शायरों की दीवाली और दीवाली की शायरी
उर्दू के बनने संवरने में अगर हिंदुओं की साझेदारी ना होती तो यह अस्तित्व ही में ना आ सकती थी। अतः उर्दू ने जहां इस धरती की एक-एक चीज को गले लगाया, वहीं इस देश की महानता के गीत भी...

दिनेश सिंदल,
कवि व लेखक
त्योहारों का आधार धार्मिक होता है। लेकिन हमारी भारतीय संस्कृति की तासीर ही कुछ ऐसी है कि यहां सब त्योहार सबके हो जाते हैं। हम होली, दिवाली, ईद सभी एक साथ मनाते हैं। मौलवी अब्दुल हक ने अपने अभिभाषणों में लिखा है कि उर्दू के बनने संवरने में अगर हिंदुओं की साझेदारी ना होती तो यह अस्तित्व ही में ना आ सकती थी। अतः उर्दू ने जहां इस धरती की एक-एक चीज को गले लगाया, वहीं इस देश की महानता के गीत भी गाए।
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दिवाली की रोशनी भी हमारे फनकारों पर एक सी बरसी। कईं उर्दू के शायरों ने ‘दिवाली’ की रौशनी से अपनी शायरी को रोशन किया तो कईं शायरों की शायरी से दिवाली रोशन हुई।
‘नज़ीर अकबराबादी’ अपनी लंबी नज़्म ‘दिवाली का सामान’ में दिवाली की खुशी को कुछ यूं व्यक्त करते हैं-
हर इक मकां में जला फिर दीया दिवाली का
हर इक तरफ को उजाला हुआ दिवाली का
सभी के दिल में समां भा गया दिवाली का
किसी के दिल को मज़ा खुश लगा दिवाली का
अजब बहार का है दिन बना दिवाली का
वही ‘आले अहमद सुरूर’ अपनी नज़्म ‘दिवाली’ में इस दिन का सुंदर वर्णन यूं करते हैं-
गजब है लैलए- शब (रात की दुल्हन) का सिंगार आज की रात
निखर रही है उरूसे- बहार (बहार की दुल्हन) आज की रात
इन आंधियों में बशर मुस्कुरा तो सकते हैं
सियाह रात में शम्मे जला तो सकते हैं
‘आले अहमद सुरूर’ दीप जलाने की बात करते हैं तो ‘हुरमतुल इकराम’ को अंधेरे के खिलाफ इस जंग में मिट्टी के दीए भी बाण की तरह चलते प्रतीत होते हैं। वे अपनी नज़्म ‘लवों की रेखा’ में कहते हैं कि-
रोशनी आग भी है रोशनी हनुमान भी है
रात रावण है खिंची रहने दो लम्हों की कमां
बान पर बान चलते रहे मिट्टी के दीए
झिलमिलाता रहे आईने सदाकत तलबी (सच्चाई की मांग का विधान)।
वे कहते हैं कि तुलसी का तो नाम है, दीए रामायण लिखते हैं।
नाम तुलसी का है लिखते हैं दीए रामायण
रूह बनवास के शोलो पे नुमू (विकास) पाती है।
इन्हें कैकई की जीत में भी हार लगती है और राम की हार में भी जीत –
कैकेई जीत के हार है, अमावस है यही
राम की हार में भी जीत यह दिवाली है
वे कहते हैं कि ‘रोशनी पुल है अंधेरा है समंदर के लिए’ और
रात दिवाली की आई है उजालो इसको
नींद में कब से यह नगरी है जगा लो इसको
‘शमीम करहानी’ दिल का दीया जलने की बात करते हैं। वे अपनी नज़्म ‘ तकवीमे नूर’ (प्रकाश का पंचांग) में लिखते हैं कि-
बढ़े जो जुल्मते दौरा तो मुस्कुराते रहो
हवा प्रचंड में दिल का दीया जलाते रहो
दीए जलाओ मुसलसल जलाओ आज की रात
अलग-अलग शायरों ने अलग-अलग तरीके से दीपावली को देखा है। किसी को ये मोहब्बत के फूल बरसाती हुई लगती है तो किसी को अपनी हस्ती ही दिवाली के दीयों सी लगती है। कोई उसके शहर में दशहरा आता देख अपने घर में दिवाली की तैयारी करने लग जाता है तो कोई अपने दिल का दीया जलाने की बात करता है-
कई इतिहास को एक साथ दोहराती है दिवाली
मोहब्बत पर विजय के फूल बरसती है दिवाली
– नजीर बनारसी
हस्ती का नजारा क्या कहिए, मरता है कोई जीता है कोई
जैसे की दिवाली हो कि दीया, जलता जाए बुझता जाए
– नुशूर वाहिदी
जो सुनते हैं कि तेरे शहर में दशहरा है
हम अपने घर में दिवाली सजाने लगते हैं
– जमुना प्रसाद राही
अजब बहार का है दिन बना दिवाली का
जहां में यारों अजब तरह का है ये त्यौहार
