सत्ता परिवर्तन के बाद बांग्लादेश की चुनौतियां
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के साथ नई उम्मीदें जगी हैं पर चुनौतियां यथावत हैं। पूर्व सत्ता काल से जुड़े विवाद अंतरिम व्यवस्था की विरासत और क्षेत्रीय संबंधों की जटिलता के बीच स्थिर और समावेशी...

अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रमुख परीक्षा
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बांग्लादेश में जियाउर रहमान और खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान ने भले ही प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर सत्ता संभाल ली है, लेकिन देश की चुनौतियां बरकरार है। कभी अखंड भारत का हिस्सा रहा बांग्लादेश अपने अस्तित्व में आने के बाद से ही लगातार आतंरिक संघर्षों और तख्तापलट का शिकार होता रहा है। नतीजतन गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, कर्ज और अस्थिरता बांग्लादेश की नियति बन गई है।
वर्ष 2024 के मध्य में बांग्लादेश में छात्रों ने सार्वजनिक नौकरियों में कथित भेदभावपूर्ण कोटा खत्म करने की मांग को लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू किए। इसके तहत ढाका और अन्य बड़े शहरों में विरोध प्रदर्शन उग्र होता गया। यहां तक की सरकारी संपत्तियों को भारी नुकसान पहुंचाया गया। प्रधानमंत्री और मंत्रियों के घरों में आगजनी की गई। जुलाई के अंत तक सुरक्षा बलों ने प्रधानमंत्री शेख हसीना के निर्देश पर हिंसक दमन अभियान शुरू कर दिया। संयुक्त राष्ट्र के जांचकर्ताओं का कहना है कि इस कार्रवाई में लगभग 1,400 नागरिक मारे गए। विद्रोह थमता नहीं देखकर तब की प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा और 5 अगस्त 2024 को उन्हें भारत में शरण लेनी पड़ी। वह अब भी दिल्ली में ही सरकारी सुरक्षा में रह रही हैं। उधर, बांग्लादेश में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस की अगुवाई में अंतरिम सरकार का गठन कर दिया गया। अंतरिम सरकार ने भारत सरकार से बार-बार हसीना के प्रत्यर्पण की मांग दोहराई, लेकिन भारत सरकार ने माकूल जवाब नहीं दिया।
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इस बीच, पिछले साल बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण-1 ने बांग्लादेश की हिंसा में मारे गए लोगों को लेकर शेख हसीना, उनके गृहमंत्री असदुज्जमां खान कमाल और पूर्व पुलिस महानिरीक्षक चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून को मानवता के खिलाफ अपराध के लिए दोषी ठहराया। अदालत ने शेख हसीना और असदुज्ज्मां खान कमाल को फांसी की सजा सुनाई, जबकि सरकारी गवाह बन जाने के कारण चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून को पांच वर्ष के कठोर कैद की सजा सुनाई गई। हालांकि शेख हसीना और असदुज्ज्मां खान दोनों फिलहाल बांग्लादेश से बाहर हैं।
35 साल बाद बना पुरुष प्रधानमंत्री
बांग्लादेश में अंतरिम सरकार की अगुवाई में इस साल 12 फरवरी को 13 वां संसदीय चुनाव कराया गया जिसमें बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को कुल 300 सीटों में से 209 सीटों पर विजय मिली, जबकि उसके सहयोगी दल को तीन सीट मिली है। देश में जमात-ए-इस्लामी और उसके 10 सहयोगी दलों को 77, जबकि वर्ष 2024 में छात्र आंदोलन से निकली नेशनल सिटीजंस पार्टी (एनसीपी) को महज छह सीटों से संतोष करना पड़ा। प्रधानमंत्री तारिक रहमान दो सीटों से जीतने में कामयाब रहे। एक उम्मीदवार के चुनाव के दौरान निधन हो जाने के कारण वहां 299 सीटों पर मतदान हुआ था। तारिक रहमान ने बांग्लादेश के 11वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली है। राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने संसद भवन में तारिक को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई। तारिक रहमान पहली बार प्रधानमंत्री बने हैं। इसके साथ ही वहां पिछले डेढ़ साल से चल रही राजनीतिक अस्थिरता पर विराम लग गया है और अंतरिम सरकार का दौर खत्म हो गया है। बांग्लादेश में करीब 20 साल बाद बीएनपी की सरकार बनी। 