सिर्फ नाम का सवाल है बाबा!!
नेता जी चिंतित थे। उन्हें जनता की या लोकतंत्र की चिन्ता नहीं थी। अपनी चिन्ता थी। इतने सालों की आजादी ने जनता को इतना तो समझदार कर ही दिया है कि वो अपनी चिन्ता खुद कर सके। फिर नेताजी जनता की चिन्ता...

अतुल कनक,
वरिष्ठ साहित्यकार
नेता जी चिंतित थे। उन्हें जनता की या लोकतंत्र की चिन्ता नहीं थी। अपनी चिन्ता थी। इतने सालों की आजादी ने जनता को इतना तो समझदार कर ही दिया है कि वो अपनी चिन्ता खुद कर सके। फिर नेताजी जनता की चिन्ता क्यों करें? जनता कौन सी उनकी चिन्ता करती है? जब चाहती है, उन्हें चुनाव में हरा देती है। फिर खाली जनता की चिन्ता करने से क्या हो जाएगा? आजकल तो आलाकमान का रवैया भी अजीब सा हो गया है। जब भी मन में किसी बड़ी कुर्सी की आशा जागती है, कोई नया चेहरा ढूंढ लाता है। अब नेताजी ने इतने सालों तक तालियां केवल इसलिए थोड़े ही बजाई हैं कि अंत में हाथ मलते रह जाएं।
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उधर कुछ अजीब नाम वाली फाइलों की चर्चा है। कहते हैं कि दुनिया के बड़े बड़े नेताओं के नाम इस फाइल में हैं। लेकिन नेताजी के नाम का कोई जिक्र ही नहीं है। नेताजी ने ऐसे दिन पहले कभी नहीं देखे थे। जो समारोह कभी उनकी अध्यक्षता के बिना हो ही नहीं सकते थे, आजकल उन समारोहों का निमंत्रण-पत्र तक नेताजी के पास नहीं आता। ऐसी नेतागिरी से क्या फायदा? इन्हीं नेताजी ने राशन का सामान लेने वालों की सूची में अपने कई रिश्तेदारों का नाम जुड़वाया है, इलाके की वोटर लिस्ट में कई फर्जी नाम जुड़वाए हैं और सरकारी समारोहों में सम्मानित होने वाले लोगों की सूची में अपने माली के साले तक का नाम जुड़वाया है। आज हालत यह हो गई कि जिस फाइल में बड़े बड़े नेताओं के नामों और कारनामों का जिक्र है, उस फाइल में इनके नाम का उल्लेख तक नहीं।
नेताजी सोच रहे हैं कि क्या करें? क्या न करें? क्या आलाकमान से फोन करवाएं या अपने कुछ चमचों को खर्चा- पानी देकर इस बात पर एक आंदोलन छिड़वा दें कि फाइल में हमारे नेताजी का नाम भी शामिल होना चाहिए। माना कि फाइल में लोगों की काली करतूतें हैं, लेकिन उतने बड़े लोगों के साथ खड़े होने के लिए यदि एकाध काली करतूत से नाम जुड़ भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है? कल ही उन्हें रमिया ने ताना मारा कि क्या नेताजी आप के बस में तो ऐसी करतूत करना भी संभव नहीं है कि आप बदनाम हो जाएं। नेताजी मन मार कर रह गए। कहना तो चाहते थे कि इतने बरसों से तेरे साथ जो कर रहा हूं, वो काली करतूत नहीं है तो क्या है? लेकिन कुछ सोच कर चुप रह गए। वो रमिया की नाराजगी अफोर्ड नहीं कर सकते थे। रमिया ने उन्हें क्या क्या दिया है और क्या क्या दिलवाया है, यह बात सामने आ जाए तो लोग उस विदेशी फाइल को भूल जाएंगे, जिसकी चर्चा सारी दुनिया कर रही है। रमिया कौन है, आपके मन में यह सवाल उठा होगा। छोड़िये, आप इस बात को जानकर क्या करेंगे? रमिया वो छमिया है, जो नेताजी के लिए उर्वशी भी है और मेनका भी।
रमिया तो एक नाम भर है। नेताजी के जीवन में ऐसे कई चेहरे हैं। आखिर उन्होंने नेतागिरी की है, कोई भाड़ नहीं झौंकी। लेकिन अब उस विदेशी फाइल के चर्चे उनका मुंह चिढ़ा रहे हैं। वो सोच रहे हैं कि फाइल में नाम जुड़ाने के लिए क्या किया जाए? कुछ दिन पहले उन्होंने अपने प्रिय ज्योतिष से बात की थी। ज्योतिष ने बताया था कि अब सूर्य पर राहू की नज़र है और चंद्रमा अष्टम भाव में है। प्रतिष्ठा की हानि होगी और मन उदास होगा। क्या यही कारण है कि दुनिया के बड़े बड़े नेताओं के साथ एक फाइल में उनका नाम नहीं आया? तो क्या वो ग्रह शांति करवाएं? या कोई अनुष्ठान करवाएं? एक बड़ा सा अनुष्ठान करवा लेंगे तो लोगों से चंदा अगाने का बहाना भी मिलेगा। लेकिन चंदा देगा कौन? जब से उनकी कुर्सी गई है, लोग नमस्कार का ज़वाब देने तक में कतराने लगे हैं, चंदा देने कौन आएगा?
वो हैरान हैं। परेशान भी। एक बदनाम फाइल में उन्हें अपना नाम जुड़वाना है। वो दुनिया और रमिया, दोनों को दिखाना चाहते हैं कि वो भी बड़े नेता हैं। उन पर भी दुनिया भर के मीडिया की नज़रें टिकी रहती हैं। वो भी कुछ करते हैं तो चर्चा होता है। क्या नेताजी का नाम उस बदनाम फाइल में जुड़वाने के लिए आप कुछ मदद कर सकते हैं?






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