भारत की ‘सुपरब्रेन’ छलांग
दिल्ली में संपन्न एआई समिट ने भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आपूर्ति शृंखला के केंद्र में स्थापित करने की दिशा में एक निर्णायक संकेत दिया है। सुलभ एआई के औद्योगिक संकल्प से लेकर...

एआई इंडिया समिट: 25 प्रतिशत विकास दर का लक्ष्य और ‘पैक्स सिलिका’ का नया अध्याय
दिल्ली के प्रगति मैदान में 16 से 21 फरवरी तक आयोजित ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट’ केवल तकनीकी प्रदर्शनी नहीं था बल्कि 21वीं सदी की बदलती वैश्विक शक्ति संरचना में भारत की दावेदारी का औपचारिक उद्घोष सिद्ध हुआ। यह आयोजन उस ऐतिहासिक संक्रमण का संकेत देता है जिसमें डिजिटल अर्थव्यवस्था, सेमीकंडक्टर क्षमता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता मिलकर राष्ट्रीय शक्ति के नए मानदंड निर्धारित कर रहे हैं। सम्मेलन का वातावरण केवल नवाचार का प्रदर्शन नहीं बल्कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा की स्पष्ट स्वीकृति का प्रतीक था। समिट का सबसे चर्चित कूटनीतिक परिणाम भारत का ‘पैक्स सिलिका’ सहयोग ढांचे से जुड़ना माना गया। यह अवधारणा तकनीकी आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित और विविधीकृत बनाने की उस वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा है जो भू-राजनीतिक अस्थिरताओं के बाद उभरी है। सेमीकंडक्टर उत्पादन, डेटा अवसंरचना और उच्च क्षमता संगणना में भागीदारी भारत को केवल बाजार नहीं बल्कि निर्माता राष्ट्र के रूप में स्थापित कर सकती है। उद्घाटन सत्र में नरेंद्र मोदी के साथ फ्रांस, सर्बिया और ब्राजील के शीर्ष नेतृत्व की उपस्थिति ने यह संकेत दिया कि तकनीकी सहयोग अब पारंपरिक कूटनीति का केंद्रीय आयाम बन चुका है।
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आर्थिक परिप्रेक्ष्य में सम्मेलन का प्रमुख विमर्श उत्पादकता वृद्धि और विकास संरचना के पुनर्गठन पर केंद्रित रहा। विशेषज्ञों का मत रहा कि एआई केवल दक्षता बढ़ाने वाला उपकरण नहीं, बल्कि संपूर्ण उत्पादन प्रणाली को पुनर्परिभाषित करने वाली शक्ति है। इसी संदर्भ में एथ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोदेई ने साझा किया कि जहां विकसित देश एआई से 10% विकास देख सकते हैं, वहीं भारत में यह आंकड़ा 25% तक पहुंच सकता है। माइक्रोसॉफ्ट द्वारा भारत में क्लाउड और डेटा केंद्र अवसंरचना विस्तार के लिए 4.5 लाख करोड़ रुपए की दीर्घकालिक प्रस्तावित निवेश योजना को डिजिटल आधारभूत संरचना निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माना गया। औद्योगिक सहयोग के स्तर पर ओपनएआई और भारतीय उद्योग समूहों के बीच उच्च क्षमता संगणना संसाधनों के विकास पर चर्चा ने अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र को नई दिशा देने की संभावना जगाई। सम्मेलन में यह भी स्पष्ट रूप से उभरा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब केवल सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र का विषय नहीं बल्कि ऊर्जा नीति, श्रम संरचना, शिक्षा व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा बहुआयामी प्रश्न बन चुका है।
एआई को सस्ता व सुलभ बनाने का वादा
रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमेन मुकेश अंबानी ने समिट में कहा कि डिजिटल कनेक्टिविटी की तरह एआई का भी व्यापक लोकतंत्रीकरण आवश्यक है। उनका तर्क था कि यदि तकनीक केवल चुनिंदा संस्थाओं तक सीमित रही तो नवाचार की सामाजिक क्षमता बाधित हो जाएगी। उन्होंने एआई को ‘सुपरब्रेन’ की संज्ञा दी जो मानवीय सीमाओं का विस्तार करेगी। गुगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने भारत की बहुभाषी संरचना और विशाल उपयोगकर्ता आधार को एआई अनुप्रयोगों के लिए अद्वितीय अवसर बताया। उनके अनुसार भारत का डिजिटल विस्तार केवल उपभोग का संकेत नहीं बल्कि नवाचार के लिए डेटा पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण का आधार है।
टीसीएस के एन. चंद्रशेखरन ने औद्योगिक शृंखला के समग्र विकास पर जोर देते हुए कहा कि चिप निर्माण से लेकर डेटा प्रसंस्करण तक आत्मनिर्भर ढांचा ही तकनीकी संप्रभुता की वास्तविक नींव बनेगा। उन्होंने विनिर्माण क्षेत्र में एआई आधारित स्वचालन को प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता का मूल तत्व बताया। तकनीक के सामाजिक प्रभाव पर भारती एयरटेल के सुनील मित्तल ने चेताया कि तकनीकी केंद्रीकरण आर्थिक असमानता को गहरा कर सकता है यदि नीति ढांचा समावेशी न हो। अडोबी के शांतनु नारायण ने शिक्षा, सृजन और ज्ञान सुलभता के क्षेत्र में एआई की परिवर्तनकारी भूमिका को स्पष्ट करते हुए सामग्री प्रामाणिकता और भरोसेमंद डिजिटल पारिस्थितिकी की आवश्यकता बताई। उत्पादकता विस्तार के संदर्भ में वियानाई सिस्टम्स के विशाल सिक्का ने कहा कि एआई जटिल तकनीकी प्रक्रियाओं की समयावधि को नाटकीय रूप से घटा सकता है, जैसे 9 महीने का काम सिर्फ 14 दिनों में संभव हो गया है।
