आज के आनन्द की जय
वसन्त ऋतु केवल मौसम परिवर्तन नहीं, बल्कि भारतीय भक्ति परंपरा में उल्लास, सौंदर्य और आध्यात्मिक चेतना का महापर्व है। पुष्टिमार्गीय मंदिरों से लेकर बृज संस्कृति तक श्रीकृष्ण की लीलाओं में रंग, संगीत और...

वसन्त ऋतु – वसन्त के रंगों में कृष्ण भक्ति और संस्कृति का उत्सव
डा. राकेश तैलंग,
– शिक्षाविद् एवं पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी
‘पीरेहि कुंडल नूपुर पीरे
पीरे पीतांबरो ओढे ठाडो
पीरहिं पाग लटक सिर सोहे
पीरो छोर रह्यो कटि गाढो
पीरी बनी कटि काछनी लाल के
पीरी छोर रच्यो पटुका को
गोविंददास प्रभु की लीला दरसत
पीरो ही लकुट लिये कर ठाडो’
हिन्दी साहित्य के ‘अष्टछाप’ के कवि और पुष्टिमार्गीय कीर्तन साहित्य के मात्र गोविन्द दास ही नहीं प्रत्युत सूरदास सहित अनेक भक्तिकालीन कवि कीर्तनकारों ने अपने काव्य में वसंत काल के प्रभु और प्रकृति के कितने ही वासंती रंगों से आराध्य श्रीकृष्ण और राधा व गोपियों के साथ रची निकुंज लीला को अभिव्यक्त किया है।
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इतना ही नहीं, इन काव्याभिव्यक्तियों में पुष्टिमार्ग, सखी, हरिदासी, राधा वल्लभीय और गौडेश्व रपरंपरा के मंदिरों की प्रभु सेवा के शृंगार और तदनुसार कीर्तनोँ का मानों लाइव टेलिकास्ट होते देखने को मिलता है।
मंदिर संस्कृति का समवाय सम्बन्ध माघ माह के बाद ऋतु परिवर्तन से इतना गहन है कि यहां वसंत पंचमी से लेकर होलिकोत्सव पर्यंत चालीस दिवसीय आनन्दोत्सव की अविच्छिन्न परम्परा इन देवालयों में देखते ही बनती है। वसन्त कलश की स्थापना या अधिवासन से लेकर पुष्टि व अन्य श्रीकृष्ण मन्दिरों में अष्टकालीन सेवा में रंग, अबीर, चौवा, गुलाल वातावरण का अभिन्न अंग बन चुकी होती है।
श्रीकृष्ण के उत्सव नायक और निकुंज नायक के स्वरूप की अभिव्यक्ति वसन्त पंचमी से अपने पूर्ण ओज से प्रारंभ होती है। श्रीकृष्ण दर्शनों की झांकियों में अपने निकुंज लीला नायक के साथ लौकिक रूप से विवाहित लेकिन श्रीकृष्ण में आसक्त ‘अन्यपूर्वा’, श्रीकृष्णाभिलाषी कुमारिकाएं ‘अनन्यपूर्वा’ और श्रीकृष्ण के बाल्यकाल से ही वात्सल्य भाव से पूर्ण ‘सामान्या’ गोपिकाएं वसंत ऋतु के इस उत्सव को मदनोत्सव का रूप दे देती हैं। कामदेव के भाव की आराधना का उत्सव। यहां श्रीकृष्ण अपने बहुमुखी रूप में ‘यशोदोत्संगलालित्य’, ‘उत्सवप्रिय’, और ‘निकुंज’ नायकत्व की अलौकिक गरिमा के साथ उपस्थित होते हैं कुछ इस रूप में-
‘बोलत श्याम मनोहर
बैठे कदंब छैंया
कुसुमित द्रुम अलि
गुंजत सखी कोकिला
कल कूजत तहियां
सुनत दूतिका के वचन
हुलास जाके मन महियां
कुंभनदास बृजकुंवरि मिलन चलि
रसिक कुंवर गिरिधरन पैंया’
बृजमंडल में लगभग समस्त मन्दिरों में वसंत माघ और फाल्गुन माह की संधि रेखा का परिवर्तन, संक्रमण प्रस्तुत करता है कुछ इस अर्थ में-
