर दृश्य, हर घटना हमें सुंदर दिखाई देने लगती है और हमें उससे प्रेम हो जाता है। कविता भी एक कला है जो हमें संवेदनशील बनाती है। हमारे मन- मस्तिष्क पर अपने प्रभाव से हमारे भीतर उच्च मानवीय गुणों का संचार करती है। कविता शब्दों की कलात्मक रचना है जो गद्य से अलग है। जिसमें लय है, ताल है। वह एक विशेष पैटर्न, जिसे नरेश सक्सेना डिजाइन कहते हैं, का पालन करती है और पाठक की कल्पना और भावनाओं को आकर्षित करने का प्रयास करती है। कवि, कविता के माध्यम से पाठक व श्रोता तक अपनी भावनाओं का संप्रेषण करता है, वह उसे जगाता है और दुनिया को अलग तरह से देखने की चुनौती देता है।
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कविता का उद्देश्य भावनाओं का संप्रेषण है, न कि विचारों का। आज मुक्त छंद कविता के नाम पर लिखी जा रही हिंदी की अधिकांश रचनाएं मात्र विचार संप्रेषण पर आकर अपने उद्देश्य की इतिश्री कर रही है। विचार भी मेरा विचार। मुक्त छंद कविता के कवियों ने विचार को भी कुछ विषयों में सीमित कर रखा है। वो विषय है तो ही विचार है। उससे इतर है, तो वह विचार नहीं है। इसका परिणाम यह हुआ कि आज हिंदी में मुक्त छंद कविता के नाम से अधिकांश कविता नहीं लिखी जा रही, गद्य लिखा जा रहा है, विचार लिखा जा रहा है। हिंदी में मुक्त छंद कविता की शुरुआत निरालाजी से मान सकते हैं। इनकी कविता ‘जूही की कली’ को हिंदी की पहली मुक्त छंद कविता कह सकते हैं।
पश्चिम से आया और हिंदी में भटका हुआ रूप
हिंदी से पहले 1855 में पहली बार वाल्ट व्हिटमेन ने छंद मुक्त का प्रयोग किया। उनकी पुस्तक ‘लीव्स ऑफ ग्रास’ की अधिकांश कविताओं में तुकांत योजना और छंद का अभाव था। उसके बाद छंद मुक्त कविता अंग्रेजी भाषा में फलने- फूलने लगी। यह कविता के कलात्मक मानडंडों से अलग अभिव्यक्ति की ओर एक बड़ा कदम था। पश्चिम से आई छंद मुक्त कविता के अनुसरण में हिंदी ने भी अपनी पारम्परिक कविता से अलग छंद मुक्त को अपनाया। फलस्वरूप कविता ऐसी भटक गई कि आज वह गद्य बनकर रह गई। पश्चिम में छंद मुक्त ठीक रहा होगा, किंतु हिंदी व उर्दू या कहूं कि भारतीय भाषाओं की एक अलग तासीर है, एक अलग मिजाज है। हिंदी व उर्दू के शब्दों में एक संगीत है। उनकी ध्वनयात्मकता है, जो उनके भाव संप्रेषण को सहज बनाती है।
मुक्त छंद में खो रही कविता की आत्मा
शब्द में एक विशिष्ट ध्वनि होती है और जब इन ध्वनियों को एक साथ लय व भाव के साथ प्रस्तुत किया जाता है तो संगीत पैदा होता है। हर शब्द में कुछ स्वर होते हैं और जब ये स्वर एक निश्चित लय और ताल में एक साथ आते हैं तो संगीत का रूप ले लेते हैं। लयात्मकता की वजह से कविता के पाठक का रिश्ता शब्द के अर्थ संसार के साथ- साथ शब्द में छुपे संगीत से भी बनता है। जब शब्द और उसका संगीत एक साथ पाठक तक पहुंचते हैं तो भाव संप्रेषण में ज्यादा असर कारक होते हैं। यह लय और ताल यति और गति से बनती है। जिसका अभाव आज की छंद मुक्त कविता में हमें दिखाई देता है।
संगीत को एक ऐसी सार्वभौमिक भाषा माना गया है जो शब्दों के पार जाकर भावनाओं को अभिव्यक्त करती है। यह हमारे कलेक्टिव कॉन्शसनेस से आती है। इसीलिए हमें संगीत सुनने के लिए किसी विशेष भाषा को सीखने की आवश्यकता नहीं होती।
वर्ड्सवर्थ कहते हैं कि- Poetry is spontaneous overflow of powerful feeling.
क्या वह ‘ओवरफ्लो’ आज की कविता में दिखाई देता है? या हमने सिर्फ छंद की अज्ञानता के कारण ही मुक्त छंद की ओर अपना रुख किया है?
कला का उद्देश्य: भाव संप्रेषण या बाज़ार की मांग?
यह सच है कि जब चेतना नृत्य करती है तो वस्तु भी नृत्य करने लग जाती है। इस नृत्य में कोई अनुशासन नहीं होता। इस नृत्य का कोई तकनीकी, कलात्मक और औपचारिक रूप नहीं होता। मीरा की चेतना जब कृष्ण के प्रेम में नाचती है तो साथ- साथ जड़ यानि शरीर भी नाचने लगता है। यह नाच एक सामान्य, अनौपचारिक, आनंदमय गतिविधि है। इसका कोई व्याकरण नहीं, कोई सिद्धांत नहीं। जिस तरह मंथर गति से बहने वाली कोई नदी जब अपनी पूरी चेतना के साथ बहने लगती है, पूरे आवेग के साथ बहने लगती है, तब वह किनारों के बंधन को स्वीकार नहीं करती। उन्हें तोड़ देती है। ठीक यही बात कविता के साथ भी है। जब कविता लिखते वक्त कवि अपनी चेतना के उच्चतर स्तर पर होता है, तब वह छंद के बंधन को, उसके अनुशासन को स्वीकार नहीं करता, उसे तोड़ देता है।
लेकिन हिंदी के कवि के पास अपनी बात कहने का आग्रह है। वह अपना विचार कविता के माध्यम से बाहर लाना चाहता है। ताकि उसकी कविता की जरूरत और उसकी उपयोगिता तय हो सके। उसकी चिंता भाव के स्तर पर पाठक का रूपांतरण करने की नहीं है। भाव में आपकी नीयत, आपका पक्ष स्पष्ट दिखाई नहीं देते। विचार में आपकी नियत स्पष्ट दिखाई देती है। जिससे बाजार आपकी उपयोगिता और जरूर तय कर सकता है। बाजार सदैव कला का विरोधी रहा है। क्योंकि कला क्रेता- विक्रेता, दलित- स्वर्ण, छोटा- बड़ा, काला- गोरा, हिंदू- मुस्लिम के सभी भेदों को खत्म करके मनुष्य को मनुष्य की तरह देखने का आग्रह करती है। जो बाज़ार के किए सुविधाजनक नहीं है।
एक बच्चा पेड़ से नाराज यूं हर बार था,
फल लगा जब पेड़ पर तो बीच में बाजार था.!
यूं लगा मुझको, मैं जैसे घूम आया कत्लगाह
सामने उसने रखा जब आज का अखबार था..!!
आज इतना ही। फिर कभी किसी नए विषय के साथ।






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