बाड़मेर–बालोतरा विवाद की परतें
बाड़मेर–बालोतरा जिला सीमा फेरबदल केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि संसाधनों, परिसीमन और भविष्य की राजनीति से जुड़ा कदम है। संवाद के अभाव ने इसे जनअसंतोष और राजनीतिक टकराव का मुद्दा बना दिया...

रिफाइनरी, परिसीमन और राजनीति
लोकतंत्र में प्रशासनिक निर्णय कभी भी केवल प्रशासनिक नहीं रहते। विशेषकर तब, जब वे भूगोल से जुड़े हों और उस भूगोल में राजनीति सांस लेती हो। राजस्थान सरकार द्वारा वर्ष 2025 के अंतिम दिन बाड़मेर और बालोतरा जिलों की सीमाओं में किया गया फेरबदल इसका ताज़ा उदाहरण है। यह फैसला कागजों पर भले ही ‘प्रशासनिक पुनर्गठन’ हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत में यह सत्ता, संसाधन और भविष्य की राजनीति से गहराई से जुड़ा हुआ है। बायतु विधानसभा क्षेत्र के बड़े हिस्से को बालोतरा से हटाकर पुनः बाड़मेर में शामिल करना और गुड़ामालानी व धोरीमना जैसे क्षेत्रों को बाड़मेर से अलग कर बालोतरा जिले में जोड़ना, देखने में तकनीकी बदलाव लग सकता है। लेकिन यही बदलाव आज पश्चिमी राजस्थान की राजनीति में उबाल का कारण बन चुका है। सवाल यह नहीं है कि सीमाएं बदली जा सकती हैं या नहीं—सवाल यह है कि किस प्रक्रिया, किस समय और किस उद्देश्य से बदली गईं।
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समय ही सवाल खड़ा करता है
31 दिसंबर की रात जारी अधिसूचना केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं थी, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत सोच-समझकर चुना गया क्षण भी था। 2027 की प्रस्तावित जनगणना से पहले सीमाओं में किया गया यह बदलाव भविष्य के परिसीमन को प्रभावित करेगा, यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। यही कारण है कि इस निर्णय को लेकर विपक्ष ही नहीं, आम जनता के बीच भी संदेह गहराता जा रहा है।
यदि यह बदलाव वास्तव में प्रशासनिक सुगमता के लिए था, तो व्यापक जनसुनवाई, स्थानीय निकायों से संवाद और पारदर्शी प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई? लोकतंत्र में फैसलों की वैधता केवल संवैधानिक नहीं होती, सामाजिक सहमति भी उतनी ही आवश्यक होती है।
विरोध को महज़ राजनीति कहना अधूरा सत्य
कांग्रेस द्वारा किए जा रहे विरोध को सत्ता पक्ष राजनीतिक स्टंट करार दे सकता है, लेकिन यह कहना भी उतना ही सच है कि यह असंतोष केवल नेताओं तक सीमित नहीं है। धोरीमना और गुड़ामालानी जैसे क्षेत्रों में आम नागरिक यह पूछ रहे हैं कि जिला बदलने से उनकी प्रशासनिक पहुंच, न्यायिक प्रक्रिया और दैनिक जीवन पर क्या असर पड़ेगा।
पूर्व राजस्व मंत्री हेमाराम चौधरी का धरना और कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन निश्चित ही राजनीतिक है, लेकिन वह उस बेचैनी की अभिव्यक्ति भी है जो बिना संवाद के लिए गए निर्णयों से जन्म लेती है। लोकतंत्र में विरोध का अर्थ अराजकता नहीं, बल्कि सहभागिता की मांग होता है।
भाजपा का तर्क और उसकी सीमाएं
सत्ताधारी भाजपा का यह तर्क कि प्रशासनिक जिलों का गठन संगठनात्मक ढांचे के अनुरूप किया गया है, अपने आप में एक गंभीर सवाल खड़ा करता है। क्या प्रशासनिक इकाइयों का निर्धारण राजनीतिक दलों की संगठनात्मक जरूरतों के अनुसार होना चाहिए ? यदि ऐसा है, तो ‘तटस्थ प्रशासन’ की अवधारणा कहाँ ठहरती है ?
भाजपा इस निर्णय को ‘सुशासन’ और ‘बेहतर प्रबंधन’ से जोड़ रही है, लेकिन सुशासन की पहली शर्त पारदर्शिता और सहभागिता है। बिना पर्याप्त संवाद के लिया गया कोई भी निर्णय, चाहे वह कितना ही व्यावहारिक क्यों न हो, अविश्वास को जन्म देता है।
रिफाइनरी और संसाधनों की राजनीति
इस पूरे विवाद के केंद्र में पचपदरा रिफाइनरी का होना संयोग नहीं है। यह परियोजना केवल आर्थिक विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रभाव का स्रोत भी बन चुकी है। जिला सीमाएं तय करती हैं कि विकास का लाभ किसे मिलेगा और निर्णय-प्रक्रिया पर किसका नियंत्रण होगा। जब प्रशासनिक फैसले संसाधनों के वितरण को सीधे प्रभावित करने लगें, तो यह स्वाभाविक है कि उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा जाए। यही कारण है कि यह विवाद भावनात्मक से अधिक संरचनात्मक बन चुका है।
आगे की राह: संवाद या टकराव
यह स्पष्ट है कि बाड़मेर–बालोतरा सीमा विवाद आने वाले वर्षों में समाप्त नहीं होने वाला। 2027 की जनगणना और 2028 के विधानसभा चुनाव इस मुद्दे को और धार देंगे। लेकिन सरकार के पास अब भी अवसर है कि वह इस टकराव को संवाद में बदले।
एक उच्चस्तरीय स्वतंत्र समीक्षा, स्थानीय प्रतिनिधियों से खुला संवाद और स्पष्ट मानदंडों के आधार पर पुनर्विचार—ये ऐसे कदम हैं जो इस फैसले को राजनीतिक विवाद से निकालकर प्रशासनिक विश्वास में बदल सकते हैं।
अंततः, सीमाएं कागज पर खींची जाती हैं, लेकिन उनका असर लोगों की जिंदगी पर पड़ता है। लोकतंत्र में वही निर्णय टिकाऊ होते हैं, जो केवल सत्ता के हित में नहीं, बल्कि जनता की सहभागिता से लिए गए हों। बाड़मेर–बालोतरा का विवाद यही याद दिलाता है कि भूगोल बदलना आसान है, भरोसा बदलना नहीं।






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