ओरण योद्धा सुमेरसिंह सांवता
जैसलमेर के ओरण योद्धा सुमेरसिंह सांवता पिछले एक दशक से देवभूमि ओरण को बचाने के लिए संघर्षरत हैं। सौर-पवन परियोजनाओं के दबाव में आती चरागाह- वन भूमि को दर्ज कराने के लिए वे तनोट से जयपुर तक 725 किमी...

जैसलमेर- अनसंग हीरो
बहुचर्चित शिव विधायक रविन्द्रसिंह भाटी की एक तस्वीर अचानक ही सोशल मीडिया की सुर्खियां बन गई। बाड़मेर-जैसलमेर जिलों से बाहर हर कोई यह जानने को आतुर हो गया कि आखिरकार वह शख्स कौन है, जिसे अपने कंधों पर उठाकर शिव विधायक भाटी पैदल चल रहे हैं। सुमेरसिंह सांवता नाम का यह शख्स जैसलमेर में किसी परिचय का मोहताज नहीं है, लेकिन रेगिस्तानी जिलों से बाहर उनकी पहचान इस तस्वीर के बाद ही जमकर वायरल हुई। बीते करीब एक दशक से ओरण बचाने के लिए संघर्ष कर रहे सुमेरसिंह रातों-रात स्टार बन गए, लेकिन तेवटा, साफा व पगरखी पहनने वाले सुमेर को न तो स्टारडम से कोई मतलब है, न ही इस बात से कोई इत्तफाक है कि उन्हें कितने लोग जानते पहचानते है। उन्हें केवल अपने लक्ष्य से मोह है, उनका मोह पशु पक्षियों से है, बेजुबां जानवरों से है, पालतु पशुओं से है, रेगिस्तान की विविध प्रकार की वनस्पतियों से है। एक शब्द में कहें तो सुमेरसिंह भाटी को मोह ओरण से है। ओरण बचाने के लक्ष्य को लेकर इन दिनों वह तनोट माता मंदिर से जयपुर तक करीब 725 किलोमीटर पैदल यात्रा पर चल पड़े हैं। सुमेर की इस यात्रा ने शासन-प्रशासन की नींद उड़ा रखी है।
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दर्ज नहीं हुई ओरण भूमि
रेगिस्तानी जिले जैसलमेर में कुल 38,13,208 लाख हैक्टेयर भूमि है, जिसमें से 18,22,591 लाख हैक्टेयर जमीन सरकारी है, जो सरकार के रेकर्ड में सिवाय चक के नाम से दर्ज है। इस सिवाय चक भूमि में से 2,85,990 लाख हैक्टेयर भूमि ओरण है। वर्ष 1956 में हुए भू-प्रबंधन के समय ओरण भूमि ओरण के रूप में दर्ज नहीं हो पाई, जिसका खामियाजा आज जैसलमेर की आम जनता भुगत रही है। जैसलमेर जिले में सौर व पवन उर्जा कम्पनियों के आने के साथ ही यह ओरण भूमि कम्पनियों के निशाने पर आ गई। राज्य सरकार ओरण भूमि का आवंटन करने पर तुल गई।
अभी भी अधर में 25 हजार बीघा जमीन
पूर्ववर्ती कांग्रेसनीत राज्य सरकार के कार्यकाल में देगराय मंदिर की ओरण भूमि में कम्पनियों का दखल हुआ, जिसका पुरजोर विरोध हुआ। सांवता गांव निवासी सुमेरसिंह भाटी के नेतत्व में विरोध का बिगुल बजा। देगराय की करीब साठ हजार बीघा ओरण भूमि को बचाने के लिए ग्रामीणों ने मिलकर ओरण की परिक्रमा की। अंततः सरकार को झुकना पड़ा। हालांकि देगराय ओरण की करीब चौबीस हजार बीघा भूमि वर्ष 2004 में ओरण में दर्ज हो गई थी, लेकिन शेष छत्तीस हजार बीघा में से छह हजार बीघा जमीन कांग्रेसनीत सरकार के समय दर्ज हुई और चार हजार बीघा जमीन हाल ही में भाजपा सरकार ने भी ओरण में दर्ज की, लेकिन अभी भी यहां की करीब 25 हजार बीघा जमीन लटकी हुई है।
