नव वर्ष पर गूंजते कविता के स्वर
नव वर्ष के अवसर पर कविता समय की गति स्मृति और कल्पना के बीच सेतु बनती है। काल चक्र नए वर्ष की आहट के साथ सृजन परिवर्तन और नई चेतना का आह्वान करता है। यह आलेख कविता के माध्यम से जीवन समाज और समय के...

अभिव्यक्ति : काल चक्र के बीच कविता का शाश्वत और संवेदनशील संवाद
दिनेश सिंदल,
कवि, लेखक
21वीं सदी अपनी रजत जयंती मना रही है। हम 26वें पायदान पर कदम रख रहे हैं। पच्चीस हमारी स्मृति में चला जाएगा, और छब्बीस हमारी कल्पना से जन्म लेगा।
काल को हम तीन खंडों में विभाजित करके देखते हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान। भूतकाल यानी अतीत हमारी स्मृतियां हैं व भविष्य हमारी कल्पनाएं। समय अतीत और भविष्य से बना है। वर्तमान तो बस वह बिंदु है, जहां भविष्य अतीत में बदलता है। काल (समय) हर चीज को मिटा देता है, खत्म कर देता है, इसीलिए काल का एक अर्थ मृत्यु भी है।
सनातन परम्परा में हमने काल को चक्राकार माना है।
‘कालचक्र’ में कहा गया है, समय का पहिया कभी रुकता नहीं है। वह सतत चलता रहता है। इसीलिए कृष्ण ने कहा था कि जब-जब धर्म का नाश होगा तब-तब मैं आता रहूंगा।
हमने अपनी सुविधा के लिए समय को वर्षों, महीनों, सप्ताहों में बांट दिया है। इसीलिए हमें दिसंबर, जनवरी से बारह मास दूर लगता है। किंतु समय के चक्र में वे दूर नहीं है। मेरे एक गीत की कुछ पंक्तियां देखें-
तुम धारा हरियल तो नीला
मैं भी अंबर हो गया
तुम हुई मेरी जनवरी
मैं दिसंबर हो गया
यूं तो कहने को हमारे
बीच बारह मास हैं
पर समय के चक्र में तुम
देख लो हम पास हैं
बीच आकर फिर खड़ा ये
इक कैलेंडर हो गया
मित्रों, काल अपने नए रूप में, दो हजार छब्बीस बनकर हमारे सामने है। हर बार हम सोचते हैं कि आने वाला वर्ष कुछ नया लेकर के आएगा। हमारे रचनाकार मित्र भी ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि कुछ नया हो। जो हो रहा है उससे कुछ अलग। मुझे यहां निरालाजी की पंक्तियां याद आती हैं-
वर दे वर दे वीणा वादिनी वर दे।
प्रिय स्वतंत्र – रव, अमृत- मंत्र नव
भारत में भर दे
नव गति, नव लय, ताल- छंद नव
नवल कंठ, नव जलद- मंद्ररव
नव नभ के नव विहग- वृंद को
नव पर, नव स्वर दे।
कवि, जगत-कल्याण की बात करता है। मनुष्य के कल्याण की बात करता है। वह कामना करता है कि नई गति, नई लय और नया ताल- छंद संसार में आएं। नए कंठ यानि की नए कलाकार आएं। नए मेघों की गर्जना सुनाई दें। आसमान में नए पक्षियों के समूह उड़ें और उन्हें नए पंखों के साथ नए स्वर प्राप्त हों।
कवि की ये प्रार्थना इसलिए भी है कि वह जानता है कि जीवन परिवर्तनशील है। जीवन प्रतिपल बदलता रहता है। कवि जीवन में, समाज में और सृष्टि में एक नई शुरुआत, नई ऊर्जा, नए विचार व नई सृजनशीलता के उदय की कामना करता है। वह नई चीजों का स्वागत कर रहा है। नई आवाज़, नए कलाकार, नए परिंदे और नए आसमान तक का आह्वान करता है, ताकि दुनिया में ताजगी और सृजन की लहर उठ सके।
कवि एक ही युग में जीता हुआ अपने अन्य समकालिनों की अपेक्षा कुछ अधिक जीवित और चैतन्य होता है। इसलिए उसे कुछ ऐसी बातें सुनाई देती है जिन बातों तक औसत मनुष्य के कान नहीं पहुंच पाते। उसे कुछ ऐसी चीजें दिखाई देती हैं जिन पर एक सामान्य आदमी की दृष्टि नहीं पड़ती। हमारे कवियों ने नए वर्ष को अलग-अलग तरीकों से देखा है, समझा है।
प्रियदर्शन कहते हैं –
जनवरी नए उगते फूलों की खुशबू जैसी लगती है
जब हम पहली बार बाग में दाखिल हो रहे हो
सोचते हुए, अभी तो शुरू हुआ है साल
और इस साल तो सहेज लेंगे वह सब जो इतने सालों से बिखरा पड़ा है
और दिसंबर तो बस आता है नए साल का दरवाजा खोलने के लिए
खुद से किए वादों को भूल
नए वादे करने के लिए
पर नया साल गुजर जाता है सांप की तरह घिसटता बिल की ओर। और हम योजनाएं बनाते रह जाते हैं समय से बाहर।
नागार्जुन कहते हैं-
चंदू मैंने सपना देखा
लाए हो तुम नया कैलेंडर
चंदू मैंने सपना देखा
तुम हो बाहर मैं हूं बाहर
हम और तुम जैसे बहुत से लोग समय से बाहर रह जाते हैं। मुख्य धारा में नहीं आ पाते।
तब नीलेश रघुवंशी को सिंघाड़े बेचती स्त्री याद आती है –
नए साल के आगमन पर पूछा गया सिंघाड़े बेचने वाली से
नए साल के बारे में क्या सोचा है तुमने
सिंघाड़े बेचती स्त्री ने कहा,
नए साल में हम खुट जाए
खुट जाए मतलब…
खुट जाए मतलब खुट जाए यानी हम मर जाए
ही ही हा हा ही हा
शायद इसलिए ही काल को हमने मृत्यु भी कहा है। समय सभी चीजों को लील लेता है। सभी चीजों को नष्ट कर देता है। न जाने कब एक जीता जागता सांस लेता पल कैलेंडर में बदल जाता है।
राजेश कमल के शब्दों में-
वह आई
अक्टूबर के चांद- सी
नवंबर की उम्मीद- सी
दिसंबर की धूप- सी
और कैलेंडर बदल गया
आइए इस नव वर्ष का हम स्वागत करें। जो कुछ बुरा घटा है पिछले साल, उसे हम भूल सकें और नव उत्साह से डॉ हरिवंश राय बच्चन की इन पंक्तियों के साथ जीवन को आगे ले जाएं।
वर्ष नव, हर्ष नव, जीवन उत्कर्ष नव
नव उमंग, नव तरंग, जीवन का नव प्रसंग
नवल चांद, नवल राह, जीवन का नव प्रवाह
गीत नवल, प्रीत नवल, जीवन की रीत नवल, जीवन की नीति नवल
जीवन की जीत नवल।






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