अच्छी लड़कियां
‘अच्छी लड़कियां’ सामाजिक संस्कारों के नाम पर थोपे गए मौन और आज्ञाकारिता की पड़ताल करती कविता है। यह रचना बचपन से वयस्कता तक लड़की के दबे सपनों, अदृश्य बंधनों और आत्मस्वर की खोज को उभारती है। अंततः यह...

कविता
– पद्मजा शर्मा, वरिष्ठ साहित्यकार
तब मना था लड़कियों का जोर से हंसना, मैं नहीं हंसी
पैर घसीट कर चलने वाली, खुलकर हंसने वाली
सीढ़ियों से धड़धड़ाते हुए उतरने वाली
बड़ों से सवाल करने वाली
नए खिलौनों- कपड़ों के लिए मचलने वाली लड़कियां
अच्छी नहीं कहलाती थीं उन दिनों
और मैं बनना चाहती थी अच्छी लड़की
मां बाप की निगाहों में प्यारी सच्ची बच्ची
इसलिए कभी नहीं खेली नए खिलौनों से
दिवाली पर नहीं छुड़ाए पटाखे
होली पर बनने वाली मिठाई
सबसे पहले कभी नहीं खाई
इस सब पर पहला हक रखता था भाई
भाई अक्सर तोड़ दिया करता था
मेरा बनाया मिट्टी का घर
मैं आज भी बना रही हूं घर, पर बनता नहीं
कोई अदृश्य भाई अड़ा देता है टांग
अच्छी लड़कियों के साथ, यही होता आया है अक्सर
जो लड़कियां बुरा बनने से नहीं घबराईं
वे निकल गई समय से आगे
और अच्छी लड़कियां पांवों में पहने पायल
आज भी वहीं हैं जहां थीं कल
और कल भी वहीं मिलेंगी खूंटे से बंधी गाय- सी सीधी
पिंजरे में बंद तोते- सी उदास
गले में जंजीर डाले पालतू कुत्ते- सी वफादार अच्छी लड़कियां
अच्छी लड़कियां कल की तरह आज भी
आंखों में भरे आंसू
लकड़ियों वाले चूल्हों पर पका रही हैं रोटियां
जिनमें झुलस रहे हैं उनके मासूम सपने
अपने अधूरे सपनों की राख लिए अच्छी लड़कियां
खड़ी हैं घर की दहलीजों पर गोधूली बेला में
यही सोचते हुए
कि बस अब और नहीं बनना अच्छी लड़कियां
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देखें पेज 37
RT_March2026.pdf
०००
आपने लड़की का नाम बदला
आपने लड़की का गांव बदला
आपने लड़की का रिश्ता बदला
आपने लड़की का काम बदला
क्यों हैरान हैं अब, जब लड़की बदल रही है
०००
लहरों का किनारों से टकराना
टकराकर फिर लौट आना
लौट लौटकर फिर फिर टकराना
टकराकर फिर लहराना
यूं पड़ता है लड़की को अपना अस्तित्व बचाना
०००
वो मुझे पंख देता है
पर उड़ने को होती हूं तो क़तर देता है
वो मुझे जबान देता है
पर बोलने को होती हूं तो काट देता है
वो मुझे पांव देता है
पर चलने को होती हूं तो रोक देता है
ऐसा ही होता है जब आपके निर्णय कोई और लेता है
मैंने तय कर लिया है
मैं दूसरे के पंखों से नहीं
अपने पंखों से उड़ान भरूंगी
अपने पांवों से आगे बढूंगी
अपनी जबान से अपनी बात आप कहूंगी
क्या हुआ धीरे- धीरे रुक- रुक के कहूंगी
लेकिन अपने निर्णय आप लूंगी।






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