जब भाषण लिखने वाले को पड़े कोड़े
गुलाबी शहर में होली के रंग फीके क्यों पड़ते दिखते हैं। यह आलेख उत्सव और सत्ता के बीच की उस विडंबना को उजागर करता है जहां जनजीवन के प्रश्न हाशिये पर चले जाते हैं। प्रतीकों का शोर वास्तविक सरोकारों को...

होली पर बेरंगा व्यंग्य। आओ जन्नत के वजीर के एक्स जीजू से मिलें
अमित शर्मा,
लेखक
चैट जीपीटी, जैमिनी और ग्रोक… जैसे तमाम ओपन एआई टूल में अपनी आसान जिंदगी तालाश करने वाले अभागों, कुछ देर तुम्हें व्यंग्य की सैर कराएं। कसम तुम्हें अपने पहले प्यार की.. दूर रख दो थोड़ी देर अपना ओवरस्मार्ट फोन।
इस बार की होली, क्या होली है। एकदम प्रसन्नचित्त कर देने वाली। होली से पहले होली की तैयारी देखने गुलाबी राजधानी की सैर करने निकला। कितने जिम्मेदार नागरिक हैं, इस शहर के! पुराना शहर सरकार ने गुलाबी कर रखा है, बाकि जयपुर को लोगों ने। किसी दीवार का कोना न छोड़ा, चलती सड़क पर भी मुओं ने भर भर के मुंह खोला… सच में रियल पीक सिटी…।
सचिवालय में गजब हाल। एसआईआर के पन्नों में चुनाव आयोग के बाबू दबे पड़े हैं। दिल बचाने को खून पतला करने की गोली खा खा कर वोटर लिस्ट फाइनल होनी है..। क्लास फोर्थ से प्रमुख सचिव के दफ्तर तक में पंचायती चल रही है, निकाय की। पर वन नेशन वन इलेक्शन फार्मूले की तर्ज पर सन्नाटा…। अब राजधानी के नेताओं के गलियारे की और बढ़ते हैं..। गुलाबी नगर की द्रव्यवति नदी में स्नान और आचमन के बाद देखें, इनके तेवर कैसे हैं…।
सीएमओ की ओर बढ़े तो भाषण लिखने वाले को कोड़ों से पीटा जा रहा था। चार अफसर लगे थे खाकी से दंड बरसाने..। कोई एक दिन तो ऐसा भाषण लिख कि फंबल न हो। गलती यह नामुराद करता है, रील साहब पर बन जाती है। दूदू वाले डिप्टी साहब के दफ्तर की तरफ बढ़े तो उनकी कुर्सी पर उनके सुपुत्र विराजे। पता चला पापा रशिया न चले जाएं, इस खातिर माताजी रोज लाडले को साथ कर देती हैं। उफ… दूसरी डिप्टी के कमरे की तरफ बढ़े तो एडीसियों की फौज में सचिवालय कैद। हुकुम तक पहुंचें तो कैसे, चलो टूरिज्म के किसी कार्यक्रम में मिल लेंगे, वैसे भी दर्शक वहां आते नहीं, मुलाकात आसान रहेगी।
उद्योग मंत्री कम खेल मंत्रीजी के कैबिन में झांका तो वो शीशे के सामने रिहर्सल करते दिखे। कह रहे थे- चैलेंज देता हूं.. एक भी पेपर लीक नही हुआ..। हमने पूछा अजी अपने महकमे की कहो, जितने निवेश कहे थे उतने हुए क्या..? फिर वही राग.. ‘चैलेंज देता हूं.., एक भी निवेश हुआ क्या.. ओह सॉरी.. एक भी पेपर लीक हुआ क्या..?’
