‘3S’ फॉर्मूले से बुनी राजस्थान की नई स्टार्टअप संस्कृति
वैश्विक आर्थिक दबावों, टैरिफ नीतियों और बजटीय आंकड़ों की गहमागहमी के बीच राजस्थान का युवा अब अपनी जड़ों से जुड़े अवसरों को वैश्विक मंच पर स्थापित कर रहा है। ‘थ्री-एस’ यानी सॉइल, स्किल और...

बजट 2026-27: नीतिगत प्रोत्साहन और धरातल की शक्ति का ऐतिहासिक संगम
फरवरी का महीना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए केवल एक वित्तीय तिथि नहीं, बल्कि करोड़ों आकांक्षाओं के दस्तावेज का नाम है। जब भी देश की संसद में केंद्रीय बजट प्रस्तुत किया जा रहा होता है, तब मरुधरा की नजरें इस बात पर टिकी होती हैं कि ‘विकसित भारत’ के संकल्प में राजस्थान की विशिष्ट भौगोलिक चुनौतियों और संभावनाओं को कितनी जगह मिली है। बजट 2026-27 एक ऐसे कालखंड में आया है जब पूरी दुनिया मुक्त व्यापार समझौतों की पेचीदगियों और वैश्विक टैरिफ दबावों के बीच अपनी आर्थिक दिशा तलाश रही है। हालांकि, स्टार्टअप की इस नई लहर में एक बड़ा सत्य यह उभरकर आया है कि सरकारी नीतियां केवल ‘खाद-पानी’ का काम करती हैं, असली बीज तो उस राज्य की मिट्टी और वहां के युवाओं के मौलिक विजन में होता है। राजस्थान के युवाओं के लिए अब समय आ गया है कि वे अपनी उद्यमिता को केवल दिल्ली या बेंगलुरु के मॉडल्स की नकल तक सीमित न रखें, बल्कि उसे ‘थ्री-एस’ (3S) फॉर्मूले– सॉइल (मिट्टी), स्किल (हुनर) और सस्टेनेबिलिटी (निरंतरता) की कसौटी पर कसें। यह फॉर्मूला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी भी बजटीय उतार-चढ़ाव से परे एक स्थायी और स्वावलंबी आर्थिक रोडमैप प्रदान करता है।
Table Of Content
फरवरी माह का पूरा अंक देखें- 👇🏻
https://rajasthantoday.online/wp-content/uploads/2026/02/RT_FEBRUARY-2026_EDITION.pdf
सॉइल (Soil)
मिट्टी की सामर्थ्य और एग्री-टेक का उदय इस वैचारिक यात्रा का सबसे पहला और बुनियादी स्तंभ है- ‘सॉइल’ यानी हमारी मिट्टी और उससे प्राप्त होने वाला प्रचुर कच्चा माल। राजस्थान को अक्सर एक मरुस्थलीय प्रदेश के रूप में देखा जाता है, लेकिन स्टार्टअप की दृष्टि से यह संसाधनों की ‘सोने की खान’ है। बजट में भले ही इस बार पारंपरिक कृषि ऋणों या एमएसपी जैसे विषयों पर अपेक्षित शोर न दिखा हो, लेकिन सरकार का पूरा ध्यान ‘वैल्यू एडिशन’ पर केंद्रित नजर आता है। राजस्थान देश का लगभग 41 प्रतिशत बाजरा और भारी मात्रा में सरसों व ग्वार पैदा करता है। आज का युवा उद्यमी केवल कच्चा माल बेचने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह ‘एग्रीकल्चर एक्सेलरेटर फंड’ का लाभ उठाकर राज्य के बाजरे को वैश्विक बाजार के लिए ‘ग्लूटेन-फ्री’ स्नैक्स में बदल रहा है।