– नज़ीर अकबराबादी
एहसान दानिश को दिवाली का दीया हवाओं से मुठभेड़ करता हुआ दिखता है तो मोहम्मद अल्वी को खिड़कियों से झांकती हुई ये रोशनी भीतर के चिराग की याद दिलाती है। असरारूल हक असरार और मजिद अल बाकरी दिल का दीया जलाने की बात करते हैं।
जैसे दिवाली की शब हल्की हवा के सामने
गांव की नीची मुंडेरों पर चिरागों की कतार
– एहसान दानिश
खिड़कियों से झांकती है रोशनी
बत्तियां जलती है घर- घर रात में
– मोहम्मद अल्वी
घर की मुंडेरों पर बरपा है, दिवाली का सारा जश्न
कैसे हो अंदर भी चारागा मैं भी सोचूं, तू भी सोच
– असरारुल हक असरार
बीस बरस से इकतारे पर मन की जोत जलाता हूं
दीवाली की रात को तू भी कोई दीया जलाया कर
– मजिद अल बाकरी
नजीर बनारसी को रोशनी निगाहों का मुकद्दर नजर आती है तो जिगर मुरादाबादी इस रोशनी की बारिश में मोहब्बत की चमक देखते हैं-
निगाहों का मुकद्दर आ के चमकती है दिवाली
पहन कर दीप- माला नाज़ फरमाती है दिवाली
– नजीर बनारसी
जहां में नूर की बारिश हो वो दिवाली हो
हर एक दिल में मोहब्बत की चमक हो वो दिवाली हो
– जिगर मुरादाबादी
बशीर बद्र दिल में उजाला करने को दीपावली कहते हैं तो कैफ़ी आज़मी दर्द को रोशनी में डुबोने की बात करते हैं-
दीए तो घर-घर में जलते हैं ये रिवायत है
मगर जो दिल में उजाला करें वही दिवाली है
– बशीर बद्र
दिवाली की ये रात भी कितनी हसीं लगे
हर दर्द को रोशनी में डुबो दे जैसे
– कैफ़ी आज़मी
अहमद फ़राज़ और वसीम बरेलवी चिराग/ रोशनी को उस परम चेतना से जोड़ते हैं। परवीन शाकिर को भी दिवाली उसी के नाम की लगती है-
तू रोशनी है तो घर-घर में उतर क्यों न जाए
तेरा नाम ले के दिवाली मनाए लोग
– अहमद फ़राज़
हर एक चिराग में अब तेरी याद जलती है
दिवाली आए तो कुछ और सजा देता हूं
– वसीम बरेलवी
रात आई तो चिरागों की तरह मुस्काए
दिवाली भी तेरे नाम की लगती है मुझको
– परवीन शाकिर
निदा फाजली दीपावली के दीप को रोशन करने के साथ- साथ रूह को रोशन करने को सच्ची दिवाली मानते हैं। वही राहत इंदौरी हर तरफ फैले अंधेरे को देख दीया जलाने की बात करते हैं।
दीप जलाओ तो ऐसे की रूह तक रोशनी हो
बस दिखावे की नहीं, दिल की दिवाली हो
– निदा फाजली
हर तरफ फैला अंधेरा है तो क्या गम करना
एक दीया तू भी जला दुनिया में उजाला कर दे
– राहत इंदौरी
सच में मित्रों, अंधेरे का कोई अस्तित्व नहीं है। अंधेरा विधायक नहीं है। यह मात्र रोशनी की अनुपस्थिति है। आप चाहे किसी कमरे के अंधकार को ढकेल कर बाहर कर दें तो नहीं कर सकते, बस दीप जला सकते हैं अंधकार अपने आप मिट जाएगा। इसीलिए हमारे सभी फनकारों ने रोशनी को लाने की बात कही है, दीए को जलाने की बात कही है। ताकि सच प्रकट हो जाए।
आओ! हम अपने भीतर सच का एक दीप जलाएं, ताकि हमारे भीतर फैला क्रोध, वासना, नफरत का अंधकार करुणा, ब्रह्मचर्य और प्रेम में रूपांतरित हो सके। आमीन।
दिनेश सिंदल के दोहे –
हर घर खुशहाली रहे, हर घर मंगल गीत।
दीवाली के साज पर, हो ऐसा संगीत।।
भीतर के अंधियार से, लड़ने को तैयार।
उजियारे का आएगा, तब सच्चा त्योहार।।
सबके लब पर आ गए, रोशनियों के गीत।
दीवाली पर हो गई, उजियारे की जीत।।
अंधियारे से क्यों कोई, ‘सिंदल’ हो भयभीत।
दीपक से दीपक जले, दिवाली की रीत।।
दीवाली पर दूरियां, छोड़ो रहो समीप।
कर उजियारा कह रहे, ये माटी के दीप।।
धन वैभव सुख संपदा, हर घर मंगल गीत।
तब मैं मानूं हो गई, उजियारे की जीत।।
हर घर में उल्लास हो, खुशियों की बारात।
हर घर को रोशन करें, दिवाली की रात।।






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