हमें लगा शूटर आदमी है, बंदूक उठा ले, उससे पहले निकल लो..। फिर हम बढ़े हेल्थ वाली मिनिस्ट्री की ओर.. मूंछों पर ताव के चक्कर में दद्दा अस्पताल जाना भूल गए.. जिसके लिए ताव दिए वही कमीशन के स्टिंग में खेल गए। बढ़े हम जल मंत्री की ओर तो। बस बालाजी की धुनी चल रही। आरती हो रही.. कि इस बार भी बालाजी बारिश करा दें.. तो नल में पानी आता रहे..। अरे थांके नाम की भी आराधना कर लो.. फाग रो मौसम है.. फाग गाओ.. कानूड़ा ने रिझाओ…।
सचिवालय से बाहर आए तो पहली बार एमएलए बने बाबा ठेले वालों को धमकाते रील बनाते दिखे..। हमने नाम पूछा तो कहे- बवाल। आगे बढ़े तो तेज धूप में शेरवानी पहने एक बुजुर्ग बढ़ते दिखे। हमें लगा चच्चा की शादी है.. तभी बालों में खिजाब लगवाएं हैं। चेहरा दिखा तो ये तो पत्रकार कोटे वाले हमारे महानगरीय विधायक हैं। लगता है गिफ्ट में इतने शेरवानी के थान मिले, कि बस अब वही पहनते हैं।
होली के रंग ढूंढने निकले थे.. उबिया गए.. सत्ता से तो..। विपक्ष के कार्यालय की ओर बढ़े.. कुछ कौव्वे दिखे। अब भला विपक्ष के दफ्तर में क्या रौनक। वैसे भी नया दफ्तर बन रहा है.. जब बन जाएगा.. तभी रौनक लौटे.. अध्यक्ष जी गमझे को दुलार रहे थे। बोले- हम से ज्यादा ये चर्चा में हैं। वैसे भी उनके डुप्लिकेटों के भी गमझे मिलियन व्यूज ला रहे हैं। शाम होने लगी तो हम एंटरटेमेंट पैराडाइज की ओर बढ़ गए। वहां नेता प्रतिपक्ष के फैमेली फंक्शन की रौनक थी..। सत्ता वाले मंत्री भी गा रहे थे- जूली जूली जूली.. वहां हमें पिछली सरकार में निकम्मा और नालायक जैसे नए संसदीय शब्दों के सर्जक भी मिले। हमने कहा हे मारवाड़ के गांधी, विधानसभा से लेकर नरेगा विरोध धरनों में आप दिखते नहीं। वो मुस्कुराए, बोले- अबे होली के भाड़ू, अभी तो तीन साल बाकी हैं..। जब चुनाव आएंगे, तब हम नजर आएंगे। हमने साथी पत्रकारों के सामने झेंप मिटाई.. ये जो कहते हैं हमें तो समझ ही नहीं आता। इन्हें शहद और काली मिर्च खानी चाहिए।
पीछे से कश्मीर के वजीर के एक्स जीजू बाहर जाते दिखे। हमने दौड़कर बात करनी चाही, पर वो नाराज, बोले- तुम पत्रकार उन्हें ही घेरे रहते हो, हमारा नंबर कब आएगा। हमने कही- ये हम से ना, दिल्ली वाले तुम्हारे बुजुर्ग बैचलर से पूछो। वो और नाराज होकर चल दिए, फिर हमें याद आया वो भी तो इसी कतार में हैं कि मेरा नंबर कब आएगा।
खैर.., हम गए तो थे सबसे होली की रामा श्याम करने.. पर बात बिगड़ गई…। सचिवालय से दिल्ली तक सबको नाराज कर दिया.., पर दिक्कत की कोई बात नहीं..। हम कह कुछ भी आए हों, पूछ कुछ भी आए हों.. लिख कुछ भी दें. छपेगा वही, जो ‘वो’ चाहते हैं। यही रीत है। हमारा तो कहना है कि अब अखबारों, मैग्जीन पर साल में एक दिन नहीं, रोज लिखाना चाहिए..
बुरा न मानो होली है..!!






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