मिट्टी की इसी शक्ति का एक और आधुनिक चेहरा बीकानेर में दिखाई देता है। बीकानेर की सिरेमिक क्ले, जो दशकों से केवल दूसरे राज्यों के सेनेटरी उद्योगों के लिए कच्चे माल का स्रोत थी, अब नवाचार के दौर में है। यहां के स्टार्टअप्स अब इसी क्ले से हाई-वोल्टेज इंसुलेटर तैयार कर रहे हैं, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में एक ठोस कदम है। इतना ही नहीं, जालोर और सांचौर जैसे जिलों में कृषि अपशिष्ट और नेपियर घास से बायो-सीएनजी का उत्पादन शुरू होना मरुधरा की बदलती आर्थिक नियति का गवाह है। बजट में ‘वेस्ट-टू-वेल्थ’ मिशन को दिए गए नए प्रोत्साहन इस दिशा में काम करने वाले स्टार्टअप्स के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं हैं। राज्य की खनिज संपदा, विशेषकर मार्बल और ग्रेनाइट उद्योगों से निकलने वाली ‘स्लरी’ (धूल), जो कभी पर्यावरण के लिए संकट थी, अब नए उद्यमियों के लिए मुफ्त कच्चे माल के रूप में उपलब्ध है। जब कोई युवा इस धूल से ईंटें या टाइल्स बनाने का नवाचार करता है, तो वह केवल व्यापार नहीं कर रहा होता, बल्कि स्थानीय संसाधनों की शक्ति को पुनः परिभाषित कर रहा होता है।
स्किल (Skill)
विरासत का आधुनिकीकरण और MSME की नई दिशा आलेख का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम है- ‘स्किल’ यानी हुनर। राजस्थान की रगों में सदियों से चली आ रही हस्तशिल्प और कारीगरी की विरासत अब तकनीक के साथ कदमताल कर रही है। बजट 2026-27 में एमएसएमई सेक्टर के लिए घोषित 10,000 करोड़ रुपये का पूंजी सहायता फंड और ‘पीएम विश्वकर्मा 2.0’ का विस्तार सीधे तौर पर हमारे शिल्पकारों को उद्यमी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। बाड़मेर-जैसलमेर के सीमान्त गांवों की कसीदाकारी और अजरक प्रिंट हो या जोधपुर का विख्यात कास्ट-शिल्प, शेखावाटी की भित्ति चित्रकला और राजसमंद की मोलेला मृण्मय कला, इन सभी प्राचीन रोजगारों को आधुनिक स्टार्टअप्स ने नए सिरे से उभारा है।
युवा उद्यमी अब ‘ब्लॉकचेन’ और ‘ई-कॉमर्स’ के माध्यम से इन शिल्पकारों को वैश्विक ‘होम-डेकोर’ की मुख्यधारा से जोड़ रहे हैं। हुनर का यह नया स्वरूप सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भी दिखाई देता है। भड़ला (जोधपुर) जैसे विशाल सोलर पार्कों ने राजस्थान को दुनिया का ऊर्जा केंद्र बना दिया है, जहां अब स्थानीय युवा ‘स्मार्ट सोलर सर्विसिंग’ और AI आधारित मेंटेनेंस के स्टार्टअप्स खड़ा कर रहे हैं। बजट में एआई क्षेत्र के लिए दी गई विशेष कर रियायतें और विदेशी क्लाउड सेवाओं के लिए 2047 तक की छूट, राजस्थान के उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो तकनीक के माध्यम से स्थानीय समस्याओं का समाधान ढूंढ रहे हैं। जयपुर स्थित ‘फ्लीका इंडिया’ जैसे सफल उदाहरण इस बात का प्रमाण हैं कि राजस्थानी युवा अपने पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक औद्योगिक समस्याओं के समाधान में बदलने का कौशल बखूबी जानते हैं।
सस्टेनेबिलिटी (Sustainability)
