
बात बेलगाम
फागुन में लोग गुलाल से सराबोर होते हैं, पर बीकानेर में एक जनाब ऐसे निकले जिन्होंने नोटों से ही होली खेल डाली। तनख्वाह थी कनिष्ठ सहायक की, मगर कमाई ऐसी कि आंकड़े भी रंग बदल लें! गांव में भाई पसीना बहाएं, और इधर तिजोरी ऐसे फूले जैसे भांग चढ़ी हो। कहते हैं होली पर बुराई का दहन होता है, पर यहां तो लगता है ईमान ही होलिका में आहुति बन गया। सोना-चांदी, मकान,प्लॉट, गाड़ियां। मानो फागुन ने सीधे खजाना बरसा दिया हो। अबीर कम उड़ रहा है, कारस्तानियों की धूल ज्यादा। होली के रंग दो दिन में उतर जाते हैं, मगर ऐसे रंग साबुन से नहीं छूटते। फर्क बस इतना है आम आदमी की पिचकारी में पानी होता है, और कुछ खास लोगों की पिचकारी में प्रगति की मोटी धार। फागुन का यह रंग थोड़ा ज्यादा ही चटख निकला!
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पेंशन के रंग की प्रतीक्षा
होली की आहट है, लेकिन जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर के सेवानिवृत शिक्षक और कर्मचारी इस बार रंगों से ज्यादा बैंक संदेश का इंतज़ार कर रहे हैं। जिन हाथों ने दशकों तक ब्लैकबोर्ड पर भविष्य लिखा, वे आज पासबुक के पन्नों में वर्तमान तलाश रहे हैं। गुरुजन मज़ाक में कहते हैं इस बार गुलाल कम, धैर्य ज़्यादा उड़ाएंगे और गुझिया की जगह आश्वासन परोसेंगे। मोहल्ले में लोग पूछते हैं, होली की तैयारी कैसी है? वे मुस्कुरा कर कहते हैं, बस पेंशन का रंग चढ़ जाए तो सब तैयारी पूरी समझो। विडंबना देखिए, जिन्होंने विद्यार्थियों को समय की पाबंदी और जीवन के मूल्य सिखाए, वे स्वयं समय पर भुगतान की प्रतीक्षा में हैं। दवाइयों की पर्चियां भी अब त्योहारी सूची का हिस्सा बन गई हैं, और घर के बजट में रंगों की जगह गणित का कठिन सवाल खड़ा है। फिर भी आशा जीवित है। शायद इस होली सूखे खातों में भी रंग उतर आएं और सेवानिवृत शिक्षक-कर्मचारी सचमुच कह सकें, अबकी होली सच में रंगों वाली है।
राख में भीगता फागुन
होली के माहौल में रंग, गुलाल और हंसी की बातें होनी चाहिए, पर भिवाड़ी की उस अवैध पटाखा फैक्ट्री ने फागुन को भी स्याह कर दिया। यहां रंग नहीं, बारूद पिसता था; अबीर नहीं, राख उड़ती थी। गेट पर ताला ऐसे जड़ा रहता जैसे सच पर पहरा हो। भीतर मजदूर जिन्हें 20-30 हजार की रंगीन उम्मीद दिखाकर बुलाया गया। बारूद के ढेर पर अपना आज लिख रहे थे, कल किसी ने नहीं सोचा। कहा जाता है कि कच्चा माल दूर देश से आता था, पर संवेदना का माल शायद कहीं अटक गया। फैक्ट्री में ही खाना-सोना मानो इंसान नहीं, पटाखों की तरह पैक कर दिए गए हों। धमाका हुआ तो सिर्फ दीवारें नहीं टूटीं, कई घरों की होली भी बुझ गई। पास-पास दो गोदाम और जैसे लालच ने अपने रंगों के लिए अलग-अलग पिचकारियां रख छोड़ी हों। फागुन की हवा पूछ रही है। क्या हमारी खुशियों की चिंगारी किसी और की चिता से आती है? इस बार होली पर रंग लगाते समय याद रहे, असली उत्सव तभी है जब हर घर सुरक्षित हो, हर मजदूर जिंदा हो।
मान्यता की फीकी होली
मेवाड़ यूनिवर्सिटी के नर्सिंग कोर्स की कहानी भी किसी रंगीन होली से कम नहीं लगती। छात्रों ने सोचा था कि बीएससी नर्सिंग और जीएनएम के जरिए भविष्य में सेवा का उजला रंग मिलेगा, पर आरोप है कि यहां तो मान्यता का रंग ही हवा में उड़ता निकला। विज्ञापन ऐसे चमके जैसे होली की पिचकारी, और छात्रों ने फीस का गुलाल खुशी-खुशी उड़ा दिया। अब जब रंग उतरने लगा तो पता चला कि मान्यता का रंग कुछ फीका है। छात्र थाने की चौखट पर पहुंचे, मानो होली की हुड़दंग के बाद सफाई अभियान शुरू हो गया हो। जिम्मेदार पदाधिकारी भी शायद सोच रहे होंगे कि यह कैसी होली है जिसमें रंग से ज्यादा सवाल चिपक गए। फागुन सिखाता है कि रंग खेलो, पर असली रंग भरोसे का होता है और जब भरोसा फीका पड़ जाए, तो कोई भी पिचकारी उसे दोबारा गहरा नहीं कर पाती।






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