ईरान के दबाव में डगमगाता अमेरिका
अमेरिका और इजरायल द्वारा शुरू किया गया सैन्य अभियान अब उल्टा पड़ता दिख रहा है। ईरान की जवाबी क्षमता ने न केवल युद्ध को लंबा खींच दिया है, बल्कि वैश्विक तेल बाजार, व्यापार और अर्थव्यवस्था को भी गहरे...

पश्चिम एशिया में बढ़ता संघर्ष, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहराता संकट
संजीव पांडेय,
वरिष्ठ पत्रकार
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हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बयान देते हुए कहा, ‘अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत सकारात्मक दिशा में बढ़ रही है और अस्थायी रूप से सैन्य हमलों को टाल दिया गया है।’ इसके बावजूद जमीनी स्थिति अभी भी तनावपूर्ण बनी हुई है और संघर्ष पूरी तरह थमता नजर नहीं आ रहा। अमेरिका-इजरायल गठजोड़ और ईरान के बीच चल रहा यह युद्ध अब और जटिल होता जा रहा है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर बड़े सैन्य हमलों से शुरू हुआ यह युद्ध अब ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण काफी जटिल हो चुका है। जो कुछ अमेरिका और इजरायल ने सोचा था, उसका उल्टा हुआ। ईरान के शीर्ष सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर हमलों के बावजूद उसका मनोबल टूटने के बजाय और मजबूत होता दिखा। यह संघर्ष अब पूरे पश्चिम एशिया में फैल चुका है। लड़ाई कई हफ्तों से जारी है, हजारों लोग प्रभावित हुए हैं और तेल आपूर्ति, व्यापार तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका गंभीर असर पड़ा है।
ताज़ा घटनाक्रम इस संघर्ष को निर्णायक लेकिन अनिश्चित मोड़ की ओर ले जाता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने सीमित अवधि के लिए सैन्य कार्रवाई को टालने का संकेत दिया है, जिससे कूटनीतिक बातचीत को अवसर मिल सके। हालांकि यह विराम स्थायी समाधान से ज्यादा एक रणनीतिक ठहराव नजर आ रहा है, क्योंकि दोनों पक्षों के बीच भरोसे की कमी अब भी बनी हुई है। दूसरी ओर ईरान ने वार्ता के संकेत दिए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उसकी जवाबी कार्रवाई जारी है, जो इस टकराव को सीमित लेकिन लगातार चलने वाले संघर्ष में बदलने की आशंका को बढ़ा रही है। इसी बीच हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में बना तनाव वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार के लिए गंभीर जोखिम बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस संघर्ष को लेकर चिंता बढ़ रही है, क्योंकि यह स्पष्ट होता जा रहा है कि युद्ध भले ही अस्थायी विराम में जाए, लेकिन टकराव की जड़ें अभी भी गहरी और अस्थिर बनी हुई हैं।
वास्तविकता में देखें तो फिलहाल दोनों पक्ष पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहे हैं। विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिका और इजरायल ने ईरान की जवाबी क्षमता का पूरा आकलन नहीं किया था। ईरान ने वो कर दिखाया, जिसकी अमेरिका और इजरायल ने कल्पना भी नहीं की थी। इजरायली और अमेरिकी डिफेंस सिस्टम की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे हैं। ईरानी मिसाइल पूरे मध्यपूर्व में अमेरिकी सैन्य बेसों और इजरायली शहरों को निशाना बना रही है। ईरान की जवाबी कार्रवाई जारी है, जिससे हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में आवागमन गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। इसका सबसे ज्यादा असर एशियाई और यूरोपीय देशों पर पड़ा है जो पश्चिम एशिया के तेल और गैस पर निर्भर हैं।
