रंग, अबीर और तंज
फागुन की फिजाओं में होली की मस्ती बिखरी है। इसमें रंगों की महक है तो गुझिया की खुश्बू समाई है। उल्लास, संस्कृति और परंपरा में पगे राधा-घनश्याम हैं तो मर्यादा के रंगों में रंगे सिया-राम भी...

बोल हरि बोल
हरीश मलिक,
लेखक और व्यंग्यकार
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फागुन की फिजाओं में होली की मस्ती बिखरी है। इसमें रंगों की महक है तो गुझिया की खुश्बू समाई है। उल्लास, संस्कृति और परंपरा में पगे राधा-घनश्याम हैं तो मर्यादा के रंगों में रंगे सिया-राम भी हैं। यह रंगीला महापर्व दुश्मन को भी गले मिलकर दोस्त बनने के लिए प्रेरित करता है। खूब हंसी-ठिठौली होती है, कोई बुरा नहीं मानता। इसी महा-मस्ती के बीच कलम ने भी भांग के दो गिलास चढ़ा लिए हैं और मदमस्त होकर ना जाने किस-किस पर कैसे बोल-बचन लिख रही है। हमें भी कहना ही पड़ेगा- बुरा ना मानो होली है!
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पाक और टीम
होली आई, रंग उड़े, किक्रेट मैदान भी था तैयार,
पर पड़ोसी की किस्मत निकली फिर से लाचार।
कहते थे ‘बॉयकॉट’ बेहतर, बचेगी इज्जत सारी,
हार की गुलाल उड़ी, खाली रह गई पिचकारी।
‘बंद मुट्ठी लाख की’ ये कहावत याद ना आई,
खुलते ही स्कोरबोर्ड ने सारी औकात बताई।
आईसीसी की खैरात का सपना भी धुल गया,
मैदान में खेल कम, बहानों का रंग घुल गया।
सूर्या की सेना ने ऐसा रंग लगाया इस बार,
हरी जर्सी पर चढ़ा, मेन इन ब्लू का बुखार।
राहुल
हर चुनाव के बाद युवराज का मूड बदल जाता है,
हार की चुभन में लोकतंत्र साजिश नजर आता है।
एसआईआर से लेकर अप्रकाशित किताब तक,
सेना, संसद, संविधान सब पराया नजर आता है।
जनता क्यों उनके उम्मीदवारों को सदाएं देती है।
मेरी मां से पूछो, वो अब तक मेरी बलाएं लेती है।
जमीनी रणनीति गायब है, ट्विटर पर गर्मी सुपरहिट,
कहते हैं ये जनता ही समझ नहीं पाई मेरी स्क्रिप्ट!
राहुल पिचकारी लेकर बोले, मोहब्बत की होली खेलेंगे,
कार्यकर्ता पूछ बैठे, हम जीत की होली कब खेलेंगे?
मोदी: सिंदूर
होली आई, गुलाल उड़ा, संदेश गया सरहद पार,
मोदी बोले, अब रंग नहीं, जवाब होगा हर बार।
ऑपरेशन सिंदूर चला तो बदला मौसम का मिजाज,
उधर खोखली बयानबाजी, इधर सटीक था अंदाज।
मैदान में करारी हार मिली, सरहद पर भी फटकार,
आतंक के घर में घुसकर गूंजी मोदी की ललकार।
यहां ढोल आत्मविश्वास के, वहां बहानों की बहार,
हुंकार का रंग गहरा था, फीकी पड़ी हर तकरार।
अब अबीर-गुलाल नहीं, ललकार में खून बहता है,
ये नया भारत रंग और रण दोनों खूब खेलता है।
भजनलाल
होली आई, भजन गाए, “रंग जमाएंगे हर बार”,
विपक्षी बोले “अरे ये तो है पर्ची वाली सरकार”
दिल्ली दरबार से आई थी जैसे रंगों की पोटली,
राजस्थान में खुली तो भरी सियासत की झोली।
कुर्सी नई, जोश नया, और अंदाज भी सधा-सधा,
रंग कम, काम ज्यादा, यही है उनका व्रत बड़ा।
कहते हैं अब “डबल इंजन” से दौड़ेगा पूरा प्रदेश,
रंगदार चौतरफा विकास से मिटेगा हर क्लेश।
इधर नौकरी की पिचकारी, उधर किताब की बात
भजन अबीर लगा बोले, “हम काम से देंगे जवाब।”
गहलोत
होली आई तो बोले गहलोत “मैं हूं खांटी रंगदार!”,
चुनावी नतीजों ने कर दिया सारा भेद तार-तार।
जादूगरजी के रंगों में अनुभव की है गहरी छाया,
हर चाल में राजनीति, हर दांव में नित-नई माया।
कुर्सी की पिचकारी थामी, रंगते रहे दरबार,
पर जनता ने इस बार धो डाली पूरी सरकार।
पायलट संग होली हर साल थोड़ी तकरार वाली,
गुलाल कभी बयानबाजी की पिचकारी खाली।
हाईकमान की थाली में रखते रहे रंगों का हिसाब,
दिल्ली की ओर देख-देख कर बदलते रहे जवाब।
डोनाल्ड ट्रंप
होली में ट्रंप जी बोले, “रंग मेरा सबसे ग्रेट!”,
पलभर में ही पलटी मारें, बदल दें पूरा स्टेट।
कभी कहते दोस्ती, फिर अचानक तकरार,
डील की पिचकारी से करें सब पर प्रहार।
कई देशों को रंग-रंग में आपस में भिड़वाएं,
फिर कैमरे पर मुस्काकर खुद ही रंग जमाएं।
क्रांति कराई, दुनिया हिलाई, बोले नोबेल कहां है भाई?
