
बात बेलगाम
जयपुर अब आंखों से कम और जेब से ज़्यादा देखा जाने लगा है। कभी गुलाबी रंग पहचान था, अब हर कोने पर चिपका टिकट उसका नया प्रतीक बन गया है। किले- महल आज भी इतिहास सुनाते हैं, पर पहले टिकट काउंटर अपनी दास्तान सुनाता है। आमेर में कदम रखते ही सवाल होता है देशी या विदेशी? जवाब.. नहीं, दरअसल दाम तय होता है। हवामहल में हवा अब सिर्फ़ नाम की है, असली चक्कर टिकट के दाम दिलाते हैं। जंतर-मंतर में सूर्य घड़ी नहीं, महंगाई की छाया नापी जा रही है। अल्बर्ट हॉल में इतिहास दीवारों पर टंगा है, लेकिन हाथ में थमी रसीद ज़्यादा वज़नी लगती है। पर्यटक पहले सेल्फी का एंगल नहीं, बजट का एंगल तलाशते हैं। भीड़ इतनी कि गाइड इतिहास को व्हाट्सऐप संदेश की तरह संक्षेप में सुना देते हैं.. आगे भी लोग खड़े हैं। होटल खचाखच भरे हैं, अतिरिक्त स्टाफ मुस्कान ओढ़े ड्यूटी पर है और टैक्सियां ऐसे दुर्लभ हो गई हैं जैसे कोई संग्रहालय की वस्तु। जयपुर आज भी शाही है, इसमें शक नहीं। बस फर्क इतना है कि अब इस शाहीपन का आनंद लेने के लिए दिल नहीं, जेब का राजतिलक ज़रूरी हो गया है।
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तीन पीढ़ी की अनूठी स्पर्धा
यह दिलचस्प वाकया बालोतरा का है, जहां एक सुबह सर्द मौसम को मात देती रिश्तों की गर्माहट देखने को मिली। यहां दादा, पोता और पोती तीन पीढ़ियां एक साथ दौड़ पड़ीं, और उम्र को अंकों में गिनने वालों की सोच हांफती रह गई। जिन दादाओं को अक्सर ‘अब आराम कीजिए’ कहकर किनारे कर दिया जाता है, वे पोता-पोती का हाथ थामे पूरे उत्साह से कदम बढ़ा रहे थे। दौड़ के दौरान तालियों और ठहाकों से माहौल गूंज उठा। किनारे खड़े वही लोग, जो रोज़ बुजुर्गों को नसीहतें देते हैं, आज जोश से उनका हौसला बढ़ा रहे थे। पोता-पोती आगे बढ़ने को उतावले थे, दादा उन्हें थामे संतुलन बनाते हुए चल रहे थे। यहां जीत से ज्यादा मायने साथ-साथ फिनिश लाइन तक पहुंचने के थे। बालोतरा की इस अनोखी स्पर्धा ने साफ संदेश दिया। बुजुर्ग उम्र से नहीं, उपेक्षा से बूढ़े होते हैं। सम्मान और सहभागिता मिले, तो पीढ़ियां साथ दौड़ती हैं।
एग्जॉस्ट में अटका चोर
कोटा में अब चोरी भी प्रवेश परीक्षा जैसी हो चली है। कटऑफ निकला तो भीतर, नहीं तो बाहर ही अटक गए। ताज़ा वायरल वीडियो में चोर महोदय किचन के एग्जॉस्ट फैन को शॉर्टकट समझ बैठे। सोचा, रास्ता छोटा है तो मेहनत भी कम लगेगी। लेकिन नियति ने सिलेबस बदल दिया और चोर आधा अंदर, आधा बाहर लटकता रह गया। जैसे चोरी और योग का संयुक्त अभ्यास चल रहा हो। घरवाले खाटूश्यामजी के दर्शन से लौटे तो किचन में भगवान नहीं, भाग्य का चमत्कार दिख गया। शोर मचा, मोहल्ला जुटा और भीड़ देखते ही साथी चोर दोस्ती का पेपर छोड़कर फरार हो गया। उसे शायद पता था कि यहां पास होना मुश्किल है। सबसे रोचक बात यह कि चोरी की कार पर पुलिस का स्टीकर लगा था, यानि अपराध में भी पहचान ज़रूरी है। पुलिस ने बड़ी मशक्कत के बाद चोर को बाहर निकाला, वरना वह वहीं “स्थायी प्रदर्शन” बन जाता। कोटा ने फिर सिखाया.. गलत शॉर्टकट अक्सर एग्जॉस्ट में ले जाकर अटका देते हैं, और मेहनत की जगह हंसी वायरल हो जाती है।
गुरूजी की ड्यूटी वही, जिम्मेदारी नई
कक्षा में अब गणित के सवाल कम, कुत्तों के कदम ज़्यादा गिने जाएंगे। जो शिक्षक कल तक बच्चों को वर्णमाला सिखा रहे थे, आज उन्हें भौं-भौं प्रबंधन का अतिरिक्त प्रशिक्षण मिल गया है। शिक्षा विभाग का मानना है कि शिक्षक सर्वगुण संपन्न होते हैं। वे पढ़ा भी सकते हैं, पोषण भी बांट सकते हैं, ऑनलाइन हाजिरी भी भर सकते हैं और ज़रूरत पड़े तो कुत्तों को भी समझा-बुझा सकते हैं कि स्कूल का समय है, टहलने का नहीं। तीन-तीन महीने में निरीक्षण होगा। कुत्ते कम हुए या शिक्षक का धैर्य। चारदीवारी दुरुस्त रहे, गेट बंद रहे और अगर फिर भी कोई आवारा आ गया तो जिम्मेदारी तय होगी। सवाल बस इतना है कि पाठ्यक्रम में कुत्ता समन्वय कब जुड़ रहा है? शायद अगली परीक्षा में प्रश्न आए, आवारा कुत्तों से बचाव में शिक्षक की भूमिका पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। आखिर शिक्षा बहुआयामी है; पढ़ाना तो अब उसका एक छोटा सा हिस्सा भर रह गया है।






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