ठहाकों की ओवर डोज़
जैसे जैसे ठहाकों के धंधे ने उछाल दिखाया है वैसे-वैसे आत्महत्या करने वालों की संख्या में बूम आया...

डॉ कीर्ति काले,
वरिष्ठ साहित्यकार
जैसे जैसे ठहाकों के धंधे ने उछाल दिखाया है वैसे-वैसे आत्महत्या करने वालों की संख्या में बूम आया है।
आप पूछेंगे कैसे? मैं बताती हूं ऐसे।
एक आदमी आत्महत्या करके मरा। मरकर सीधे स्वर्ग में गिरा। वैसे एनटाइटिल वो नरक के लिए ही था, लेकिन आतंकवाद के चलते नरक हाउस फुल चल रहा था। वहां मूढ़ा डालकर बैठने तक की जगह नहीं थी। एक टांग पर भी नहीं हुआ जा सकता था खड़ा। इसलिए यमराज को मजबूरन उसका टिकिट अपग्रेड करना पड़ा।
स्वर्ग के काउंटर पर रखे रजिस्टर में नवागंतुक को अपना विवरण भरना था। नाम, उम्र आदि के साथ आत्महत्या करके मरने का कारण विस्तारपूर्वक लिखना था। एक मिनिट के लिए उसने सोचा, सिर खुजाया और मरने का कारण लिया खोज। रजिस्टर में लिख दिया आत्महत्या करके मरने का कारण “ठहाकों की ओवरडोज़“।
काउंटर पर खड़ी टकाटक अप्सरा ने आदमी की मंशा नजरों के स्कैनर से तौली फिर मुस्कुराते हुए बोली-
पहली बार सुनी है यह बात।
ठहाकों की ओवर डोज़ से मरने की करामात?
आदमी ने बताई अपनी कथा। उस कथा में छिपी थी प्रत्येक संवेदनशील, कला प्रेमी व्यक्ति की व्यथा।
उसने अपने जीवन की रील को खोला और लम्बी सांस लेते हुए बोला-
आजकल धरती पर ठहाकों का कारोबार जोरों पर है। जिस तरफ़ आंखें जाती हैं उस तरफ हंसा- हंसाकर लोटपोट कर देने की गारंटी देने को आतुर हास्यावतारों की बेढंगी सूरतें नजर आती हैं। समझ में नहीं आता कि ये हंसाना चाहते हैं या फंसाना चाहते हैं। हंसाते- हंसाते फंसाने और फंसाते- फंसाते हंसाने में फर्क किंचित है।
हंसाने की गारंटी पक्की हो न हो पर फंसाने की गारंटी निश्चित है।
हुआ यूं..
मैं जिन्दगी में उदास था। उदासी को दूर करने के लिए टीवी किया ऑन। अट्टहास करते हुए प्रकट हो गया कॉमेडी का डॉन। घिसे घिसाए चुटकुलों पर सैक्स के तड़के। लड़कियों के वेश में दाढ़ी- मूंछों वाले लड़के। शो पूरी तरह था आत्मनिर्भर। ठहाके बेचे जा रहे थे शेंपू और तेल के विज्ञापनों की शीशियों में भर- भरकर।
स्क्रिप्ट उनकी, सड़े सड़ाए बदबूमारते हुए चुटकुले उनके, कलाकर उनके और तो और बुक्का फाड़कर ठहाके लगाने वाले भी उनके। नकली ठहाकों के बॉम्बारमेंट से घायल होकर मेरा मन अधिक उदासी की ओर चल दिया। घबराकर मैंने चैनल बदल दिया।
न्यूज़ चैनलों का तो और भी बुरा था हाल। बदली- बदली थी हर एक की चाल- ढ़ाल। सारे चैनल दस दिनों से एक ही न्यूज़ को एक्सक्लूजिव कहकर बता रहे थे। यहां भी कुछ हास्य कलाकार समाचारों में ठहाकों का बेस्वाद तड़का लगा रहे थे। झुंझलाकर हमने टीवी कर दिया बन्द। सोचा पार्क में जाकर खुली हवा का लेते हैं आनन्द।
लेकिन पार्क की हवा में भी मार्केटिंग का प्रदूषण घुला था। हरी घास पर ठहाकों का पूरा बाजार खुला था। अनुलोम-विलोम के साथ आकर्षक पेकिंग और पेकेजिंग में कृत्रिम ठहाकों के इंजेक्शन लगाए जा रहे थे। हम जैसे नए मुर्गे फंसाए जा रहे थे। तभी हमने देखा बेहतरीन शिकार जानकर उनके कुछ डीलर हमारी ओर भी आ रहे थे। दिल जोर- जोर से धड़कने लगा। उदासी का काला बादल हमारे पूरे वजूद को ढ़कने लगा।
तभी मन में आशा की किरण जगी। कविता ही डूबते को तिनके का सहारा लगी। पूरी तरह उदासी में नहाए, हम कवि सम्मेलन सुनने आए। सोचा था हृदय की बन्द कली खिलेगी। कविताएं सुनकर जीने की प्ररेणा मिलेगी। लेकिन ऐसा लग रहा था यहां सभी भंग खाए हुए हैं। कवि सम्मेलनों के मंचों पर कवियों के स्थान पर कॉमेडी शो के जोकर बुलाए गए हैं। कविता की एक पंक्ति की चाह में पूरी रात कर दी काली। लेकिन मुझ कविता प्रेमी की झोली रही खाली की खाली।
हम डिप्रेशन की अंधी गुफा में समाते जा रहे थे। परिवार जन हमारे पास बैठकर हमसे दो बातें करने की बजाए हमें हंसाने के लिए तरह- तरह की जुगत लगा रहे थे। मोटिवेशनल स्पीकरों, आध्यात्मिक गुरुओं और संगीत के कार्यक्रमों में हमें सुकून के लिए जबरन धकेला गया। प्रत्येक जगह नकली ठहाकों का दंश मिला नया।
जीवन में एक ऐसा क्षण आया कि आयातित ठहाकों के आतंक से आतंकित होकर हमने सोचने समझने की शक्ति गंवा दी। भड़भड़ाहट में दसवें माले से छलांग लगा दी।
हमारी क्षत- विक्षत मृत देह जमीन पर पड़ी थी। परिजनों, रिश्तेदारों के साथ- साथ अड़ौसियों पड़ौसियों की भीड़ हमें घेरे खड़ी थी। हम सोच रहे थे कि यदि जीते जी ये हमारे पास होते तो हम असमय अपने प्राण क्यों खोते। हमें आवश्यकता थी अपनों के साथ की,पीठ पर रखे तसल्ली भरे हाथ की। दो घड़ी बतियाने की। मन की पीड़ा सुनने सुनाने की। उदासी के भंवर में फंसे हुए हम रोने के लिए एक अदद विश्वसनीय कन्धा ढूंढ़ रहे थे और ठहाकों के व्यापारी हमारी बेबसी में भी धन्धा ढ़ूंढ़ रहे थे।
वो दिन कब लौटेंगे जब होगी कवि सम्मेलनों में काव्य की महक, संगीत में सुरों की चहक, कथावाचकों में आध्यात्म की गमक, मोटिवेशनल्स में प्रेरणा की धमक।
जब कृत्रिम ठहाकों की दुकानों पर ताला लगेगा तभी नैसर्गिक हंसी का सुवासित पुष्प खिलेगा।
जब तक ऐसा नहीं होता तब तक आत्महत्या करने वालों की संख्या बढ़ेगी रोज़
कोई जान भी नहीं पाएगा कि मरने का कारण है
ठहाकों की ओवर डोज़।






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