भारत जैसे देश के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गई हैं, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों की बड़ी मात्रा आयात करता है। इसके लिए जल्द कूटनीतिक समाधान निकालना होगा। ऐसा न होने पर भारत, पाकिस्तान जैसे देशों की हालत और खराब होगी, जो मध्यपूर्व में काम कर रहे श्रमिकों द्वारा भेजी जाने वाली विदेशी मुद्रा पर काफी निर्भर हैं, तेल और गैस के अपने यहां की ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करते हैं।
अमेरिकी कंपनियों पर नकारात्मक असर
इजरायल के समर्थन में अमेरिका युद्ध में शामिल हुआ। जनता से लेकर कई अमेरिकी नेता डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले से काफी नाराज हुए। अब युद्ध लंबा खींच चुका है और ईरान ने पश्चिम एशिया में अमेरिकी निवेशों पर हमला शुरू कर दिया है, जिससे पश्चिमी कॉरपोरेशनों में अनिश्चितता आई है। डोनाल्ड ट्रंप के फैसले के परिणामों का अब उन्हें अहसास होने लगा है। अमेरिकी कॉरपोरेट सेक्टर के कई कंपनियों पर बहु-स्तरीय नकारात्मक असर साफ दिखने लगा है। क्षेत्र में अस्थिरता और सुरक्षा जोखिम बढ़ने से कंपनियों के प्रोजेक्ट्स और ऑपरेशन्स प्रभावित होने लगे हैं। खासकर तेल, गैस, इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी कंपनियों एक्सॉन मोबिल कॉर्पोरेशन, शेवरॉन कॉरपोरेशन को उत्पादन में बाधा का सामना करना पड़ रहा है। इनके कर्मचारियों की सुरक्षा खतरे में है। कई कंपनियों को अपने प्रोजेक्ट्स रोकने या धीमा करने पड़ रहे हैं, जिससे सीधे इनके राजस्व पर असर पड़ रहा है।
कई अमेरिकी कंपनियों को सप्लाई चेन और व्यापारिक लागत में वृद्धि का सामना करना पड़ रहा है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर खतरा बढ़ने से शिपिंग महंगी और जोखिमपूर्ण हो गई है, जिससे ऑमेजन और एपल जैसे वैश्विक कंपनियों की सप्लाई प्रभावित हो रही है। समुद्री जहाजों की बीमा की लागत बढ़ रही है, जिसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ेगा। निवेशक अनिश्चितता के कारण पूंजी बाजार में उतार-चढ़ाव आ रहा है, और कई अमेरिकी कंपनियों के शेयरों पर दबाव बन रहा है। कुल मिलाकर, यह संघर्ष अमेरिकी कॉरपोरेट के लिए लागत बढ़ाने, मुनाफा घटाने वाला है। यह संघर्ष उनके भविष्य के निवेश को अनिश्चित बनाएगा।
सर्वाधिक असर तेल बाजार पर
ईरान युद्ध का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधा और व्यापक असर दिखाई देने लगा है। क्योंकि इसका सबसे ज्यादा प्रभाव तेल बाजार पर पड़ा है। ईरान पश्चिम एशिया का महत्वपूर्ण तेल उत्पादक देश है। दूसरी तरफ हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कारोबार होता है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता रहा है। युद्ध के बाद इस इलाके से जहाजों का गुजरना न के बराबर हो गया है और इस कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। तेल महंगा होने से परिवहन, बिजली और उत्पादन लागत बढ़ना तय है। इसका असर सीधे महंगाई पर पड़ेगा और भारत समेत दुनिया के कई देश प्रभावित होंगे। अनिश्चितता बढ़ने के कारण दुनिया भर के शेयर बाजारों में गिरावट आ रही है। इसका सीधा असर निवेश पर पड़ेगा। सप्लाई चेन भी प्रभावित हो रही है, जिससे कई देशों में वस्तुओं की कमी और कीमतों में वृद्धि हो रही है। युद्ध लंबा चला तो वैश्विक विकास दर धीमी पड़ सकती है। दुनिया भर में बेरोजगारी बढ़ सकती है। कई कमजोर अर्थव्यवस्थाएं संकट में आ सकती हैं।
