मोदी-शाह की बड़ी अग्निपरीक्षा
पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाले साबित हो सकते हैं। जहां एक ओर यह चुनाव केंद्र सरकार के लिए जनमत की कसौटी हैं, वहीं क्षेत्रीय...

सियासत : 4 राज्यों और 1 केन्द्रशासित प्रदेश में बजी चुनावी रणभेरी
राजेश कसेरा,
वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक
एक देश-एक चुनाव का सपना साकार होने के बीच भारत के चार राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और केन्द्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में आखिरकार विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज गई। अप्रैल के महीने में इन सभी विधानसभाओं के चुनाव हो जाएंगे और नतीजे 4 मई को सामने आ जाएंगे। इन चुनावों में भले राज्यों के मुद्दों के साथ राष्ट्रीय स्तर के कई सियासी समीकरण जीत-हार की हवा को तय करेंगे, लेकिन इस बार एक बड़ा फैक्टर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मच रही उथल-पुथल भी चुनाव की दिशा को तय करेगा। ईरान पर अमेरिका-इजराइल के हमले के बाद जिस तरह की चुनौतियां भारत में बढ़ी हैं, वे भी मतदाताओं के दिलोदिमाग पर जरूर दस्तक देंगी। ऐसे में यह मुद्दा एनडीए गठबंधन को परेशान कर सकता है तो चारों राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेश के सत्तारूढ़ दलों की भी समस्याएं बढ़ा सकता है। इन राज्यों का सत्ता संग्राम इसलिए भी दिलचस्प होगा, क्योंकि दो राज्यों में केन्द्र में सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए की सरकारें हैं तो तीन में विपक्ष इंडी गठबंधन की।
Table Of Content
- सियासत : 4 राज्यों और 1 केन्द्रशासित प्रदेश में बजी चुनावी रणभेरी
- प्रभुत्व नहीं खोना चाहेंगे क्षेत्रीय दल
- असम : यहां का चुनाव हिमंत बिस्वा सरमा Vs गांधी परिवार
- केरल : कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट के लिए चुनाव अंतिम युद्ध जैसा
- पश्चिम बंगाल : ममता और मोदी-शाह के बीच करो या मरो का मुकाबला
- तमिलनाडु : भाजपा और कांग्रेस दोनों इस चुनाव के साइड हीरो
- पुडुचेरी : भाजपा के पास खोने को कुछ नहीं
- रसोई गैस व पेट्रोल-डीजल का संकट बढ़ा तो नतीजों पर असर
- भरोसे और विवादों के बीच एसआईआर की परीक्षा
राजनीतिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करें तो ये विधानसभा चुनाव केन्द्र की नरेंद्र मोदी सरकार के लिए मिड टर्म जनमत संग्रह भी हो सकते हैं। कांग्रेस जैसे सबसे बड़े राष्ट्रीय दल को हाशिए पर लाने वाली भारतीय जनता पार्टी मोदी की बढ़ती लोकप्रियता के बावजूद कई क्षेत्रीय दलों से पार नहीं पा सकी। खासकर पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी का कोई तोड़ भाजपा और उसकी मजबूत रणनीति नहीं ढूंढ सकी। लोकसभा चुनाव में भले भाजपा ने यहां पर उम्मीद से परे जाकर परिणाम दिए, लेकिन विधानसभा चुनावों में ममता से लोहा लेना आसान नहीं होगा।
प्रभुत्व नहीं खोना चाहेंगे क्षेत्रीय दल
एनडीए बनाम इंडी गठबंधन के बीच केंद्रित होती जा रही देश की राजनीति के बीच कई क्षेत्रीय दल ऐसे हैं जो केंद्रीय स्तर पर तो गठबंधन की राजनीति करना चाहते हैं, लेकिन अपने राज्यों में वे सत्ता बांटना नहीं चाहेंगे। इन परिस्थितियों में ये विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के गठबंधनों के लिए अस्तित्व बचाने की लड़ाई से कम नहीं साबित होंगे।
