खाड़ी तनाव से बढ़ी चुनौती
खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते युद्ध ने भारत की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। तेल और गैस के लिए भारी निर्भरता, निर्यात और रेमिटेंस पर संभावित असर, तथा रुपए पर दबाव, ये सभी...

अपनी बात
कुछ हफ्ते पहले तक भारत की अर्थव्यवस्था की तस्वीर बेहद चमकदार दिख रही थी। देश तेज़ी से आगे बढ़ रहा था, चीन को पीछे छोड़ रहा था, ब्रिटेन को पार कर चुका था और अब जापान को पीछे छोड़ने की बातें हो रही थीं। ऐसा लग रहा था कि भारत की विकास कहानी बिना किसी बड़ी रुकावट के आगे बढ़ेगी।
लेकिन खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते युद्ध ने इस कहानी को अचानक झटका दे दिया है। इसने साफ कर दिया है कि भारत की चमक के पीछे कुछ ऐसी कमजोरियां भी हैं, जिन्हें लंबे समय से नजरअंदाज किया जाता रहा है। सबसे बड़ी कमजोरी है ऊर्जा पर बाहरी निर्भरता। भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है और इसका बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है।
जब इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो सबसे पहले तेल की कीमतें उछलती हैं और इसका सीधा असर भारत पर पड़ता है। पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ता है और धीरे-धीरे हर चीज़ महंगी होने लगती है। यानी महंगाई आम आदमी की जेब पर सीधा हमला करती है। सरकार के पास विकल्प सीमित होते हैं। या तो कीमतें बढ़ने दे या टैक्स कम करके राहत दे। लेकिन राहत देने का मतलब है सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ना।
यही नहीं, खाड़ी देश भारत के लिए बड़ा व्यापारिक बाजार भी हैं। भारत यहां कपड़े, चावल, इलेक्ट्रॉनिक्स और ज्वेलरी जैसे कई उत्पाद भेजता है। दुबई जैसे शहर भारत के लिए एक अहम व्यापारिक हब हैं, जहां से सामान दुनिया भर में जाता है। अगर युद्ध के कारण सप्लाई चेन या रास्ते प्रभावित होते हैं, तो भारत का निर्यात भी प्रभावित होगा और विदेशी कमाई घटेगी।
एक और बड़ा पहलू है, रेमिटेंस। लाखों भारतीय खाड़ी देशों में काम करते हैं और अपने परिवारों को पैसा भेजते हैं। यह पैसा करोड़ों परिवारों के लिए सहारा है। अगर वहां युद्ध के कारण नौकरियां प्रभावित होती हैं या काम धीमा पड़ता है, तो यह पैसा भी कम हो सकता है। इसका असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था और समाज दोनों पर पड़ेगा।
इन सबका असर रुपए पर भी दिखता है। जब डॉलर कम आते हैं और खर्च ज्यादा होता है, तो रुपया कमजोर पड़ता है। रुपया गिरता है, तो आयात और महंगा हो जाता है, महंगाई और बढ़ती है। हाल के समय में शेयर बाजार में गिरावट और रुपए पर दबाव इसी चिंता को दिखाते हैं।
लेकिन तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। भारत की अर्थव्यवस्था की नींव अभी भी काफी हद तक मजबूत है। देश के पास अच्छा विदेशी मुद्रा भंडार है, जिससे वह कुछ समय तक ऐसे झटकों को झेल सकता है। सरकार ने तेल के स्रोतों को थोड़ा विविध बनाने की कोशिश की है, जैसे रूस से सस्ता तेल खरीदना। इसके अलावा भारत की घरेलू मांग और डिजिटल अर्थव्यवस्था भी एक सहारा देती है, जो पूरी अर्थव्यवस्था को संभालने में मदद करती है।
सच यह है कि यह संकट एक चेतावनी भी है और एक मौका भी। चेतावनी इसलिए कि भारत अब भी ऊर्जा के लिए बाहर पर बहुत ज्यादा निर्भर है। और मौका इसलिए कि अब सरकार और नीति-निर्माताओं के पास यह अवसर है कि वे नवीकरणीय ऊर्जा, घरेलू उत्पादन और वैकल्पिक स्रोतों पर तेजी से काम करें।
व्यापार, रोजगार और निवेश के स्तर पर भारत और खाड़ी देशों के बीच गहरे संबंध हैं, लेकिन किसी एक क्षेत्र पर इतनी ज्यादा निर्भरता हमेशा जोखिम लेकर आती है। यही बात आज साफ दिखाई दे रही है।
सीधी बात यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत जरूर है, लेकिन पूरी तरह सुरक्षित नहीं। अगर खाड़ी संकट जल्दी खत्म होता है, तो भारत संभल जाएगा। लेकिन अगर यह लंबा चलता है, तो विकास की रफ्तार धीमी हो सकती है, महंगाई बढ़ सकती है और रुपया दबाव में रह सकता है।
अब असली चुनौती यह है कि भारत इस संकट को सिर्फ झटका मानकर भूल जाए या इसे एक सीख की तरह लेकर अपनी आर्थिक रणनीति को और मजबूत बनाए। यही फैसला आने वाले समय में तय करेगा कि भारत की विकास कहानी कितनी टिकाऊ है।





No Comment! Be the first one.