और महत्वपूर्ण होगी मानवीय समझ
तकनीकी प्रगति के बीच मानवीय विवेक की भूमिका और अधिक केंद्रीय होती दिखाई देती है। विप्रो के रिशद प्रेमजी ने कहा कि संगठनों को अपने पारंपरिक ढांचों में संरचनात्मक परिवर्तन करना होगा परंतु भरोसेमंद एआई के लिए मानवीय समझ और नैतिक निर्णय क्षमता अनिवार्य रहेगी। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि तकनीक और नैतिकता का संतुलन ही दीर्घकालिक विश्वास का आधार बनेगा। नीति स्तर पर भी बहुस्तरीय शासन संरचना की आवश्यकता पर बल दिया गया। डिजिटल भुगतान व्यवस्था के अंतरराष्ट्रीय विस्तार और राज्यों द्वारा वैश्विक नवाचार साझेदारी समझौते इस तथ्य को पुष्ट करते हैं कि तकनीकी प्रतिस्पर्धा अब केवल राष्ट्रीय नहीं बल्कि बहुस्तरीय शासन का विषय बन चुकी है। कर्नाटक सरकार द्वारा फ्रांस और पोलैंड के साथ किए गए समझौते इसका प्रमाण हैं।
एआई निर्मित सामग्री पर लेबल जरूरी
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डीपफेक और भ्रामक सूचना के बढ़ते खतरे पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए एआई निर्मित सामग्री की अनिवार्य पहचान व्यवस्था का सुझाव दिया। उन्होंने वॉटरमार्किंग और लेबलिंग पर जोर दिया, ताकि असली और नकली का भेद बना रहे। यह दृष्टिकोण तकनीकी प्रगति और सामाजिक विश्वास के बीच आवश्यक संतुलन की मांग को रेखांकित करता है। विशेषज्ञों का मत है कि पारदर्शिता के बिना डिजिटल अर्थव्यवस्था में विश्वास टिकाऊ नहीं हो सकता। इसके साथ ही मेटा के शोधकर्ताओं ने 1,600 से अधिक भाषाओं में अनुवाद की तकनीक पेश कर भाषाई बाधाओं को कम करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
प्रदर्शन बना आलोचना का शिकार
सम्मेलन के समानांतर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी चर्चा में रहीं। सम्मेलन के बाहर युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए प्रदर्शन ने ध्यान खींचा, जिसकी आलोचना स्वयं उनके इंडी गठबंधन के सहयोगी दलों ने की। कई विश्लेषकों ने यह संकेत दिया कि तकनीकी क्षमता निर्माण जैसे प्रश्नों को दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में तकनीकी नीति को अल्पकालिक राजनीतिक विमर्श से ऊपर उठाने की आवश्यकता बार-बार रेखांकित की गई। गठबंधन के साथियों का मानना था कि तकनीकी विकास के ऐसे वैश्विक मंच का विरोध करना तर्कसंगत नहीं है।
एआई को मुट्ठीभर लोगों के हाथ न छोड़ें
सम्मेलन की उपलब्धियों के साथ गंभीर आशंकाएं भी सामने आईं। विशेषज्ञों ने चेताया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की शक्ति यदि सीमित संस्थाओं तक केंद्रित रही तो वैश्विक असमानता और बढ़ सकती है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने एआई शासन के लोकतांत्रिक ढांचे की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि तकनीकी भविष्य मानवता की साझा संपत्ति होना चाहिए, इसे केवल अरबपतियों के हाथ में नहीं छोड़ा जा सकता। माइक्रोसॉफ्ट के ब्रैड स्मिथ ने इसे ‘दोधारी तलवार’ बताते हुए आर्थिक खाई बढ़ने की चेतावनी दी।
डेटा गोपनीयता, श्रम संरचना में परिवर्तन, विदेशी तकनीकी निर्भरता और नियामकीय ढांचे की अपर्याप्तता जैसे प्रश्न अभी भी नीति विमर्श के केंद्र में हैं। स्वचालन से उत्पादकता बढ़ेगी परंतु रोजगार संरचना में संक्रमण की चुनौती भी उतनी ही वास्तविक है। तकनीकी प्रगति की गति जितनी तीव्र है, कानूनी और नैतिक ढांचे को भी उतनी ही गति से विकसित होना होगा। समग्र रूप से यह स्पष्ट है कि भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता युग में निर्णायक उपस्थिति दर्ज कराने की दिशा में अग्रसर है। परंतु तकनीकी शक्ति तभी स्थायी राष्ट्रीय प्रगति का आधार बनेगी जब नवाचार के साथ समावेशन, उत्तरदायित्व और नैतिक संतुलन भी सुनिश्चित किया जाए। यदि भारत इस संतुलन को साध लेता है तो ‘सुपरब्रेन’ का यह दौर वास्तव में देश के विकास इतिहास का नया अध्याय सिद्ध हो सकता है।






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