भारत में दिखने लगा प्रतिकूल असर
भारत जैसे देश पर हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतें ऊपर जाएंगी। इससे पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं तो सरकार पर सब्सिडी का दबाव बढ़ेगा। उधर चालू खाता घाटा भी बढ़ेगा। तेल की कीमत बढ़ने पर परिवहन और लॉजिस्टिक्स महंगा होगा, जिससे ट्रक, रेलवे, एयरलाइंस सब प्रभावित होंगे। शिपिंग रूट्स असुरक्षित होने से माल ढुलाई में देरी होगी, बीमा खर्च बढ़ेगा, व्यापार महंगा होगा। ऊर्जा लागत बढ़ने से उत्पादन महंगा होगा, जिसका सीधा असर स्टील, सीमेंट, केमिकल और ऑटो सेक्टर पर पड़ेगा। कंपनियों का मुनाफा घटेगा, क्योंकि उत्पाद महंगे हो सकते हैं। लेकिन भारत जैसे देश पर सबसे ज्यादा प्रभाव कृषि सेक्टर पर पड़ेगा। पश्चिम एशिया से भारत उर्वरक आयात करता है, और धान की खेती अब शुरू होने वाली है। उर्वरक की कीमत बढ़ेगी या कमी होगी तो इसका सीधा असर धान की फसल पर पड़ेगा। इससे किसानों पर दबाव और खाद्य महंगाई बढ़ सकती है।
युद्ध शुरू होने से पहले कच्चा तेल की कीमतें लगभग 75–80 डॉलर प्रति बैरल थीं जो अब बढ़कर 95–120 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई है। इससे निश्चित तौर पर भारत का आयात बिल बढ़ेगा। हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का सालाना आयात खर्च अरबों डॉलर बढ़ सकता है। यही नहीं आयात बिल ज्यादा होने के कारण भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है। एक डॉलर लगभग 82–83 रुपए से बढ़कर 90 रुपए के पार पहुंचता दिख रहा है। दूसरी तरफ महंगाई दर में दबाव देखा जा रहा है और खुदरा महंगाई में 0.5%–1% तक अतिरिक्त दबाव बनने की आशंका है। क्योंकि ईंधन, ट्रांसपोर्ट और खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं। भारतीय शेयर बाजार में गिरावट जारी है। विदेशी निवेशों ने हजारों करोड़ रुपए निकाल लिए हैं। आने वाले समय में ट्रांसपोर्ट और एयरलाइन किराए में बढ़ोतरी होगी। एविएशन फ्यूल महंगा होने से एयरलाइंस की लागत 10–20 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है।
चीन की दिक्कतें भी बढ़ी
ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध का प्रभाव चीन पर भी पड़ रहा है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है और उसकी बड़ी निर्भरता पश्चिम एशिया के तेल पर है। कच्चे तेल की कीमत 90–120 डॉलर प्रति बैरल पहुंचने से चीन की ऊर्जा कंपनियां सिनोपैक और चाइना नेशनल पेट्रोलियम कारपोरेशन की आयात लागत काफी बढ़ गई है। अनुमानतः चीन को हर महीने अरबों डॉलर अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है, जिससे चीन के रिफाइनिंग मार्जिन पर दबाव आया है। कच्चा तेल महंगा होने से चीन की रिफाइनरियों की लागत बढ़ी है। चीन पर भी सप्लाई चेन और रूट जोखिम का असर दिख रहा है, क्योंकि हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से