राजनीति, होली और हुड़दंग
होली के रंगों से आगे बढ़ चुकी राजनीति अब आरोप, कीचड़ और छवि युद्ध का अखाड़ा बन गई है। दल, आईटी सेल और ट्रोल संस्कृति ने लोकतांत्रिक संवाद को व्यंग्यात्मक रंगोत्सव में बदल दिया...

रंगों का त्योहार एक दिन, राजनीति का हुड़दंग साल भर
रंग-बिरंगी होली का सभी को इंतजार रहता है। समस्या यह है कि हुड़दंगियों ने होली जैसे रंगीले त्योहार का चेहरा भी विद्रूप कर दिया है। राहत की बात यह है कि ऐसा साल में एक दिन ही होता है, लेकिन राजनीति में तो ये हुड़दंग 365 दिन चलता रहता है। असल में नेता नामक जीव को हुड़दंग बहुत पसंद है। इसके लिए वह फागुन का इंतजार नहीं कर सकता। इसलिए भारतीय राजनीति के अखाड़े में होली का हुड़दंग बिना नागा चलता रहता है। नेता हमेशा एक दूसरे का मुंह काला करने की फिराक में रहते हैं। जिस नेता का मुंह काला होता है, वह भी पूरे मनोयोग से दूसरे नेताओं के चेहरों पर कालिख मलने का कोई अवसर नहीं छोड़ता।
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कीचड़ जीवी नेताओं का हुड़दंग प्रेम
राजनीति में चौबीसों घंटे कीचड़ की होली की धूम रहती है। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप रूपी कीचड़ फेंकने का सिलसिला कभी नहीं थमता। यह अलग बात है कि कई बार दूसरे पर फेंका कीचड़ खुद पर ही गिर जाता है और जग—हंसाई का कारण बनता है, लेकिन वह हार नहीं मानता। “करत-करत अभ्यास ते, जड़मति होत सुजान। रसरी आवत-जात ते, सिल पर परत निसान॥” जैसे दोहे ऐसे नेताओं का हौसला बढ़ाते रहते हैं। वे एक दिन इस काम में इतने कुशल हो जाते हैं कि उन्हें कीचड़ के बिना जीवन नीरस लगता है। कीचड़ जीवी इन नेताओं को हुड़दंग से इतना प्रेम हो गया है कि सोशल मीडिया पर भी फेक न्यूज और डीपफेक वीडियो के गुब्बारे फोड़ने की प्रतियोगिता निरंतर चलती रहती है। ये नेता एक दूसरे को रंगने के लिए पुराने रंगों का भी खूब इस्तेमाल करते हैं। देश का विभाजन, चीन, पाकिस्तान, आपातकाल, सांप्रदायिकता, जातीय भेदभाव, आरक्षण, किसान, धार्मिक विवाद जैसे रंग तो कभी पुराने ही नहीं होते। महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर, सावरकर के नामों का भी खूब इस्तेमाल होता है। एक दल सांप्रदायिकता के रंग से भरी पिचकारी चलाता है, तो दूसरा दल जातिवादी रंग उड़ेल कर उसका चेहरा बिगाड़ने लगता है।
असली पर भारी नकली
घाघ नेता हुड़दंग के लिए नए—नए रंगों की तलाश में रहते हैं। कई बार तो बहुत आसानी से रंग हाथ में आ जाते हैं। जैसे कथित वोट चोरी को लेकर सत्ता पक्ष की घेरेबंदी चल ही रही थी कि विपक्ष के हाथ दो नए रंग लग गए- एपस्टीन फाइल्स और पूर्व आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की किताब। इनके सहारे सत्ता पक्ष का चेहरा बिगाड़ने की मुहिम जोरों पर है। इस बीच पार्टियों के आईटी सेल एआई के जरिए जादूगरी में जुटे हुए हैं। माउस पर क्लिक करके विपक्षी नेता का चेहरा एपस्टीन के साथ लगा दिया जाता है। जवाब में एआई के जरिए सत्ता पक्ष के नेताओं के फोटो भी एपस्टीन के साथ तैयार करके वायरल कर दिए जाते हैं। वाट्सएप ग्रुप में नरवणे की किताब के कट-पेस्ट अंश घूमते नजर आ रहे हैं। ट्रोल आर्मी सक्रिय हो गई है। टीवी चैनलों पर घमासान जारी है। एंकर चीखते हैं, जानिए फाइल में क्या लिखा है? ऐसे मौकों पर पैनलिस्ट भी आपस में कीचड़ उछालते नजर आते हैं। एक कहता है- फाइल में तुम्हारे नेता का नाम आया है, दूसरा कहता है- तुम्हारी फाइल ही झूठी है। एक कहता है- नरवणे की किताब पर जवाब दो, दूसरा कहता है- तुम्हारी किताब फोटोशॉप का कमाल है। बहस के बीच फंसा बेचारा दर्शक तय ही नहीं कर पाता कि असली रंग कौन सा है और नकली रंग कौनसा। राजनीति में नकली रंगों का बाजार इतना गर्म है कि कई बार असली रंग नकली नजर आते हैं। दिलचस्प बात यह है कि नकली रंग असली रंग से ज्यादा घातक साबित हो रहे हैं। असली रंग का प्रभाव भले ही खत्म हो जाए, लेकिन नकली रंग से चेहरा ऐसा बिगड़ता है कि साफ करते—करते जिंदगी निकल जाती है। यहां यह बात एकदम फिट बैठती है कि जब तक “सत्य” घर से बाहर निकलता है, तब तक “झूठ” आधी दुनिया घूम लेता है। सोशल मीडिया ने राजनीति की इस होली को वर्चुअल कीचड़ महासंग्राम में भी बदल दिया है। राजनीति के आईटी सेल वाले रंगों के जादूगर बन बैठे हैं। ट्रोल आर्मी की होली विकराल रूप लेती जा रही है।
