उलझन में मोदी-शाह
भाजपा कार्यकर्ताओं को भी नहीं लग रहा कि यह "उनकी सरकार" है। नौकरशाही के हावी होने के आरोप, विपक्ष की ऊंची आवाज, और दिल्ली-जयपुर के बीच होने वाली राजनीतिक हलचलों ने इस तस्वीर को और जटिल बना दिया है।...

राजस्थान को लेकर भाजपा चिंतित क्यों
राजस्थान में भाजपा की सरकार आने के बाद पहली बार के विधायक भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बने ढाई साल होने जा रहे हैं, लेकिन यदि भाजपा के नेता और कार्यकर्ता ही यह कहने लगे हैं कि उन्हें लग ही नहीं रहा, प्रदेश में उनकी सरकार है, तो एक बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है कि आखिर राजस्थान जैसे बड़े राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का फैसला गलत साबित कैसे हो सकता है।
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शायद यही कारण है कि राजस्थान में भाजपा की राजनीति मोदी-शाह के लिए एक गुत्थी बनकर रह गई है। मोदी-शाह और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की उलझन यह भी है कि ढाई साल होने को आए, लेकिन मुख्यमंत्री भजनलाल अभी तक खुद को राजनीतिक रूप से स्थापित नहीं कर पाए। हालांकि राजस्थान जैसा प्रयोग भाजपा ने मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के बाद ओडिसा में भी किया, लेकिन वहां इस तरह की स्थिति नहीं है। कारण कि वहां मुख्यमंत्री बनाए गए नेताओं को कुछ न कुछ अनुभव था, लेकिन राजस्थान में साफ छवि का चेहरा देखकर लाए गए भजनलाल अनुभव की कमी के कारण ही अभी तक खुद को साबित करने के संघर्ष में ही उलझे हुए हैं।
दरअसल, भजनलाल शर्मा की ताजपोशी दिल्ली के नेतृत्व के समर्थन और संगठनात्मक कार्य के आधार पर हुई। मुख्यमंत्री पद की स्वाभाविक दावेदार माने जा रही दो बार की सीएम वसुंधरा राजे के हाथ से ही पर्ची खुलवा कर विधायक दल की बैठक में सबसे आखिरी कतार में खड़े नए नवेले विधायक भजनलाल को मुख्यमंत्री बना दिया गया। इसके बाद हालांकि सरकार ने कई अच्छे काम भी किए हैं, लेकिन मुख्यमंत्री की छवि अभी भी ‘पर्ची वाले सीएम’ के दायरे से बाहर नहीं आ पाई। इसने राज्य स्तर पर उनके लिए चुनौतियां पैदा कीं। भाजपा के कई वरिष्ठ नेता और विधायक अभी भी उनके साथ पूरी तरह से जुड़े नहीं हैं, जिससे भजनलाल की छवि “कमजोर और अस्थिर” लगती है।
चुनौती बन गया प्रयोग
भाजपा कार्यकर्ताओं को भी नहीं लग रहा कि यह “उनकी सरकार” है। नौकरशाही के हावी होने के आरोप, विपक्ष की ऊंची आवाज, और दिल्ली-जयपुर के बीच होने वाली राजनीतिक हलचलों ने इस तस्वीर को और जटिल बना दिया है। या यूं कहें कि मोदी और शाह के लिए राजस्थान में भाजपा की राजनीति एक चुनौतीपूर्ण पहलू बन गई है।
गड़बड़ा रहा है संतुलन
मोदी-शाह के लिए समस्या यह है कि वे चाहते हैं कि भाजपा की सरकार राज्य में मजबूत हो, लेकिन इसके लिए भजनलाल शर्मा को अधिक स्थानीय समर्थन और संगठनात्मक मजबूती की आवश्यकता है। वर्तमान स्थिति में यह संतुलन गड़बड़ रहा है, जिससे दिल्ली में अटकलें और चिंता बढ़ रही है। मोदी–शाह के लिए राजस्थान में भाजपा की राजनीति अब तक “साफ–सुथरा नियंत्रण” वाला बिंदु नहीं बन पाई है, क्योंकि भजनलाल शर्मा की सरकार नौकरशाही, अंदरूनी टकराव और विपक्ष के सक्रिय दबाव के बीच उलझी हुई है। भजनलाल खुद को भाजपा के भीतर और जनता के बीच भी “असली मुख्यमंत्री” साबित नहीं कर पा रहे और उनके लिए पार्टी संगठन, विधायक और नौकरशाही के बीच तालमेल अभी तक नहीं बन पाना सबसे बड़ी समस्या है।