कमोबेश यह स्थिति जैसलमेर जिले के प्रत्येक गांव में है। हर गांव में हजारों बीघा ओरण भूमि है, लेकिन जागरूकता के अभाव में ग्रामीण इस जमीन को ओरण के रूप में दर्ज नहीं करवा पाए। सोलर कम्पनियों के लिए यह जमीन सॉफ्ट टारगेट है। पशुपालक, पर्यावरण प्रेमी व आमजन इस जमीन को बचाने के लिए संघर्षरत है, लेकिन शासन प्रशासन आसानी से उनकी भावनाओं को समझने के लिए तैयार नहीं है।
क्या है ओरण भूमि
ओरण भूमि दरअसल देव वन है, जिसे सैकड़ों-हजारों वर्ष पूर्व देवताओं के नाम पर पर्यावरणीय उददेश्य व पशुपालन आधारित आजीविका के लिए संरक्षित किया गया। यह देवभूमि ग्रामीण आजीविका का आधार बन गई। पशुओं के चरागाह व पक्षियों के लिए आश्रयस्थल बन गई। इस भूमि से लकड़ी काटना भी अपराध माना गया। इस भूमि के प्रति आमजन की आस्था गहरी होती गई, जिससे यह भूमि सदैव बची रही। इस भूमि में दर्जनों की संख्या तालाब व पानी संचय का कैचमेंट एरिया भी है। देगराय की ही ओरण की बात करें तो यहां पर लगभग 48 तालाब है। लाखों की संख्या में पेड़ है। करीब पंद्रह हजार उंट व तीस हजार से अधिक गायें व लाखों भेड़ बकरियां यहां पर पलती है। अलग-अलग क्षेत्रों में देव वन के अलग-अलग नाम है। मारवाड़ में इसे ओरण, शेखावाटी में बनी व पंजाब में इसे रख कहते हैं।
21 जनवरी से शुरू हुई यात्रा
जैसलमेर जिले के तनोट माता मंदिर से सुमेरसिंह भाटी व भोपालसिंह झलोड़ा के नेतत्व में ओरण बचाओ यात्रा की शुरूआत 21 जनवरी से हुई। यह यात्रा 15 मार्च के करीब जयपुर पहुंचेगी। यात्रा में पचास से अधिक सदस्य नियमित रूप से पैदल चल रहे हैं। यात्रा का जगह-जगह स्वागत हो रहा है। इस यात्रा ने करीब 300 किलोमीटर की दूरी तय कर ली है। जयपुर पहुंचने पर यह दूरी 725 किलोमीटर तक हो जाएगी। यात्रा में 70 से 80 वर्ष की उम्र के बुजुर्ग भी ओरण बचाने के लिए पैदल चल रहे हैं।
एक ही मांग, एक ही ध्येय
छठी कक्षा उत्तीर्ण 45 वर्षीय सुमेरसिंह ने अपने जीवन का एक ध्येय बना दिया है- ओरण बचाना। वे कहते हैं कि जब तक सांस है, तब तक वह ओरण बचाने के लिए संघर्ष करते रहेंगे। उनके प्रयासों से बीते एक दशक में जैसलमेर जिले की करीब 33 हजार बीघा जमीन ओरण के रूप में दर्ज हो चुकी है। उनकी एक ही मांग है कि सभी गांवों की देवभूमि ओरण के रूप में दर्ज की जाए। इस क्षेत्र में सुमेरसिंह की छवि ओरण योद्धा की बन चुकी है।
लक्ष्य प्राप्ति तक जारी रहेगा संघर्ष
बीते पांच वर्ष से सुमेरसिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे भोपालसिंह झलोड़ा कहते हैं कि ओरण बचाओ यात्रा का उद्देश्य जनजागरण करना है, सोए हुए शासन प्रशासन को जगाना है। हम तब तक चुप नहीं बैठेंगे, जब तक जैसलमेर जिले की समस्त देव भूमि ओरण के रूप में दर्ज नहीं हो जाती। यदि सरकार ने समय रहते मांग नहीं मानी तो राज्य स्तर पर व्यापक आंदोलन किया जाएगा।






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