मजबूत हो रही चेहरा काला करने की परंपरा
परंपराओं के प्रति अगाध श्रद्धा रखने वाले वर्ग के लिए यह वाकई गर्व की बात है कि देश की राजनीति में प्रतिद्वंद्वी का चेहरा काला करने की परंपरा लगातार मजबूत हो रही है। अब तो सीबीआई, ईडी, आईटी जैसे विभागों के जरिए ऐसा रंग लगाया जाता है कि विपक्षी नेता चौकड़ी भूल जाते हैं। गेहूं के साथ घुन भी पिसता है। इसी तरह नेताओं के चक्कर में दूसरे लोग भी इसकी चपेट में आ जाते हैं और अपना बदसूरत चेहरा छिपाए घूमते रहते हैं। जादूगरी यह है कि बेनूर हुए नेता जब सत्ता से जुड़ते हैं, तो उनके चेहरे फिर से चमकने लगते हैं। असल में पार्टी बदलने पर चेहरा उजला करने की कला ने नया रूप ले लिया है। ऐसी वाशिंग मशीन ईजाद कर ली गई है कि दागदार नेता मिनटों में बेदाग हो जाते हैं। कल के घोटालेबाज सत्ता की गोद में बैठकर पवन—पावन मान लिए जाते हैं। विपक्ष चिल्लाता है- वाशिंग मशीन चल रही है। सत्ता से जुड़े नेता ठहाका लगाते हैं, यह सब देशहित में हो रहा है। दलबदलू नेताओं के लिए पुराने भाषण जरूर मुसीबत बन जाते हैं, लेकिन वे पहुंचे हुए महात्मा की तरह कभी विचलित नहीं होते। कल तक जिस दल पर कीचड़ उछाल रहे थे, आज वे ही उस दल में आकर अपना अहो भाग्य मान रहे हैं। वे अब बेशर्मी से कह रहे हैं- पहले भ्रम में था, अब आंखें खुल गई हैं। राजनीति में तरक्की का रास्ता यही है। यानी दिल खोल कर काला रंग या कीचड़ उछालना सीखो। जरूरत पड़े तो जिस पर कीचड़ उछाला है, उसे साफ करने से भी मत झिझको। वैसे भी राजनीति में सफल नेता वही माना जाता है जो सिद्धांत बदलने में माहिर हो। ये दलबदलू चेहरे मौका पड़ने पर अपने पुराने साथियों पर ऐसा रंग लगाते हैं कि लोग दंग रह जाते हैं। सदनों में भी आजकल लठमार होली को मात देता हुड़दंग नजर आता है। हाल ही ऐसा हुआ कि हुड़दंगियों के डर से प्रधानजी सदन में ही नहीं गए। होली पर डर के मारे हम भी घर पर ही दुबके रहते हैं, लेकिन समस्या यह है कि राजनीति में 365 दिन चलने वाली होली के दौरान कोई कब तक छिपकर बैठ सकता है।
प्रतिभाओं के लिए अवसर
चुनावी मौसम में यह हुड़दंग चरम पर होता है। विपक्ष घोटालों के वीडियो उछालता है। नेता बेशर्म मुस्कान बिखेरते हुए कहते हैं- फंसाया गया था, अब सच्चाई सामने आ गई। रैलियों में खूब कीचड़ उछलता है। विपक्ष चीखता है- देश को बेच दिया, सत्ता से जुड़े नेता कहते हैं- देशद्रोहियों से सावधान रहो। जो सबसे ज्यादा कीचड़ उछालता है, उसे चुनाव में आगे माना जाता है। इसलिए आजकल कीचड़ उछालने के लिए करोड़ों रुपए खर्च करके एजेंसियों की मदद भी ली जाती है। ये एजेसियां बाकायदा रिसर्च करके प्रतिद्वंद्वियों का चेहरा बिगाड़ने के लिए कई तरह के कीचड़ तैयार करती हैं। कीचड़ से चांदी कूटने की यह कला प्रतिभाओं को खूब आकर्षित कर रही है। देश के लिए यह वाकई गर्व की बात है कि अब तो आईआईटी से निकले युवा भी कीचड़ तैयार करने के इस महान काम में लगे हुए हैं और अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं।
राजनीति की होली के आगे असली होली का रोमांच फीका पड़ रहा है। इसके बावजूद परंपरागत होली के हुड़दंगियों को निराश नहीं होना चाहिए, उनके लिए राजनीति में असीमित अवसर बन रहे हैं। ऐसी प्रतिभा के धनी लोगों को एक बार राजनीति में अपना भाग्य जरूर आजमाना चाहिए। उनके लिए हर दल के द्वार खुले हुए हैं। संकोच छोड़िए और राजनीति के हुड़दंग में अपनी प्रतिभा का कमाल दिखाइए।






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