वसुंधरा की मजबूत छवि
इधर, मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने से नाराज होकर वसुंधरा एक बार तो कोप भवन में चली गई थी और जब वे वापिस सक्रिय हुई तो राजनीतिक मंच ही नहीं, अन्य कार्यक्रमों में भी फर्क साफ नजर आने लग गया। वसुंधरा हालांकि भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रही हैं, लेकिन राजस्थान में वे जब भी, जहां भी जाती है तो उनका जलवा अलग ही नजर आता है और जब एक ही मंच पर भजनलाल और वसुंधरा साथ हो तो इस फर्क को साफ देखा जा सकता है। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजस्थान दौरों के वक्त भी जब दोनों एक ही मंच पर दिखे तो सामने बैठी भीड़ में क्रेज वसुंधरा का ही दिखा। हाल ही प्रधानमंत्री मोदी की अजमेर यात्रा ताजा उदाहरण है। मोदी ने सम्बोधन की शुरुआत में जैसे ही वसुंधरा को बहन कहकर सम्बोधित किया, पूरा पांडाल हर्षध्वनि से गूंज उठा, लेकिन सीएम भजनलाल व अन्य नेताओं का नाम लिए जाते वक्त खामोशी ही छाई रही। इस घटना ने मोदी को हैरान-परेशान तो नहीं, लेकिन यह सोचने के लिए मजबूर तो कर ही दिया कि वसुंधरा ही राजस्थान में भाजपा की जनाधार वाली नेता हैं।
यहां तक कि पार्टी संगठन की बैठकों में भी वसुंधरा मैदान मार ले जाती है। पार्टी की संगठनात्मक कार्यशाला में वसुंधरा ने नौकरशाही पर कार्यकर्ताओं की बात नहीं सुनने पर जिस लहजे में बात रखी, वह पार्टी के कार्यकर्ता आज भी याद करते हैं। कुल मिलाकर लोग सीधा साधी कम्पेरिजन कर लेते हैं। पार्टी के एक नेता ने कहा कि उन्हें तो आज भी लगता है कि भले ही मेडम सीएम की कुर्सी पर नहीं है, लेकिन उनका हावभाव आज भी मुख्यमंत्री से कम नहीं लगता।
दिक्कत कनेक्टीविटी की
राजनीतिक समीक्षक राजेंद्र व्यास कहते हैं कि दिक्कत मुख्यमंत्री की अनुभवहीनता ही नहीं है। वे अभी तक खुद को अपने ही लोगों से पूरी तरह कनेक्ट नहीं कर पाए हैं। फिर वसुंधरा की सक्रियता उनका कद और छोटा कर देती है। भजनलाल अभी तक तो सभी को साथ लेकर चलने वाली क्षमता ही नहीं दिखा पाए हैं। वसुंधरा सफल मुख्यमंत्री रही, इसके पीछे साफ कारण था कि वे मतभेदों के बावजूद सभी को साथ लेकर चल सकती थी। किसी को आंख दिखा देती तो किसी को पुचकार कर काम निकाल लेती। उन्होंने अपनी ये खासियत चुनावों के दौरान और सरकार चलाने के दौरान साबित की थी।
व्यास कहते हैं कि एक वक्त में भाजपा का राजस्थान में चेहरा भैरोंसिंह शेखावत ही रहे। उनके बाद वसुंधरा चेहरा बनी तो भाजपा को प्रदेश में पहली बार न सिर्फ बहुमत मिला, बल्कि भाजपा की राज्य में सर्वाधिक 163 सीटें लाने का रिकार्ड भी वसुंधरा के नाम ही है, जब उन्होंने कांग्रेस को 26 सीटों पर समेट दिया था। लोग तो ये सारी चीजें देखते हैं, लेकिन राजस्थान में मोदी-शाह से चूक हो गई। आज भी यह साफ है कि वसुंधरा के मुकाबले जनाधार वाला कोई और नेता राजस्थान भाजपा के पास नहीं है।
…और शुरू हो जाती है अटकलें
