ज्ञान की नई उड़ान
नई पीढ़ी किताबों से दूर नहीं हुई है, उसने बस पढ़ने का तरीका बदल लिया है। स्क्रीन, ऑडियोबुक, ऑनलाइन कोर्स और व्यावहारिक ज्ञान के माध्यम से वह सीखने की संस्कृति को नए अर्थ दे रही है। यह बदलाव शिक्षा के...

डिजिटल युग में पढ़ने और सीखने की बदलती मानसिकता
अक्सर यह कहा जाता है कि नई पीढ़ी किताबों से दूर हो रही है। मोबाइल, सोशल मीडिया और स्क्रीन ने पढ़ने की आदत छीन ली है। लेकिन अगर सतह के नीचे झांककर देखा जाए, तो तस्वीर उलटी दिखाई देती है। नई पीढ़ी पढ़ रही है। कुछ अलग तरह से, अलग उद्देश्य से और अलग माध्यमों के साथ। यह बदलाव पढ़ाई के अंत का नहीं, बल्कि सीखने की संस्कृति के रूपांतरण का संकेत है।
आज की नई पीढ़ी की अध्ययन रुचि टेक्नोलॉजी-केंद्रित, व्यावहारिक और त्वरित सूचना आधारित है। वे मोटी पाठ्य-पुस्तकों के बजाय ऐसी किताबें और सामग्री चुनते हैं, जो सीधे जीवन, करियर और मनोविज्ञान से जुड़ती हों। यही कारण है कि बुकस्टोर्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कुछ किताबें लगातार बेस्टसेलर बनी हुई हैं। ये किताबें केवल पढ़ी नहीं जा रहीं, बल्कि खरीदी जा रही हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि किताबों का बाज़ार खत्म नहीं हुआ उसका स्वरूप बदला है।
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सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली श्रेणी है सेल्फ-हेल्प और आत्मविकास। जेम्स क्लियर की ‘एटॉमिक हैबिट्स’ आज युवाओं के लिए लगभग पाठ्य-पुस्तक बन चुकी है। छोटे-छोटे व्यावहारिक बदलावों से जीवन सुधारने की यह अवधारणा नई पीढ़ी को इसलिए भाती है क्योंकि यह उपदेश नहीं देती, बल्कि प्रयोग करने योग्य तरीके सुझाती है। इसी तरह ‘द सबटल आर्ट ऑफ़ नॉट गिविंग…’ या ‘द मॉन्क हू सोल्ड हिज़ फ़ेरारी’ जैसी किताबें युवाओं को यह भरोसा देती हैं कि परफेक्ट होना ज़रूरी नहीं, समझदार होना ज़रूरी है।
दूसरी बड़ी श्रेणी है वित्तीय साक्षरता और करियर से जुड़ी किताबें। नई पीढ़ी नौकरी पाना ही नहीं, पैसे को समझना भी चाहती है। ‘रिच डैड पुअर डैड’ और ‘द साइकोलॉजी ऑफ़ मनी’ जैसी किताबें इसी वजह से लगातार बिक रही हैं। हिंदी में मोनिका हलान की ‘लेट्स टॉक मनी’ जैसी किताबें भी युवाओं के बीच लोकप्रिय हैं। ये किताबें स्कूल-कॉलेज की पाठ्य-पुस्तकों में नहीं मिलतीं, लेकिन जीवन की पाठशाला में बेहद काम आती हैं। तीसरी श्रेणी है टेक्नोलॉजी, स्टार्टअप और भविष्य की दुनिया। कोडिंग, स्टार्टअप और नवाचार की ओर झुकाव के कारण ‘ज़ीरो टू वन’, ‘द लीन स्टार्टअप’ और ‘स्टीव जॉब्स’ जैसी किताबें इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट के छात्रों द्वारा खरीदी जा रही हैं। ये किताबें उन्हें यह सिखाती हैं कि असफलता अंत नहीं, प्रक्रिया का हिस्सा है।