भविष्य का आर्थिक आधार तीसरा और सबसे निर्णायक स्तंभ है- ‘सस्टेनेबिलिटी’ यानी निरंतरता। वैश्विक बाजार के दबाव और बदलती टैरिफ नीतियों के बीच भविष्य की अर्थव्यवस्था उन्हीं स्टार्टअप्स को स्वीकार करेगी जो पर्यावरण और सामाजिक संतुलन के साथ आगे बढ़ेंगे। राजस्थान की पशुपालन आधारित ‘व्हाइट इकोनॉमी’ इसका सबसे सटीक उदाहरण है। ‘आद्विक फूड्स’ जैसे स्टार्टअप्स ने जिस प्रकार ऊंटनी के दूध को एक प्रीमियम स्वास्थ्य उत्पाद के रूप में वैश्विक पहचान दिलाई, वह दर्शाता है कि मरुस्थल की विशिष्ट परिस्थितियों में भी टिकाऊ ब्रांड खड़े किए जा सकते हैं। इसी प्रकार, पिछले एक-दो वर्षों में उभरते ‘वेस्ट-टू-वैल्यू’ स्टार्टअप्स, जो मंदिरों के पुष्प-अपशिष्ट से अगरबत्ती और प्राकृतिक गुलाल बना रहे हैं, सस्टेनेबिलिटी के इस विचार को धरातल पर उतार रहे हैं।
चाहे वह रूरल टूरिज्म हो या जैविक खेती, राजस्थान का स्टार्टअप परिदृश्य अब ‘इको-फ्रेंडली’ होने के संतुलन पर टिका है। बजट में पर्यटन क्षेत्र के लिए 10,000 गाइडों की ट्रेनिंग और प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थानों के साथ जुड़ाव की घोषणा मरुधरा के ग्रामीण पर्यटन स्टार्टअप्स के लिए नई ऊर्जा लेकर आएगी।
राजस्थान की स्थायी आर्थिक जलवायु है ‘3S’ की शक्ति
नीति और धरातल का मिलन बजट की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में एक ‘एक्सीलरेटर’ की तरह होती है। केंद्रीय बजट में जब ‘एग्री-टेक’ स्टार्टअप्स के लिए बुनियादी ढांचे का विस्तार होता है या ‘एंजेल टैक्स’ जैसे जटिल प्रावधानों में पूर्णतः ढील मिलती है, तो राजस्थान के इन स्टार्टअप्स की गति दोगुनी हो जाने के आसार बढ़ जाते हैं। हालांकि, स्टॉक मार्केट की हलचल और राजकोषीय घाटे के आंकड़ों (4.3%) के अपने मायने हो सकते हैं, लेकिन ‘3S’ की यह शक्ति राजस्थान की स्थायी आर्थिक जलवायु है। राजस्थान के युवाओं की आकांक्षाएं अब केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे अब जोखिम लेने और अपनी जड़ों से जुड़कर वैश्विक साम्राज्य खड़े करने के इच्छुक हैं।
राज्य का ‘iStart’ कार्यक्रम और केंद्र की ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसी पहलें इन्हें एक मंच तो दे रही हैं, लेकिन असली ऊर्जा उस नवाचार से आ रही है जो मरुधरा की चुनौतियों को ही अपना अवसर बना चुका है। 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के तहत राज्यों को राजस्व का 41 प्रतिशत हिस्सा मिलने से राजस्थान जैसे विशाल राज्य को अपने बुनियादी ढांचे को स्टार्टअप-फ्रेंडली बनाने में मदद मिलेगी।
बहरहाल, राजस्थान का भविष्य अब केवल इसके गौरवशाली अतीत की गाथाओं में नहीं, बल्कि इसकी उद्यमशील युवा पीढ़ी के हाथों में है। यह पीढ़ी समझ चुकी है कि रेगिस्तान की तपिश ऊर्जा का स्रोत है और पत्थरों की धूल निर्माण का आधार। यदि हम अपनी मिट्टी के प्रति निष्ठावान हैं और हमारा हुनर आधुनिक तकनीक से लैस है, तो केन्द्रीय बजट की हर घोषणा हमारे लिए एक नई संभावना का द्वार खोलती है। यह वाकई गर्व का विषय है कि मरुधरा के युवा स्वप्नद्रष्टा आज अपनी मेहनत और दूरदर्शिता से राजस्थान को देश का नया ‘स्टार्टअप हब’ बनाने की दिशा में अग्रसर हैं। आने वाला समय केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि धरातल पर उतरते इन नवाचारों का होगा, जो राजस्थान को एक समर्थ और स्वावलंबी प्रदेश के रूप में स्थापित करेंगे।






No Comment! Be the first one.