शायद यही कारण है कि राजस्थान में भाजपा के अंदर दिल्ली और जयपुर में होने वाली हलचलें हर बार अटकलों का बाजार गर्म कर देती हैं। भजनलाल औसतन हर महीने दिल्ली जाते हैं। कभी शाह से मिलते हैं तो कभी मोदी से। कुछ संयोग तो पिछले वर्ष ऐसे भी बने कि जैसे ही वसुंधरा मोदी से मिली, अगले ही दिन भजनलाल की भी प्रधानमंत्री से मुलाकात की तस्वीरें सामने आ गई। वसुंधरा भी कोई मौका नहीं छोड़ती और दिल्ली में उनकी हर मुलाकात राजस्थान में हलचल पैदा कर देती है। अनुभवी नेता वसुंधरा की गर्मजोशी भरी मुलाकातें यह संकेत देती हैं कि दिल्ली राजस्थान में एक बार फिर “वसुंधरा-प्रभाव” पर दांव लगा सकता है, लेकिन साथ ही यह संकेत भी आने लगते हैं कि हाकम अपना हुकम इतना जल्दी नहीं बदलता, ऐसे में वसुंधरा के लिए अंगूर अभी खट्टे ही हैं। फिर भी सवाल उठता है कि क्या राजस्थान में स्थानीय नेतृत्व स्थापित नहीं हो पा रहा और हर बड़ा फैसला दिल्ली से आ रहा है। इससे भाजपा कार्यकर्ताओं को लगता है कि उनका योगदान और उनकी बात दूरी पर है।
सरकार दिल्ली से चल रही है…
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि हकीकत तो यही है कि केंद्रीय नेतृत्व या मोदी शाह-कहें, दिल्ली से सरकार चला रहे हैं। हर किसी को पता है कि अफसरों को सीधे दिल्ली से निर्देश मिलते हैं। यहां तक कि ट्रांसफर-पोस्टिंग के फैसले भी वहां से हरी झंडी मिलने पर ही हो पाते हैं। ऐसे में विधायकों और कार्यकर्ताओं में निराशा का भाव आना स्वाभाविक है।
उनका कहना था कि विपक्ष के नेताओं का अनुभव भी सरकार पर भारी पड़ जाता है। वे सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ते और मंत्री और नौकरशाह हर बार कोई न कोई ऐसी गलती कर बैठते हैं कि विपक्ष को मुद्दा मिल जाता है। विपक्ष ने भजनलाल सरकार के खिलाफ भर्ती घोटाले, भ्रष्टाचार और नौकरशाही की हकीकत को सदन और सड़क पर लगातार उठाया है। विपक्ष हर बार इन मुद्दों को राजनीतिक रूप से इस्तेमाल करके भजनलाल सरकार को कमजोर और अक्षम सरकार के रूप में पेश करता है। यह बात जनता में स्थायी रूप से असर डाल रही है, जिससे भाजपा की छवि कमजोर हो रही है।
विपक्ष पूरी तरह हावी
राज्य विधानसभा के हाल ही सम्पन्न हुए बजट सत्र में भी विपक्ष सरकार पर पूरी तरह हावी नजर आया। नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली और कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा ही नहीं, विपक्ष के की विधायकों ने जैसे सरकार को पैरों पर खड़ा कर दिया। मंत्री सवालों का सही जवाब तक नहीं दे पाए तो आसन तक को हस्तक्षेप करना पड़ा। सरकार के लिए तो असहज स्थिति उस वक्त भी होती दिखी, जब विपक्ष ही नहीं, सत्ता पक्ष के विधायकों ने भी मंत्रियों की कार्यशैली पर सदन में सवाल खड़े कर दिए।
कुल मिलाकर, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने एक साफ छवि वाले मुख्यमंत्री के रूप में काम तो किया है, लेकिन वे खुद को अभी तक स्थापित नहीं कर पाए हैं। यही मोदी-शाह भी चिंता है। जानकार कहते हैं कि यदि यही स्थिति रही तो भाजपा के लिए आने वाले चुनावों में मुश्किल भी हो सकती है। आखिर 2028 के चुनाव में वह किसके चेहरे और किस रिपोर्ट कार्ड के साथ जनता के बीच जाएगी। रिपोर्ट कार्ड के आंकड़े अपनी जगह होते हैं और जनता में बनने वाला नैरेटिव अपनी जगह काम करता है। यह बात भाजपा नेतृत्व के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है।






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