“आह! फागुन.. वाह! फागुन”
अरविंद तिवारी,वरिष्ठ साहित्यकार यह फागुन का महीना बड़ा बड़ा निगोड़ा है। हर कामिनी, इस महीने में रूप का दंभ छोड़ देती है! आंखों की पिचकारियों से कई एपस्टीन फाइलें खुल जाती हैं। लोग ट्रंप को भूलकर...

अरविंद तिवारी,
वरिष्ठ साहित्यकार
यह फागुन का महीना बड़ा बड़ा निगोड़ा है। हर कामिनी, इस महीने में रूप का दंभ छोड़ देती है! आंखों की पिचकारियों से कई एपस्टीन फाइलें खुल जाती हैं। लोग ट्रंप को भूलकर वृंदावन चले जाते हैं। ब्रजवासियों का दावा है, एक बार फागुन में ट्रंप को वृंदावन बुला लो, सारा टैरिफ धरा का धरा रह जाएगा। होली के बाद उन्हें कच्छा बनियान में अमेरिका के लिए विदा करो। विश्व की यह धरा ट्रंप के आतंक से मुक्त हो जाएगी। होली पर हुरियार उन्हें ऐसा नोबल प्राइज देंगे कि वे सरप्राइज्ड हो जाएंगे! दरअसल एपस्टीन की फाइलें वृंदावन की होली के बिना रंगीन बन ही नहीं सकतीं। पक्ष और विपक्ष के नेताओं को वृंदावन लाकर होली खिलवा दें। संसद का सारा गतिरोध दूर हो जाएगा। जिनके घर होली खेलने के लिए जीवन साथी नहीं है, उन्हें बरसाने की लठ्ठमार होली में ले आओ, देश तरक्की करने करेगा।
सियासत में सारा लफड़ा होली खेलने वाली के न होने की वजह से है। संसद में बोलते समय यदि होली याद रहेगी, तो बहस शालीन हो जाएगी। किताब की सियासत को छोड़कर प्रेम की सियासत शुरू हो जाएगी। बस एक पंक्ति याद रहेगी, होली खेलन आयो श्याम, आजु जाहे रंग में बोरो री! जो नेता कुंआरे हैं या पत्नी होते हुए भी अकेले हुरियारे हैं, उन्हें बरसाने में गोपियों से पिटवा दो। यह बहुत जरूरी है, क्योंकि जीवन साथी विहीन नेताओं को होली में शामिल किए बिना देश आगे नहीं बढ़ सकता। शादीशुदा नेता घर में ही होली नहीं खेल पाता, बरसाने में कैसे खेल पाएगा। चाहे अमेरिका से समझौता कर लो, चाहे यूरोप से होली खेले बिना सब अधूरा है। कुछ लोग फागुन में हुए समझौतों को होली का हुड़दंग ही समझते हैं। सरकार के बयानों पर भरोसा नहीं कर पा रहे। उन्हें लगता है, सरकार के मंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए मजाक रहे हैं!
फागुन क्या है, पूरे महीने का वेलेंटाइन ही तो है। रोज रंग खेलो और गालियां झेलो। जब कोई नेता कहता है, मुझे संसद में गलियां दी गईं तो पब्लिक सीरियस नहीं होती। यार! फागुन में आपको गालियां नहीं देंगे तो क्या नवरात्रे में देंगे? फागुन ऐसा रसभरा मेहमान है, जो एक माह तक दिल धड़काता रहता है और बड़ी शिद्दत से भारतवासियों के घर में डेरा डाले रहता है। एक सौ पचास करोड़ देशवासी जैसे तैसे गुजर बसर करते हैं, ऊपर से ये मुआ फागुन! इसकी खातिरदारी न करो तो लोग संस्कृति सभ्यता भूलने की तोहमत जड़ देते हैं। जब हम अमेरिका को साधने में घाटा उठा लेते हैं, तो फागुन तो आपका अपना है। सदियों से बिला नागा आता रहा है। तुम्हारे आम के बागों को बौर और टेसू को फूल देकर ही गया है। अगर पांच दस हजार इस महीने में ज्यादा खर्च हो जाएंगे तो आसमान नहीं टूट पड़ेगा। तुम होली के उल्लास को फिर साल भर याद रखोगे। माना हर साल तुम्हें ढोलक मजीरे और चंग की मरम्मत करवानी पड़ती है मगर यह भी सोचो, ये वाद्ययंत्र फागुन में तुम्हारे हुलसने से ही तो खराब हुए थे। ऐसी मस्ती देता है फागुन की ढोलक तक टूट जाती है। फिर भी फाग गाना नहीं छोड़ते लोग। फटी ढोलक पर फागुनी गीत गाना, उल्लसित हुए बिना संभव नहीं है। कड़की में फागुन कुछ ज्यादा ही मजा देता है।
यह सच है फागुन विरह भी लाता है। जिनके पिया परदेस में होते हैं वे आह! फागुन बोलती हैं। कई बार हाय! फागुन बोलती हैं। इधर के दिनों में पति से खपा पत्नी फागुन के दिनों में नीला ड्रम खरीद लेती है। बहाना रंग घोलने का होता है। पर वह इस ड्रम का उपयोग संगीन अपराध करने में नहीं करती, केवल पति को डराने के लिए खरीद लेती है। वह पति से चैट करते हुए लिखती है, फागुन में तुम नहीं आए तो मैं नीला ड्रम खरीद लूंगी। पति तुरंत घर लौट आता है।
बजट को लेकर अपने फागुन को खराब मत करो। बजट कितना भी भारी हो, फागुन तुम्हें हल्का ही रखेगा। इस बार तो सोना और चांदी तक ग्राहकों से होली खेल रहे हैं। फागुन में इनका उतार चढ़ाव इनके प्रति विरक्ति पैदा करता है। विरक्ति का रास्ता मुक्ति की ओर जाता है। फागुन सबको मुक्त करता है। कई बार तो उनको भी मुक्त कर देता है, जो अभी मुक्ति नहीं चाहते। वे फागुन के सौजन्य से उम्र भर रसिया रहना चाहते हैं। कितनी भी शालीनता आप रखें, फागुन आपको उच्छृंखल बना ही देगा।






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