‘माई बॉडी माई चॉइस’ का आधार नैतिक मूल्य हों
शरीर पर अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मूल है पर निर्णय सामाजिक उत्तरदायित्व से विमुख नहीं हो सकते। स्वायत्तता और नैतिकता के संतुलन से ही सम्मानजनक और स्वस्थ समाज संभव...

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष
पद्मजा शर्मा,
वरिष्ठ साहित्यकार
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‘माई बॉडी माई चॉइस’ जब हम कहते हैं तो इसका सीधा अर्थ होता है मेरा शरीर मेरी चॉइस। मेरे शरीर पर मेरा अधिकार है, कोई और तय नहीं कर सकता कि मैं क्या पहनूं, क्या खाऊं। और महत्वपूर्ण बात यह कि कोई मुझे नहीं बताए कि मुझे विवाह कब, किससे करना, कब बच्चा करना है, नहीं करना है, प्रजनन संबंधी अधिकार मेरा है। मैं तय करूंगी। यह निर्णय मेरा होगा कि मुझे बच्चा चाहिए कि नहीं। आपके शरीर पर आपका अधिकार है। ग्लोरिया स्टाइनम कहती हैं किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में अपने शरीर पर अधिकार लोकतंत्र की स्थापना का पहला कदम है। और इस आधार पर महिलाएं विशेष रूप से वे जो नस्ल, जाति, वर्ग के आधार पर अवमूल्यित हैं। अब भी अंतरंग तानाशाही के अधीन हैं।
‘अगेंस्ट अवर विल’ अपनी पुस्तक में ब्राउन मिलर कहती हैं कि आप महिलाओं की स्वायत्तता की उपेक्षा नहीं कर सकते। वे कानून और सार्वजनिक दृष्टिकोण दोनों को बदलने पर जोर देती हैं, तब ही महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता को सही रूप में आंका जा सकेगा। यह ठीक भी है कि महिला को हक है कि वह तय करे कि उसे बच्चा पैदा करना है या नहीं करना है। अक्सर महिलाओं को समाज, संस्कृति, पम्परा का भय दिखाकर दबाया गया। लोग क्या कहेंगे। यहां तक कि अगर वह मोटी है तो बॉडी शेमिंग किया गया। इस बॉडी शेमिंग से लड़कों को भी कहां बख्शा जाता है। इंडियन आइडल के एक प्रतिभागी को उनके मोटे होने पर लोग व्यंग करते थे। क्लास के लड़के कभी- कभी उन पर थूकते भी थे।
लड़की लड़के को, व्यक्ति को तय करने दीजिए, उसे मोटा रहना है या पतला। आप कौन हैं उसके शरीर को देखकर तय करने वाले कि वह मोटा रहे कि पतला। महिलाओं को मोटा-पतला, सुंदर- असुंदर, काली- गौरी, ठिगनी- लंबी, कहकर लोग उनमें हीन भाव भरने से बाज नहीं आते। यह कॉमन प्रेक्टिस है। यहां तक कि विवाह के मसले पर भी टांग अड़ाते हैं। मगर यह दखलंदाजी अब कम हुई है जब से लड़कियों ने अपने पांवों पर खड़े होना शुरू किया है। मगर अभी भी उनका रास्ता आसान नहीं है। राह कंटीली है। एक जान पर कितनी आफतें।
आखिर कहां जाएं..
