तखल्लुस का मायाजाल
फिल्मी दुनिया हो या कविता और ग़ज़ल का संसार, मूल नामों से आगे बढ़कर छद्म नाम अपनाना एक परम्परा बन चुकी है। कभी यह बाज़ार और ब्रांडिंग की जरूरत बन जाता है, तो कभी जाति और मज़हब की पहचान से मुक्त होने...

अभिव्यक्ति – फिल्मों से लेकर शायरी तक, क्यों रचनाकार अपने नाम बदलकर नई पहचान गढ़ते हैं?
दिनेश सिंदल,
कवि, लेखक एवं गीतकार
कला के क्षेत्र में अगर हम देखें तो प्रायः बहुत से कलाकार अपना मूल नाम छुपा कर किसी छद्म नाम का प्रयोग करते हैं। फिल्मों में तो यह आम बात है। जैसे मोहम्मद यूसुफ खान ‘ दिलीप कुमार’ हो जाते हैं। राजीव भाटिया ‘ अक्षय कुमार’ हो जाते हैं। धर्म सिंह देओल ‘धर्मेंद्र’ हो जाते हैं। प्रीतम सिंह ‘ प्रति जिंटा’ हो जाती है। तबस्सुम फातिमा हाशमी ‘तब्बू’ हो जाती है। करनजीत कौर बोहरा ‘सनी लियोन’ हो जाती है। हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी ‘मनोज कुमार’ हो जाते हैं। अब्दुल रहमान ‘शाहरुख खान’ हो जाते हैं। रीमा लांबा ‘मल्लिका शेरावत’ हो जाती है। और इंकलाब श्रीवास्तव को तो आप जानते ही होंगे। नहीं जानते जिन्हें आजकल आप ‘अमिताभ बच्चन’ कहते हैं। ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे।
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कलाकार अपने मूल नाम को छोड़कर वह नाम रखता है जो सुनने में आकर्षक हो, याद रखने में आसान हो या उसके व्यक्तित्व या संगीत शैली को बेहतर ढंग से दर्शाता हो। फिल्मों में इसे ‘स्क्रीन नेम’ या ‘ब्रांड नेम’ कहते हैं, जो किसी कलाकार के काम को प्रतिबिंबित करता है। इससे उसे ‘ब्रांड’ बनने में मदद मिलती है। उसकी अलग पहचान बनती है।
उर्दू व हिंदी कविता में भी इसका प्रचलन रहा है। जिसका इस्तेमाल शायर अपनी रचना के अंत में सिग्नेचर की तरह करता है। दुष्यंत कुमार त्यागी जब हिंदी गजलों में लोकप्रिय हुए तो वे दुष्यंत कुमार ही रह गए। ब्रांडिंग ‘दुष्यंत’ की ही हुई। उन्होंने अपने एक मात्र गजल संग्रह साए में धूप से लोकप्रियता पाई। जब ‘साए में धूप’ लोकप्रिय हुआ तो कई गजलकारों ने अपना रुख हिंदी ग़ज़ल की तरफ किया। कई गजलकारों ने ‘साए में धूप’ की तर्ज पर अपने गजल संग्रहों के नाम रखे। यह इस ब्रांड को भुनाने की कोशिश भी थी। और बाजार का आकर्षण भी।
क्यों कोई मिर्जा असदुल्लाह खान, ‘ग़ालिब’ हो जाते हैं, संपूर्ण सिंह कालरा, ‘गुलजार’ हो जाते हैं और शिव किशन बिस्सा, शीन. काफ. निजाम हो जाते है और कचरू प्रसाद सक्सेना, ‘गुलशन’ ( छद्म नाम) हो जाते हैं।
उर्दू में इसे ‘तखल्लुस’ कहते हैं। हिंदी में इसे ‘उपनाम’ या ‘छद्म नाम’ भी कहते हैं। इसे आप ‘पेन नेम’ भी कह सकते हैं, जो कवियों/ शायरों द्वारा अपनी रचना में इस्तेमाल किया जाता है। तखल्लुस की रस्म ईरान से चली। ईरान में प्रायः बादशाहों की शान में कसीदे पढ़े जाते थे। और बादशाह खुश होकर शायर को इनाम इत्यादि दिया करते थे। कसीदा चोरी न हो जाए, अतः शायर सिग्नेचर के तौर पर नीचे अपना नाम लिख दिया करते थे।
तखल्लुस शब्द अरबी से आया है। जिसका अर्थ होता है मुक्त होना, बचाव या छुटकारा पाना। सवाल ये है कि शायर या कवि किस चीज से मुक्त होना चाहता है? किससे छुटकारा पाना चाहता हैं? किससे बचना चाहता है? जी हां! इससे शायर या कवि अपनी जाति व अपने मजहब की पहचान से छुटकारा पाता है। तखल्लुस ऐसा ही चुना जाता है जो उस रचनाकार की जाति व उसके मजहब की पहचान को ढक ले।
सवाल यह है कि क्या कोई कलाकार चौबीसों घंटे कलाकार बना रहता है? यानी की ‘गुलशनजी’ चौबीसों घंटे ‘गुलशनजी’ बने रहते हैं या कभी-कभी ‘कचरू प्रसाद सक्सेना’ भी बन जाते हैं।
हम किसी कलाकार को पर्दे पर देखते हैं या किसी रचनाकार की रचना को पढ़ते हैं तो उसकी वैसी ही छवि अपने दिलो- दिमाग में बना लेते हैं जैसी पर्दे पर दिखाई पड़ती है या उसकी रचना में झलकती है। हम रचना में झलकने वाले या स्क्रीन पर दिखने वाले व्यक्तित्व को ही उस रचनाकार का व्यक्तित्व मान लेते हैं। लेकिन जब हम ‘गुलशनजी’ से मिलने जाते हैं तो वहां हमारी मुलाकात ‘कचरू प्रसाद सक्सेना’ से होती है, जिसमें ‘गुलशनजी’ की महक हम ढूंढते हैं और निराशा हाथ लगती है।
क्योंकि आज का कवि- शायर किसी सरकारी विभाग में काम कर रहा है। कहीं बैंक में पैसे गिन रहा है तो कहीं स्कूल- कॉलेज में बच्चों को पढ़ा रहा है। वहां वह शायर या कवि नहीं है। वहां वह सरकारी बाबू, केशियर, और अध्यापक है। कहीं- कहीं तो ये नौकरी भी उसने अपनी जातीय पहचान के आधार से पाई होती है।
ऐसी स्थिति में कृतित्व से ज्यादा व्यक्तित्व महत्वपूर्ण हो जाता है। वैसे भी कलाकार किसी एक जाति, धर्म या मजहब का नहीं होता, वह सबका होता है। पर क्या उसका एक कलाकार की तरह रूपांतरण हुआ है?
आजकल वीडियो और रील के जमाने में शायर को रचना के साथ अपने नाम या अपने हस्ताक्षर की जरूरत नहीं रही। उसे पढ़ते हुए आप देख या सुन सकते हैं। लेकिन हर पुरानी चीज बुरी नहीं होती। अगर रचनाकार मजहब और जाति से ऊपर उठ कर बात करता हैं तो उसका स्वागत होना चाहिए।






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