रोचक बात यह है कि कहानी और फिक्शन भी नई पीढ़ी से गायब नहीं हुए हैं। चेतन भगत, दुर्ज़ॉय दत्ता, रवींद्र सिंह और कोलीन हूवर जैसे लेखकों की किताबें आज भी युवाओं की पहली पसंद बनी हुई हैं। वजह साफ है इन कहानियों में उन्हें अपनी ज़िंदगी की झलक मिलती है। भारी-भरकम साहित्य नहीं, बल्कि सहज भाषा और भावनात्मक जुड़ाव। मानसिक स्वास्थ्य और मनोविज्ञान भी नई पीढ़ी की पढ़ाई का अहम हिस्सा बन चुका है। एंग्ज़ायटी, तनाव और आत्म-पहचान जैसे विषय अब छिपाए नहीं जाते, बल्कि किताबों के ज़रिये समझे जाते हैं। यह अपने आप में एक सकारात्मक सामाजिक बदलाव है।
इन प्रवृत्तियों की पुष्टि शोध भी करते हैं। नैसकॉम और इनडीड के संयुक्त सर्वे के अनुसार भारत में लगभग 77 प्रतिशत युवा टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में रुचि रखते हैं, और तकनीकी कार्यबल में मिलेनियल्स व जेन ज़ेड का योगदान करीब 90 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। यही वजह है कि सीखने का केंद्र भी तकनीक और कौशल बन गया है। पेन अमेरिका और अन्य वैश्विक अध्ययनों से पता चलता है कि युवाओं में गहन वाचन कम हुआ है, लेकिन सूचना समझने और विश्लेषण करने की क्षमता बढ़ी है। वे ई-बुक, ऑडियोबुक और डिजिटल नोट्स के ज़रिये पढ़ रहे हैं। हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल जैसी संस्थाओं के अध्ययन बताते हैं कि आज के छात्र डिग्री से ज़्यादा स्किल-बेस्ड लर्निंग को महत्व दे रहे हैं। यही कारण है कि ऑनलाइन कोर्स और प्रमाण-पत्र उनकी पढ़ाई का हिस्सा बन चुके हैं।
छोटे शहरों और कस्बों के उदाहरण इस बदलाव को और रोचक बनाते हैं। झुंझुनूं, सिवान या बारां जैसे इलाकों के युवा यूट्यूब और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से कोडिंग, डिज़ाइन और वीडियो एडिटिंग सीख रहे हैं। कई छात्र पढ़ाई के साथ फ़्रीलांस काम कर रहे हैं। उनके लिए किताब अब केवल परीक्षा पास करने का साधन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने का औज़ार है। हां, चुनौतियां भी हैं। डिजिटल विचलन के कारण एकाग्रता और गहरे वाचन में कठिनाई होती है। लेकिन यह पीढ़ी समाधान भी खोज रही है। डिजिटल डिटॉक्स, टाइमर के साथ पढ़ाई, ऑडियोबुक और माइंडफुल लर्निंग जैसे प्रयोग इसका उदाहरण हैं।
बहरहाल नई पीढ़ी किताबों से दूर नहीं हुई है। उसने बस यह तय कर लिया है कि वह वही पढ़ेगी, जो उसे जीवन में आगे बढ़ने में मदद करे। पाठ्य-पुस्तक की जगह अब पाठ्य-अनुभव ने ले ली है। यह बदलाव साहित्य और शिक्षा के लिए खतरा नहीं, बल्कि एक अवसर है नई पीढ़ी से संवाद करने का, उनकी भाषा और ज़रूरत को समझने का। नई पीढ़ी की पढ़ाई दरअसल एक नई पतंग है। डिजिटल हवा में उड़ती हुई, लेकिन ज्ञान की डोर से बंधी हुई। अगर हम इस उड़ान को समझदारी से दिशा दें, तो यही पीढ़ी सीखने की संस्कृति को पहले से कहीं अधिक व्यापक और अर्थपूर्ण बना सकती है।






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