2008 से 2024 तक वहां शेख हसीना की आवामी लीग सत्ता में थी। बांग्लादेश में 35 साल बाद कोई पुरुष प्रधानमंत्री बना है। 1988 में काजी जफर अहमद प्रधानमंत्री बने थे। इसके बाद 1991 से 2024 तक देश की राजनीति में शेख हसीना और खालिदा जिया का दबदबा रहा। ये दोनों ही प्रधानमंत्री बनती रहीं।
युवाओं की अपेक्षा पर खरा उतरना होगा
प्रधानमंत्री बनने के बाद अब तारिक रहमान के सामने देश को राजनीतिक स्थिरता देने, निवेशकों का भरोसा जीतने और युवाओं की अपेक्षा पर खरा उतरने की बड़ी चुनौती है। शपथ ग्रहण के बाद अपने पहले टेलीविजन संदेश में उन्होंने देश में कानून के शासन को मजबूत करने का संकल्प लिया और कहा कि उनकी सरकार देश को सभी धर्मों, मतों, दलों या जातियों के लोगों के लिए एक सुरक्षित स्थान के रूप में बदलने का प्रयास करेगी। अपने संबोधन में सरकार की प्राथमिकताओं को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य आत्मनिर्भर, सुरक्षित, मानवीय और लोकतांत्रिक बांग्लादेश बनाना है। एक बांग्लादेशी के रूप में हम सभी का इस देश पर बराबर अधिकार है। रहमान की यह टिप्पणी इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि अगस्त 2024 में शेख हसीना के सत्ता से बेदखल होते ही बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, खासकर हिन्दू समुदाय को लगातार निशाना बनाया गया। यह मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में भी जारी रहा।
रहमान का क्या है 180 दिनों का मास्टर प्लान
रहमान के साथ 25 कैबिनेट मंत्रियों और 24 राज्य मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई गई थी। मंत्रिमंडल के गठन और मंत्रियों के विभाग बांटने के बाद प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार का 180 दिनों का मास्टर प्लान पेश किया है। तारिक रहमान ने हर मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह 180 दिनों के भीतर अपनी-अपनी कार्ययोजना तैयार करे और उसे लागू करे।
बांग्लादेश में हिन्दुओं पर लगातार अत्याचार
बांग्लादेश में अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान हिन्दुओं पर हमले के मामले लगातार बढ़ गए थे। बांग्लादेश हिन्दू बौद्ध ईसाई एकता परिषद ने 2025 से जनवरी 2026 तक अल्पसंख्यकों पर 522 हमले दर्ज किए। इनमें हत्या, बलात्कार और धार्मिक स्थलों पर तोड़फोड़ के मामले शामिल हैं। इस दौरान 116 लोगों की हत्या की गई, जिनमें अधिकांश हिन्दू थे। मानवाधिकार संगठन मानवाधिकार संघर्षकृति फाउंडेशन (एमएसएफ) ने जनवरी 26 में भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या की 21 और मारपीट की 28 घटनाएं होने का दावा किया है।
नई सरकार की विदेश नीति
बांग्लादेश की विदेश नीति क्या होगी, यह अभी तय किया जाना बाकी है। लेकिन, प्रधानमंत्री तारिक रहमान कहते हैं कि हमारी विदेश नीति में बांग्लादेश और बांग्लादेशियों का हित सबसे ऊपर है। अपने देश और देश के लोगों के हितों की रक्षा करके हम अपनी नीति तय करेंगे। जब उनसे पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को भारत से वापस लाने के बारे में पत्रकारों ने पूछा, तो रहमान ने कहा कि यह पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। उन्होंने कहा कि सार्क संगठन की शुरुआत बांग्लादेश ने की थी, इसलिए वे इसे फिर से शुरू करना चाहते हैं।
