रचना के जरिए खुद को ढूंढता है रचनाकार
साहित्यकार समाज की विसंगतियों को, विद्रूपताओं को ज्यों का त्यों सामने नहीं रखता, संवेदनात्मक तरीके से सामने रखता है। जिसे संवेदनात्मक ज्ञान कहा है। यह संवेदना पहले रचनाकार को रचती है। ‘हुआ करती जब...

साहित्य की आंख कैमरे की आंख नहीं, इससे कुछ ज्यादा है
– दिनेश सिंदल,
कवि एवं गीतकार
कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। किसी समय विशेष में समाज की स्थिति क्या थी.. इसे समझने के लिए हमें भूतकाल में जाने की जरूरत नहीं है, केवल उस समय के साहित्य का अध्ययन ही हमें उस समय के समाज से रु-ब-रु करवा देता है। इसका अर्थ ये लिया जाता है कि समाज में जो कुछ भी हो रहा है, साहित्य उसे ज्यों का त्यों समाज के सामने रखता है। उसे उकेरता है, उसे चित्रित करता है। लेकिन ऐसा नहीं है। साहित्य की आंख कैमरे की आंख नहीं है।
हां, साहित्य वह दर्पण है जिसमें समाज अपना चेहरा देखता है। साहित्य समाज के चेहरे के साथ साथ उसके अंतर मन को भी उसके सामने प्रकट करता है। कोई रचनाकार समाज का एक कैमरे की तरह चित्र नहीं उतारता। वह उसे रचता है। रचनाकार की आंख कैमरे का लेंस नहीं है। वह उससे कुछ ज्यादा है। वह जब देखता है तो केवल उसकी भौतिक आंख ही काम नहीं करती, बल्कि उसकी मन की आंख भी काम करती है, वह भी देखती है। साहित्यकार जो कुछ भी इस समाज में अपनी भौतिक आंख से देखता है, उसमें कुछ जोड़ता है और उसे जोड़ने के बाद वह चित्रित करता है, प्रकट करता है।
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राजस्थान टुडे, जुलाई 2025
सूरदास ने कृष्ण के जिस बाल रूप को देखा है, वह केवल सूरदास की भौतिक आंख से देखा गया कृष्ण का रूप नहीं है। वह उससे कुछ ज्यादा है, जो कैमरे की आंख नहीं दिखा सकती। मुझे महान चित्रकार पिकासो की एक घटना याद आती है। एक व्यक्ति पिकासो के पास जाता है। वह पिकासो से अपनी पत्नी का चित्र बनाने का आग्रह करता है। वह अपनी जेब से अपनी पत्नी का एक छोटा सा फोटो निकाल कर पिकासो को देते हुए कहता है कि मेरे लिए आप इसका एक बड़ा पोर्ट्रेट बना दे। पिकासो चित्र रख लेता है और कुछ दिनों बाद आकर पोट्रेट ले जाने को कहता है। कुछ दिनों बाद वह व्यक्ति पोट्रेट लेने आता है। पिकासो उसे पोट्रेट देता है। वह व्यक्ति देखता है कि पिकासो द्वारा बनाया गया चित्र उसकी पत्नी के चित्र से बिल्कुल मेल नहीं खा रहा है। वह उसे देखते ही भड़क जाता है। ये क्या बनाया है आपने? ये तो मेरी पत्नी के चेहरे से बिल्कुल मेल ही नहीं खा रहा। वह फोटो दिखाते हुए कहता है। देखो इसमें मेरे पत्नी की नाक कितनी छोटी है, आपने कितनी बड़ी और ऊंची बना दी। इस फोटो में उसकी आंखें कैसी हैं, आपने ये कैसी बना दी। पिकासो उसे समझाते हुए कहता, ‘तुम्हारी पत्नी बड़ी अहंकारी है, उसकी नाक इतनी ऊंची ही होनी चाहिए। वह बहुत गुस्सैल है, उसकी आंखें प्रेम बरसाती हुई नहीं.. आग उगलती हुई ही होनी चाहिए। यही तुम्हारी पत्नी का सही चित्र है।’
साहित्यकार का संवेदनात्मक ज्ञान
साहित्यकार समाज की विसंगतियों को, विद्रूपताओं को ज्यों का त्यों सामने नहीं रखता, संवेदनात्मक तरीके से सामने रखता है। जिसे संवेदनात्मक ज्ञान कहा है।
यह संवेदना पहले रचनाकार को रचती है। ‘हुआ करती जब कविता पूर्ण, हुआ करता कवि का निर्माण।’ पहले कवि का निर्माण होता है। साहित्य पहले रचनाकार को रचता है। उसके होने के अर्थ से उसका परिचय करवाता है। एक रचनाकार रचना के माध्यम से अपने होने को ढूंढता है। वह अपनी स्वयं की तलाश में निकलता है।
अतः हमें एक बार रुक कर देख लेना चाहिए कि कविता के नाम पर कहीं हम अपनी कुंठाएं तो नहीं परोस रहे?
क्या कभी आपने स्वयं के लिए ताली बजाई..?
आपकी कविता आपको कितना सुख देती है? या आपको तभी सुख देती है जब कोई उस पर ताली बजाता है। कोई उस पर पुरस्कार देता है। फिर आप उस कोई और के इशारे पर चलते हैं। उस कोई और का काम होता रहता है और आपकी आत्मा कूड़े करकट के नीचे दबती रहती है। क्योंकि आपने कभी अपनी आत्मा के लिए तो गाया ही नहीं। कभी एकांत में अपना गीत अपने आप को तो सुनाया ही नहीं। कभी क्या आपने स्वयं के लिए ताली बजाई..? अपनी कविता पर खुश हो कर..। स्वयं को कोई पुरस्कार दिया..? स्वयं ने ताली बजा दी होती तो भीड़ की तालियों की याद नहीं रहती, भीड़ की तालियां प्रभावित नहीं करती। वह बजाए.. चाहे नहीं बजाएं।
कवि वह सपेरा है जिसकी पिटारी में सांपों की जगह लोगों के दिल बंद होते हैं। लेकिन उसमें एक दिल उसका अपना भी है और रचना उसके हृदय का प्रकटीकरण है। कागज पर रचना के माध्यम से कवि का दिल ही उतरता है। कवयित्री ‘ अदा ‘ का एक शेर है –
कहती दुनिया देख ‘अदा’ ने शेर कहे
कागज़ पर ये दिल उतरा है ऐसे ही
रचना पहले रचनाकार से संवाद करती है। वह उसके आत्मशोधन, आत्मशुद्धि का कारण बनती है। फिर समाज तक पहुंचती है।
शेर जब सिक्कों में ढलकर आ गए
हम अदब से दूर चल कर आ गए
छोड़ कर हमको कहां जाती नदी
देखने पर्वत पिघल कर आ गए
बात तो दिल को बदलने की हुई
आप तो कपड़े बदल कर आ गए..
आज इतना ही..
फिर कभी किसी नए विषय के साथ।






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