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव परिणाम यह भी बताएंगे कि आने वाले दिनों में क्षेत्रीय दलों की देश की राजनीति में क्या भूमिका रहने वाली है? ममता बनर्जी और स्टालिन की जीत अगले साल उत्तरप्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव को नई ताकत देगी। वहीं इनकी हार कांग्रेस को उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी पर हावी होने का मौका दे देगी। इन चुनावों में जहां कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों की प्रतिष्ठा दांव पर है तो तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और एआईएडीएमके जैसे मजबूत क्षेत्रीय दलों की भी अग्निपरीक्षा है। इन चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह, राहुल गांधी, ममता बनर्जी, एमके स्टालिन और हिमंत बिस्वा सरमा जैसे बड़े नेताओं के राजनीतिक भविष्य भी तय होंगे।
असम : यहां का चुनाव हिमंत बिस्वा सरमा Vs गांधी परिवार
असम में 10 वर्ष से भाजपा की सरकार है और कांग्रेस सरकार के दौरान सुपर चीफ मिनिस्टर कहे जाने वाले हिमंत बिस्वा सरमा इसके मुखिया हैं। कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने के बाद सरमा ने वर्ष 2016 और 2021 के लगातार दो विधानसभा चुनाव में असम से कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। इतना ही नहीं, पूरे नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में कांग्रेस के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया। इस वजह से असम का यह विधानसभा चुनाव कांग्रेस खासकर गांधी परिवार के लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को बचाने का चुनाव साबित होगा। यही कारण है कि राहुल गांधी ने दिग्गज नेताओं की फौज के साथ प्रियंका गांधी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर चुनाव मैदान में उतार दिया। यदि हिमंत बिस्वा लगातार तीसरी बार भाजपा को जीत दिलाने में कामयाब होते हैं तो वे भी भाजपा के प्रधानमंत्री के संभावित दावेदारों की सूची में शामिल हो सकते हैं। लेकिन इसके उलट परिणाम आते हैं तो नॉर्थ ईस्ट के अन्य राज्यों में कांग्रेस के लिए अच्छे दिनों की वापसी हो जाएगी और राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी की स्वीकार्यता बढ़ जाएगी। हालांकि हिमंत बिस्वा ने कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा को भाजपा में शामिल कर कांग्रेस को एक और बड़ा झटका दिया। राहुल के करीबी गौरव गोगोई के राजनीतिक भविष्य का फैसला भी काफी हद तक इस चुनाव में हो जाएगा।
केरल : कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट के लिए चुनाव अंतिम युद्ध जैसा
असम की तरह केरल में भी कांग्रेस पिछले 10 साल से राज्य की सत्ता से बाहर है। एक बार लेफ्ट फ्रंट (एलडीएफ) और एक बार कांग्रेस फ्रंट वाली (यूडीएफ) सरकार का रिवाज वर्ष 2021 में जनता ने बदल दिया। इसके कारण लेफ्ट दलों ने लगातार दूसरी बार राज्य में सरकार बनाकर नया इतिहास रच दिया। केरल लेफ्ट दलों का आखिरी दुर्ग है, जिसे नहीं बचा पाए तो आने वाले दिनों में यह दल सिर्फ इतिहास और एकेडमिक बहसों का हिस्सा मात्र बनकर रह जाएगा। वहीं कांग्रेस लगातार तीसरी चुनाव हार गई तो यहां भाजपा के नेतृत्व में नया गठबंधन मजबूती से उभर जाएगा। केरल की हार कांग्रेस को दिल्ली की सत्ता से और दूर कर देगी।
पश्चिम बंगाल : ममता और मोदी-शाह के बीच करो या मरो का मुकाबला