आग से मोहब्बत बांटें, वाह रे क्रांति के सच्चे सिपाही।
होली के रंग नहीं टिकते, पर ट्रंप का यू-टर्न स्थायी हैं,
सुबह टैरिफ, शाम को माफी यही इनके अध्याय हैं।
प्रियंका वाड्रा
गाल पर गुलाल लगा आईने में देख इतराई,
मैं तो इंदिराजी से कोई कम तो नहीं भाई!
फिर अबीर नहीं, जमकर बयान उछाले
गुलाल नहीं, सरकार पर कीचड़ मारे।
पति पर आरोपों की पिचकारी चले,
डियर ब्रदर पर हार की बौछार पड़े,
पर दीदी कहें दोनों मासूम हैं, भोले हैं,
जनता क्यों हार के तराजू पर तोले है।
वो दिन दूर नहीं जब मेरा भाई छाएगा
जनता पूछे तुम्हारा नेतृत्व कब आएगा?
ममता बनर्जी
रंगीली होली आई, दीदी लाई रंगों की पूरी थाली,
पर चुनावी हवा चली तो उड़ गई सियासी लाली।
बीजेपी का नाम सुनते ही फीका पड़ जाए गुलाल,
बोलीं डर कैसा?, पर बढ़ गई दर्दे-दिल की चाल।
घुसपैठ की पिचकारी से वोटों का जोड़-घटाना,
तुष्टिकरण की बाल्टी में घुसपैठियों का ठिकाना!”
हर रैली में रंग बदलें, जैसे मौसम का मिजाज,
कभी मां-माटी पिचकारी, कभी मानुष का राज।
दीदी की होली में हर रंग का है अलग हिसाब,
जनता बोली, अब रंग नहीं, चाहिए साफ जवाब!”
तेजस्वी यादव
तेजस्वी आए गुलाल लेकर, बोले- नया बिहार बनाएंगे।
अबकी पिचकारी तो नहीं चली, अगली बार चलाएंगे।
हारे को विदेश की हवा लगी, अब गलियों में खोए,
होली में भी भाषण निकले, कार्यकर्ता चुपचाप रोए।
भाई-बहन से की बगावत, पर जीत का रंग न आया,
नेतृत्व की थाली सजी रही और स्वाद चाचा ने उठाया।
बीजेपी का नाम सुनते ही उड़े अबीर के साथ पसीना,
कुछ भी हो जाए, अपना तो बिहार में ही मरना-जीना।
होली में बोले “ये साजिश है, ये सिस्टम का है खेल”,
जनता बोली, “अबकी रंग नहीं, चाहिए असली मेल>
केजरीवाल
केजरीवाल लाए मुफ्त की मिठाई, वादों की पिचकारी,
हार पर सवाल पूछे जाएं तो उन पर खामोशी भारी।
दिल्ली में करारी हार से अबीर-गुलाल सूख गई।
पंजाब में वादों की पिचकारी भी देखो फूट गई।
“ईमान की सरकार”, ढोल बजाते रहे दिन-रात,
भ्रष्टाचार का रंग चढ़ा तो जेल में गुजरीं कई रात।
होली में फिर फरमाया “ये साजिश की होली है भाई!”,
जनता बोली, रंग नहीं, अब अपने काम की दो दुआई।
कभी सड़क पर आक्रोश, कभी प्रेस में विलाप,
दिल्ली की जनता बोली, बताओ कौन हैं आप?
अखिलेश
होली आई साइकिल पर, अखिलेश रंग उड़ाने निकले,
परिवार की पिचकारी से पहले घर के ही रंग फिसले।
चाचा-भतीजा करते चुनाव में हर साल नए धमाके,
कभी लाल-गुलाल, कभी लाल आरोपों के ही पटाखे।
साइकिल पर होकर सवार, मारी पिचकारी की धार,
अखिलेश बोले, अब हम लाएंगे बदलाव की बयार।
राहुल संग मिलकर बोले “इंडिया का रंग जमाएंगे!”,
पर गठबंधन की बाल्टी के कई छेद कहां छुपाएंगे?
जनता बोली “पहले घर की होली सुलझाओ यादव जी,
फिर देश में रंग भरना, अभी तो पिचकारी भी आधी जी!”






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