चीन के लिए बड़ी मात्रा में तेल आता है। इस रूट पर खतरा बढ़ने से सप्लाई में देरी, शिपिंग इंश्योरेंस महंगा और लॉजिस्टिक लागत चीन की भी बढ़ गई है। कुछ टैंकरों को लंबा रूट लेना पड़ रहा है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़े हैं। इन परिस्थितियों में चीनी सरकार को घरेलू ईंधन कीमतों को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ रहा है, जिससे कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ा है। दिलचस्प बात है कि चीन इन बदली हुई परिस्थितियों के लिए पहले से तैयारी कर रहा था। चीन को पता था कि भविष्य में यह स्थिति आ सकती है, इसलिए वह वैकल्पिक ऊर्जा रणनीति पर जोर दे रहा था। इस संकट के कारण चीन ने रूस और अन्य स्रोतों से सस्ता तेल लेना जारी रखा था। चीन भारत की तरह रूसी तेल खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव मानने से इनकार कर गया था। साथ ही चीन नवीकरणीय ऊर्जा पर अपनी निर्भरता पहले से ही बढ़ा रहा है।
चीन की रणनीतिक चुप्पी
लेकिन दूसरी तरफ चीन भी चुप्पी साधे रखा। हालांकि बताया जाता है कि चीन ने पूरे युद्ध के दौरान ईरान को तकनीकी समर्थन दिया है जिस कारण ईरानी मिसाइलों का आक्रमण काफी सटीक देखा गया है। हालांकि खुल कर ईरान के समर्थन में चीन के नहीं आने का एक और कारण है। चीन का चुप रहना असल में रणनीतिक नीति का हिस्सा है, न कि चीन की कमजोरी जो भारत ने दिखाई। ईरान युद्ध हो या वेनेजुएला संकट, दोनों में चीन ने जानबूझकर अपने आप को लो-प्रोफाइल रखा। चीन हस्तक्षेप न करने की नीति पर चलता है और पीछे से समर्थन देता है। चीन सीधे युद्ध में कूदने या किसी एक पक्ष का खुला समर्थन करने से बचता है, ताकि भविष्य में सभी देशों से संबंध अच्छे बनाए रख सके। लेकिन चीन ने भारत की तरह खुलकर इजरायल के साथ खड़ा नहीं हुआ। चीन का सबसे पहला फोकस व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा है, न कि सैन्य टकराव। ईरान और वेनेजुएला दोनों से उसे सस्ता तेल मिलता है। अगर वह खुलकर किसी पक्ष में आ गया, तो उसके तेल सप्लाई और निवेश खतरे में पड़ सकते हैं। लेकिन ईरान नाराज न हो इसलिए चीन ने तकनीकी सहयोग देकर ईरान को मोर्चे पर मजबूत रखा है। अमेरिका चीन की इस रणनीति को समझ रहा है, लेकिन खुलकर प्रतिक्रिया देने से बच रहा है। चीन की रणनीति शुरू से ही सामने से आक्रामक न होने की रही है। वो अमेरिका से सीधे टकराव से बच रहा है, लेकिन वो यह तय कर चुका है कि पश्चिम एशिया में ईरान को गिरने नहीं देगा। क्योंकि ईरान के गिरने का मतलब है कि पश्चिम एशिया के तेल पर अमेरिकी नियंत्रण जो चीनी ऊर्जा जरूरतों को संकट में डाल देगा। इसलिए चीन पीछे से समर्थन देकर ईरान को मजबूत बनाए रखेगा। यही वजह है कि चीन इस संघर्ष में ‘कम बोलो, ज्यादा साधो’ की रणनीति पर चलता दिख रहा है और इस संकट को खतरे के साथ-साथ अवसर के रूप में भी देख रहा है।
यह संघर्ष अब केवल सैन्य टकराव नहीं रहा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की निर्णायक परीक्षा बन चुका है। यहां हथियारों से ज्यादा असर कूटनीति, ऊर्जा नियंत्रण और आर्थिक रणनीति का दिख रहा है। आने वाला समय तय करेगा कि विश्व व्यवस्था की कमान सैन्य ताकत के बल पर होगी या रणनीतिक समझ के दम पर।






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