संविधान ने महिलाओं को हक दिया है कि पिता की संपत्ति पर उनका भी बेटों की तरह अधिकार है मगर बेटियां अभी तक खाली हाथ हैं। अधिकतर संपत्ति पर बेटे कुंडली मारे बैठे हैं। लड़कर लोगे तो मिलेगी, वरना जाओ भाड़ में। बेटी का हक न पीहर में न ससुराल में। वह कहां जाए? छूछे हाथ रहे, और क्या। इसलिए लड़कियों को पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खड़े होने की जरूरत है, वह आत्मनिर्भर बने और अपने अधिकारों के प्रति सजग भी रहे। यूं ही सबकुछ होते हुए भी दर- दर की ठोकरें खाती न फिरे। मारी मारी न फिरे।
ताक पर रख दी गई योग्यता
मैंने कहीं पढ़ा है कि STEM एडयूकेशन में लड़कों से आगे निकल रही हैं लड़कियां। स्टेम यानी साइंस टेक्नोलोजी एंजिनियरिंग मैथ्स। ये विषय कोई वक्त में लड़कों के माने जाते थे, मगर अब लड़कियां खूब आ रही हैं। मास्टर्स डिग्री में लड़कियां लड़कों के बराबर हो गई हैं। मगर फिर भी बड़े ओहदों पदों पर लड़कियां आज भी बहुत कम हैं पुरुषों से। उनकी संख्या टिप्स पर गिनने लायक है। इसके लिए जरूरी है उन्हें आरक्षण का लाभ दिया जाए। सदियों से उन्हें दबाकर रखा गया। मौके उनकी आंखों के आगे से जाते रहे। वे इंसान थीं उसी तरह जैसे मर्द। पर उनकी योग्यता को आंका, जांचा ही नहीं गया। बस घर में टेबल कुर्सी पड़ी रहती हैं, उसी तरह वे भी पड़ी रहीं। उन्हें इंसानों में गिना ही नहीं गया। अब जब मौके मिले, अवसर मिले तो उन्होंने साबित किया खुद को। चाहे खेलों में, चाहे राजनीति में, चाहे साइंस में, चाहे अंतरिक्ष में, चाहे युद्ध के मैदान में, चाहे साहित्य के क्षेत्र में। सब जगह उन्होंने अपनी सफलता के परचम फहराए।
जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना भी गलत
हमारे संविधान ने सबको हक दिया है स्वतंत्रता का, समानता का। उसका हनन करना कानूनन अपराध है। मगर इसका अर्थ यह कतई नहीं कि व्यक्तिगत निर्णय या व्यक्तिगत स्वतंत्रता और हक और अधिकार के नाम पर हम अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लें। हम कोई ऐसा काम नहीं कर सकते, जिससे समाज में नैतिक मूल्यों का हनन हो, उनमें गिरावट आए। आपका स्वास्थ्य ठीक है, आपकी शादी को पांच साल हो गए। आपका जॉब लगा है, आपकी उम्र हो गई है 38 साल। आप प्रेग्नेंट हैं और कहती हैं बच्चा नहीं चाहिए, मगर आपके पार्टनर को तो चाहिए। इस पर विचार करने की जरूरत है कि आप मां बनने से क्यों कतरा रही हैं। 38-40 के बाद गर्भ धारण करना कई समस्याओं को जन्म दे सकता है।
आप कोई भी ऐसा काम न करें, कोई भी ऐसा निर्णय न लें, जिससे समाज की नींव चरमराए, परिवार बिखरे। नेगेटिविटी फैले। ‘माई बॉडी माई चॉइस’ को नाजायज हथियार बनाकर किसी की भावनाओं से न खेलें और सामाजिक ढांचे में ऐसी कोई तोड़फोड़ न हो, जिसके कारण हमारी सामाजिक व्यवस्था हिल जाए। समाज और व्यक्ति दोनों तरफ ही जिम्मेदारी का भाव होना चाहिए। व्यक्ति समाज से अलग नहीं है। समाज व्यक्तियों से ही बनता है। प्रेम से ही बनता है। व्यक्ति अपने फैसले ले, मगर फैसले ऐसे हों कि उनका प्रतिकूल प्रभाव परिवार- समाज पर न पड़े। तभी ‘माई बॉडी माई चॉइस’ का नारा पहले से ज्यादा सार्थक होगा। हर व्यक्ति की प्रतिभा, योग्यता को नाम मिले। उसे उसका हक मिले, जिससे यह जीवन बेहतर तरीके से हंसी, खुशी, सम्मान और स्वतंत्रता के साथ जिया जा सके।
पब्लिक स्पीकर एंड कोच सौदामिनी जलौटा के कथन के साथ अपनी सहमति जताते हुए अपनी बात कहूंगी- ‘माई बॉडी माई चॉइस’ का आधार नैतिक मूल्य हों। अगर इसका ध्यान रखा जाए तो विकृति जन्म नहीं ले सकेगी। महिलाएं इस बात को समझें। वहीं समाज को भी यह समझने की जरूरत है कि किसी के निर्णय को समझने के बजाय उसे जज करना गलत है। सोच बदलने की जरूरत है ताकि हम एक ऐसा समाज बना सकें, जहां हर व्यक्ति अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले सके।






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