भारत आने का न्योता, मोदी का संदेश
तारिक रहमान के शपथ समारोह में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने बांग्लादेशी प्रधानमंत्री से मिलकर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बधाई संदेश और भारत आने का औपचारिक निमंत्रण पत्र देकर द्विपक्षीय संबंधों में निरंतरता का संदेश दिया। भारत में बांग्लादेश के उच्चायुक्त रियाज हामिदुल्लाह ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा कि दोनों नेताओं ने भरोसा जताया कि भारत और बांग्लादेश मिलकर आम लोगों के हित में काम करेंगे।
‘जुलाई चार्टर’ को लेकर टकराव
बांग्लादेश में चुनाव से पहले संविधान में बदलाव के लिए बने ‘जुलाई चार्टर’ को लेकर सियासी टकराव तेज हो गया है। चुनाव से पहले बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किया था, लेकिन अब उसके नेता इसे मानने से इनकार कर रहे हैं। दरअसल, ‘जुलाई चार्टर’ में यह प्रावधान था कि नई संसद 180 दिनों के लिए संविधान सभा की तरह काम करेगी। 12 फरवरी को संसद चुनाव के साथ ‘जुलाई चार्टर’ पर जनमत संग्रह भी हुआ था। इसमें 62 प्रतिशत लोगों ने ‘हां’ में वोट दिया। सांसदों के शपथ ग्रहण के साथ-साथ ‘जुलाई चार्टर’ पर भी शपथ लेने की बात थी, लेकिन बीएनपी सांसदों ने ऐसा नहीं किया। ‘जुलाई चार्टर’ में यह भी प्रावधान था कि कोई व्यक्ति सिर्फ दो टर्म यानी कुल 10 साल तक ही बांग्लादेश का प्रधानमंत्री बन सकता है। उसमें राष्ट्रपति की शक्तियां बढ़ा दी गई थी, ताकि कोई प्रधानमंत्री तानाशाह नहीं बन सके। अब विपक्ष इसको बीएनपी की वादा खिलाफी बताकर मुद्दा बना रहा है।
उतार-चढ़ाव भरा रहा है तारिक का जीवन
तारिक रहमान बांग्लादेश के छठे राष्ट्रपति जियाउर रहमान और 9वीं प्रधानमंत्री खालिदा जिया की पहली संतान हैं। चुनावी हलफनामे के अनुसार तारिक का जन्म 20 नवंबर 1968 को ढाका में हुआ था। लगभग 20 वर्ष की उम्र में वह राजनीति में सक्रिय हो गए और बाद में बीएनपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए गए। 2004 में ढाका में अवामी लीग की रैली में बम विस्फोट के आरोप में तारिक समेत कई लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया। उस हमले में 24 लोगों की मौत और सौ से अधिक लोग घायल हुए थे। उस समय बांग्लादेश में तारिक की मां खालिदा जिया प्रधानमंत्री थीं। 2008 के चुनाव में अवामी लीग की वापसी के बाद तारिक इलाज कराने के बहाने लंदन चले गए। लंदन जाने से पहले उन्होंने अदालत में लिखकर दिया कि वह राजनीतिक मामलों से दूर रहेंगे। बाद में तारिक ने ब्रिटेन की नागरिकता ले ली। शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान अदालतों ने उन पर ग्रेनेड हमला, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, मनी लांड्रिंग और अवैध तरीके से धन उपार्जन समेत कुल 84 मुकदमें दर्ज किए। कुछ मामलों में उन्हें दोषी भी ठहराया गया। उम्र कैद की सजा भी हुई। हालांकि 2024 में शेख हसीना के शासन का अंत होने के बाद तारिक सभी मामलों से बरी कर दिए गए। इस बीच 2016 में उन्होंने फिर से बांग्लादेश की नागरिकता ले ली। 2025 में अपनी मां खालिदा जिया की बीमारी के कारण तारिक 17 वर्षों बाद 25 दिसंबर को बांग्लादेश लौटे और 2026 के चुनाव में बहुमत की सरकार बनाई।
बहरहाल, 1971 में अपनी स्थापना के बाद से ही लगातार उथल-पुथल से जूझ रहे बांग्लादेश में एक बार फिर लोकतांत्रिक सरकार का गठन हुआ है। उम्मीद की जानी चाहिए कि तारिक रहमान की सरकार जनहित के कार्य करे, महंगाई, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रखे, बेरोजगारों को रोजगार दे, पड़ोसी देशों खासकर, भारत के अनुकूल हो और स्थिर हो।






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