पश्चिम बंगाल में क्षेत्रीय दल तृणमूल कांग्रेस और उसकी मुखिया ममता बनर्जी की प्रतिष्ठा दांव पर है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए इस बार का चुनाव नॉकआउट मुकाबले की तरह व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का होगा। वर्ष 2011 से लगातार बंगाल की सत्ता में बनी हुई ममता बनर्जी लगातार चौथी बार सरकार बनाने के लिए मैदान में डटी हैं। वहीं पिछले विधानसभा चुनाव में तीन सीटों से बढ़कर सीधे 77 सीटों पर पहुंचने वाली भाजपा को अच्छे से पता है कि इस बार की हार बंगाल में उनकी पार्टी और संगठन को बुरी तरह से तहस-नहस कर देगी। भाजपा के लिए यह चुनाव विकसित भारत-2047 के मिशन को बूस्टर डोज देने जैसा होगा। हालांकि बंगाल में भाजपा की जीत की राह उसके मुख्यमंत्री पद के दावेदार पर काफी निर्भर करेगी। ममता को हराने के लिए राज्य की जनता को स्वीकार्य विश्वसनीय चेहरा और मजबूत संगठन दोनों चाहिए। राज्य का बड़ा अल्पसंख्यक वोट बैंक तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनावी ताकत है। वहीं भाजपा के लिए इस बार भी हिंदू मतदाताओं को अपने पक्ष में गोलबंद करना सबसे बड़ी चुनौती होगी। पिछली बार मिलकर लड़े कांग्रेस और वाम मोर्चा इस बार अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरेंगे। उनकी सीमित चुनावी भूमिका में यह देखना दिलचस्प रहेगा कि वे तृणमूल के अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाते हैं या सत्ता विरोधी मतदाताओं में हिस्सा बांटकर भाजपा को नुकसान पहुंचाते हैं।
तमिलनाडु : भाजपा और कांग्रेस दोनों इस चुनाव के साइड हीरो
तमिलनाडु का विधानसभा चुनाव क्षेत्रीय दलों सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके और विपक्षी एआईएडीएमके के भविष्य और वजूद बचाने के लिए महत्वपूर्ण होगा। कांग्रेस और भाजपा दोनों इस राज्य में हीरो के दोस्त यानी साइड हीरो की भूमिका में हैं। यहां दोनों क्षेत्रीय दलों में से जिसको भी सत्ता मिलेगी, वह पूरी हिस्सेदारी के साथ केन्द्र में अपने गठबंधन को मजबूत बनाएगा। देखा जाए तो तमिलनाडु की राजनीति द्रमुक और अनादमुक के बीच दो ध्रुवीय रही। लेकिन जयललिता के निधन के बाद यह संतुलन गड़बड़ा गया। अन्नाद्रमुक के एकीकरण और उससे गठबंधन के जरिए भाजपा वहां सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं तलाश रही हैं, लेकिन एमके स्टालिन सरकार के कार्यकाल में सनातन धर्म और हिंदी भाषा को लेकर उठते विवादों के बावजूद यह आसान नहीं लगता। इनके बीच टीवीके दल बनाकर फिल्म अभिनेता से राजनेता बने थलापति विजय यदि बड़ी ताकत बनकर उभरे तो तमाम समीकरण गड़बड़ा सकते हैं। अन्य क्षत्रपों की तरह एमके स्टालिन भी अपने बेटे उदयनिधि की ताजपोशी करना चाहते हैं, लेकिन उनकी राष्ट्रीय राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला। इन सबके बीच यदि टीवीके की चुनावी मौजूदगी से गैर द्रमुक दलों की सत्ता संभावनाएं बनीं तो यह दक्षिण भारतीय राज्य में भाजपा के लिए बिना टिकट खरीदे लॉटरी खुलने से कम नहीं होगा।
पुडुचेरी : भाजपा के पास खोने को कुछ नहीं
केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में इस चुनाव में सत्तारूढ़ गठबंधन ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस, भाजपा और अन्नाद्रमुक गठबंधन के सामने सरकार बचाना बड़ी चुनौती होगी। यहां की सत्ता तमिलनाडु की तर्ज पर चलती है और वहां की सियासत का असर भी यहां दिखता है। पुडुचेरी के मुख्यमंत्री और ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस के नेता एन. रंगासामी इस चुनाव में पुडुचेरी को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने का सियासी दांव चल सकते हैं। साल 2021 के