‘प्रकृति के यौवन का शृंगार
करेंगे कभी न बासी फूल
मिलेंगे वे जाकर अति शीघ्र
ह उत्सुक है उनकी धूल’
पुरातन का निषेध और परिवर्तन का स्वीकार-यही संदेश है वसन्त का- ‘old orders changeth yielding place to new.’ यह परिवर्तन वसन्त पंचमी से शुरू हो माघ पूर्णिमा पर होरी दंड रोपण से होकर होलकाष्टक और आमों के ‘मौड’ आने के प्रतीक कुंज एकादशी और चौरासी स्तंभ में परभु के बिराजने और राग, भोग व शृंगार की पीत रंगी आभा के साथ अन्य रंगों के समुच्चय में स्नात् हो होलिका प्रदीपन व धूलिवंदन उत्सव पर जाकर चरम पर पहुंच जाता है।
वसंत से लेकर फाल्गुन माह-यह श्रीकृष्ण के प्रकृति प्रेमी स्वरूप को तो सामने लाता ही है, प्रकृति में होने वाले परिवर्तन को भी समक्ष ला इससे आनंदित होने का अवसर हमें देता है। यह अभिव्यक्ति भारतीय संगीत के ऋतु अनुकूल रंगों को धमार शैली के कीर्तनों द्वारा प्रस्तुत होते देखी जा सकती है। कान्हडा, होरी व वसन्त राग की विभिन्न प्रणालिकाओँ की प्रस्तुति के महत्व को भक्ति परंपरा के गायकों ने समझा था और ऐसी ऋतु अनुकूल रागरागनियों को उन्होंने दरबारी राज्याश्रय से मुक्त कर लोक और भगवदाश्रयी सबके लिए सुलभ बना दिया। वसन्त से लेकर होली तक ये रागमालाएं सर्वत्र दृष्टव्य होती हैं।
वसन्त के शुभागमन को संस्कृति साधक सरस्वती देवी की आराधना के पर्व के रूप में भी देखते हैं। अवश्य ही, जहां भक्ति, संस्कृति, शृंगार, कला, संगीत की युति के अवसर हों वहां सरस्वती अपने विविध रंगों में हमारे लिए मार्गदर्शी बन जाती है। इन दिनों श्रीकृष्ण मन्दिरों में ‘द्वादश बृज कुंजों’ के भाव से अरुण, हरित, हेम, पूर्णेंदु, श्याम, कदंब, सितांबु, वसन्त, माधवी, कमल, चंपा और नील कमल कुंज घटाओं की जो झांकियां प्रस्तुत होती हैं, वे प्रकृति के समस्त ऋतु प्रवर्द्धक उपादानोँ और रंग बिरंगी चितराम कुदरत के विविध रूपाकृतियां हैं। ये कुंज संक्रमण कालीन समय में परिवर्तन का राग गाती हैं।
वसन्त ऋतु अभाव में भाव, दु:ख में सुख, हानि मेँ लाभ, नैराश्य में आशा और आने वाले कल के लिए आज के आनन्द की जयकार का पर्व है। और इस ऋतु की महिमा भी कैसी? कवि बिहारी ने कहा है- वृक्षों से विनम्र याचक बन वसन्त ने पत्तों का दान चाहा और वृक्षों ने सहर्ष पत्ते त्याग दिए। दान की महिमा देखिये- फिर से वृक्षों को नयी नयी कोंपलों से लकदक कर दिया-
‘ऋतु वसन्त जाचक भया
हरखि दिया द्रुम पात।
तातें नव पल्लव भया
दिया दूर नहीं जात।।’
आइये, सकारात्मकता के भावों का शंखनाद करने वाले ऋतुराज वसन्त की अगवानी करें और सर्व कल्याणकारी काम व सरस्वती समाराधन द्वारा कल के आनन्द के लिए आज के आनन्द का जयकार करें।






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