अभिव्यक्ति : रचना की बजाय आत्म- प्रचार पर जोर
सचमुच अधिकांश लोग व्यक्ति के वास्तविक गुणों को नहीं देख पाते। वे उसकी बाह्यी प्रतिष्ठा, उसके आत्म- विज्ञापन को आदर देते...

दिनेश सिंदल,
वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवि
दिल्ली में एक बार विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपने अभिनंदन समारोह के अवसर पर कुछ इस तरह के भाव व्यक्त किए थे- मेरे देश के भाई मेरा इसलिए आदर नहीं करते हैं कि मैं सचमुच कवि हूं। वे तो केवल मुझे इसलिए कवि मानते हैं कि मुझे कविता पर नोबेल पुरस्कार मिल चुका है और विदेशों में मेरा आदर- सत्कार होता है।
सचमुच अधिकांश लोग व्यक्ति के वास्तविक गुणों को नहीं देख पाते। वे उसकी बाह्यी प्रतिष्ठा, उसके आत्म- विज्ञापन को आदर देते हैं।
अतः आज का रचनाकार रचना पर कम व उसके प्रचार-प्रसार व आत्म- प्रचार पर ज्यादा श्रम करता है। वह कोशिश करता है कि उसकी किताबें छपे, उनके विमोचन के भव्य कार्यक्रम हो, उसे मालाओं, शॉलों से लाद दिया जाए। जगह- जगह उसे पुरस्कार, सम्मान मिले। अखबारों में उसकी फोटो छपे।
यह सब पाने के लिए कुछ पुरस्कार- समारोह तो वह स्वयं आयोजित करता है। अपने किसी मित्र को अपने शहर में बुला कर सम्मानित करता है। बदले में मित्र उसे अपने शहर में बुला कर सम्मानित करता है। इस तरह सम्मानों- पुरस्कारों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार होती है। फिर वह इसी फेहरिस्त को लेकर सरकारी प्रतिष्ठानों में घूमता है। अकादमियों के चक्कर लगाता है और अनुकूल सरकार आने पर वह सरकारी पुरस्कार भी पा लेता है।
कांटे पर लगे आटे की तरह है सरकारी पुरस्कार
यहां यह भी कहना चाहूंगा की सरकारी पुरस्कार कांटे पर लगे आटे की तरह होते है। मछुआरे का उद्देश्य मछली को आटा खिलाना नहीं होता, उसे कांटे में फंसाना होता है।
इसीलिए आज की अधिकांश कविता, कविता न रह कर पद पुरस्कार पाने की एक कागजी कार्यवाही बन कर रह गई है।
अपने ही विद्यार्थियों, अपने ही दल (गुट कहूं तो ज्यादा अच्छा रहेगा) के लोगों द्वारा अपने पर लिखवाना। फिर उसे छपवाने के लिए सम्पादकों को खुश करना। पुरस्कार के लिए गुटबाजी करना। अकादमी पदाधिकारियों की, अफसरों की जी हजूरी करना। सरकारी दफ्तरों की दौड़-धूप। न जाने क्या- क्या करना पड़ता है आज के रचनाकार को।
स्वयं के खर्चे से विदेश यात्राएं करना। उसके प्रचार-प्रसार के लिए मित्रों द्वारा अपने ही पैसों से अपने सम्मान में समारोह आयोजित करवाना। अपनी रचनाओं का अन्य भारतीय व विदेशी भाषों में पैसे देकर अनुवाद करवाना। अपने पैसों से उसे छपवाना। आत्म प्रचार के लिए ऐसे ही कार्यो में रत रहता है आज का कवि।
ऐसे में आप लेखकीय स्वाभिमान या सेल्फ रेस्पेक्ट की बात तो सोच ही नहीं सकते।
सम्मान, अलंकार, तालियां, वाह-वाह, लिफाफे, ये सभी अच्छा हैं, ठीक है। पर हां! ये तब तक ठीक है जब तक कि आप इसके द्वारा मानवता को न भूल जाओ। एक रचनाकार के दायित्व को न भूल जाओ। इन सब का आनंद लो, मगर इनसे जुड़ो मत। इन्हें पा लो, मगर इन पर अपनी पहचान को मत टिकाओ। इन्हें चाहो, मगर उनकी कामना मत करो। यह सब बनावटी शक्ति के विभिन्न रूप है। जो आपके अहंकार को बड़ा ही करेंगे।
अफसर की बजाए लेखक होना बेहतर
शरद जोशी ने एक जगह कहा था, आदमी के पास अगर दो विकल्प हो कि वह या तो बड़ा अफसर बन जाए और खूब मज़े करें या फिर छोटा मोटा लेखक बन कर अपने मन की बात कहने की आजादी अपने पास रखें। तो भाई, बड़े अफसर की तुलना में छोटा लेखक होना ज्यादा मायने रखता है। उन्होंने कहा, लेखक के पक्ष में एक और बात जाती है कि उसके नाम के आगे कभी स्वर्गीय नहीं लगता।
आज की हमारी समीक्षा भी रचना का मूल्यांकन नहीं करती, वह रचनाकार का मूल्यांकन करती है। आज का श्रोता व पाठक भी रचना को नहीं सुनता- पढ़ता। वह रचनाकार को सुन/पढ़ रहा होता है। यही कारण है कि हम किसी रचनाकार को उसके पद, उसके पुरस्कारों की लंबी फेहरिस्त के साथ प्रस्तुत करते हैं। ताकि श्रोता उसे बड़ा लेखक समझ कर सुने।
यहां मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं हो रहा कि इस दौर के अधिकांश कवि, कविता के नाम पर या तो किसी राजनीतिक पार्टी का घोषणा-पत्र लिख रहे हैं या पद, प्रतिष्ठा, पुरस्कार पाने के लिए कागजी कार्रवाई कर रहे हैं।
एक वाकया है- एक बार ट्रेन में दो व्यक्ति यात्रा कर रहे थे। परिचय करने के लिए एक ने दूसरे से पूछा- आप क्या करते है? दूसरे ने जवाब दिया- कवि हूं। सुनते ही पहला बोला कौन सी पार्टी के?
बालकवि बैरागी कहा करते थे कि साहित्य मेरे सर का ताज है। राजनीति को में अपने पांव की जूती समझता हूं। पर कभी- कभी सर के ताज की रक्षा के लिए जूती को हाथ में लेना पड़ता है। हां, इतना तक तो ठीक है, किंतु ये क्या की जूती को ही सर पर उठा कर घूमते रहें।
इसीलिए आज कविता ने अपना श्रोता खो दिया, अपना पाठक खो दिया। कवि ने अपनी गरिमा खो दी। उसका सामाजिक हस्तक्षेप खत्म-सा हो गया।
विंस्टन चर्चिल ने कहा था की महानता की कीमत जिम्मेदारी है। किसी समाज की दुर्दशा चोर उचक्कों से नहीं, बुद्धिजीवियों के निक्कमेपन से होती है।
मैं देख रहा इस तरह दुनिया के हाल को
जैसे मरीज देखता है अस्पताल को
ये क्या हुआ कि गुम वो अंधेरों में हुए हैं
रखना था जिन्हें थाम के जलती मशाल को
आज इतना ही।
फिर कभी किसी नए विषय के साथ।






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