चुनाव में ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस 16, भाजपा 9 और अन्नाद्रमुक 5 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। इसमें ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस ने 10 और भाजपा ने 6 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं अन्नाद्रमुक एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। पुडुचेरी की 30 सीटों पर इस बार अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके (तमिलागा वेट्री कझगम) के उतरने से मुकाबला और रोचक हो गया। उनकी स्टारडम की छवि चुनाव में चली तो वे सरकार बनाने के दावेदारों में किंगमेकर के रूप में जुड़ जाएंगे। पुडुचेरी में अक्सर त्रिशंकु विधानसभा या गठबंधन सरकारें बनती हैं। ऐसे में छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों का महत्व इस बार भी बढ़ेगा। लेकिन अंतिम समीकरण बनाने में राष्ट्रीय नेतृत्व की भूमिका अहम होगी। क्योंकि पुडुचेरी में उप राज्यपाल का अंतिम अधिकार होने से चुनी हुई सरकार खुद को सीमित महसूस करती हैं। इससे यह धारणा बनती है कि जनता की चुनी गई सरकार पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है।
रसोई गैस व पेट्रोल-डीजल का संकट बढ़ा तो नतीजों पर असर
पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण भारत में रसोई गैस से लेकर पेट्रोल-डीजल की आपूर्ति बाधित हुई है। रसोई गैस के साथ पावर पेट्रोल के दाम बढ़ने और सिलेंडरों की किल्लत ने आमजन की जिन्दगी को हिलाकर रख दिया। जंग ने अचानक से महंगाई को भी बढ़ा दिया। विपक्ष को जहां इस जंग से बैठे-बिठाए केन्द्र सरकार को घेरने का मुद्दा मिल गया तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी लोकसभा में स्वीकार किया कि युद्ध के कारण कठिन हालात लंबे समय तक बने रह सकते हैं। इसके लिए उन्होंने देश की जनता से एकजुट रहने की अपील की। प्रधानमंत्री के बयान से साफ दिखा कि आगे समय विकट रह सकता है और इसके बीच अप्रैल में मतदान होना है। बंगाल में तो अप्रैल के आखिरी दिनों में वोटिंग है। तब तक जंग का परिदृश्य और बिगड़ा तो चुनाव के परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।
युद्ध से जुड़ा दूसरा बड़ा मसला उर्वरकों का भी है। भारत जितना फर्टिलाइजर आयात करता है उसका 26.2 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। वित्त मंत्रालय ने भी इस पर चिंता जताई कि युद्ध लंबा चलने पर एलएनजी और क्रूड पर निर्भर फर्टिलाइजर और पेट्रोकेमिकल्स जैसे क्षेत्रों पर बुरा असर पड़ सकता है। खरीफ सीजन से पहले केरल, पश्चिम बंगाल और असम के लिए यह मामला और संवेदनशील बन सकता है।
भरोसे और विवादों के बीच एसआईआर की परीक्षा
देश में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) को लेकर उठे विवाद के बीच भाजपा और जेडीयू ने बिहार में सबसे बड़ी जीत दर्ज की। इसके बाद विपक्ष को भी इस मुद्दे पर मुंह की खाली पड़ी। इसके बावजूद इन विधानसभा चुनावों में एसआईआर का मुद्दा सभी गैर भाजपा शासित राज्यों में गर्म रह सकता है। खासकर बंगाल में तो इसे तृणमूल कांग्रेस की ओर से विशेष रूप से उभारा जाएगा। इसके जवाब में भाजपा यहां घुसपैठियों के मुद्दे को जोर-शोर से उठाएगी, लेकिन यह समय बताएगा कि वह वांछित सफलता हासिल कर पाएगी या नहीं? यदि इस चुनाव में भी भाजपा एसआईआर की चुनौती को पार पाने में सफल रहती है तो उसके अश्वमेघ घोड़े को कोई रोक नहीं पाएगा।






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