लोकमत ही सर्वोच्च
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर पर देशभर में विवाद गहराता जा रहा है। विपक्ष, सामाजिक कार्यकर्ता और सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। क्या लोकतंत्र की जड़ें कमजोर...

एसआईआर प्रक्रिया पर उठते सवाल और लोकतंत्र की चिंता
इसमें दो राय नहीं कि समय के साथ मतदाता पहचान पत्र (वोटर लिस्ट) में गड़बड़ियां हो जाती हैं। इसके वाजिब कारण भी होते हैं। किसी व्यक्ति का नाम दो जगहों की मतदाता सूची में दर्ज हो जाता है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के वर्षों बाद भी मतदाता सूची में नाम बना रहता है। कई बार तो विदेश की नागरिकता ले लेने के बावजूद व्यक्ति का नाम उसके गांव की मतदाता सूची में दर्ज रह जाता है। इसलिए 1952 से सरकारों ने एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (विशेष गहन पुनरीक्षण) की प्रक्रिया शुरू की थी। इसका उद्देश्य मतदाता सूची से मृत व्यक्तियों, दो जगह मतदाता सूची में दर्ज मतदाताओं का नाम एक जगह से हटाने यानी मतदाता सूचियों का शुद्धिकरण करना था। कुछ वर्षों तक तो हर चुनाव के पहले एसआईआर किया जाता था लेकिन बीच में कई वर्षों तक नहीं भी किया गया। ऐसा अपने देश में चुनावी प्रक्रिया लगातार जारी रहने के कारण किया गया।
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भारत एक विशाल लोकतांत्रिक देश है। यहां एक साल में कई राज्यों में चुनाव होते रहते हैं, जबकि चुनाव कार्य में लगे कर्मचारियों की संख्या सीमित है। यह सही है कि साल 2003-2004 के बाद एसआईआर का काम बंद रहा। लेकिन पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव से पहले जब चुनाव आयोग ने राज्य में एसआईआर कराया तो करीब 69 लाख मतदाताओं की संख्या घट गई। इससे उत्साहित चुनाव आयोग ने देश के 12 राज्यों उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छतीसगढ़, गुजरात, गोवा, तमिलनाडु, पुड्डुचेरी, केरल, लक्षद्वीप और अंडमान निकोबार में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए मतदाताओं से जरूरी कागजात मांगे जा रहे हैं।
एसआईआर के तहत जरूरी कागजात
चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनाव से पहले एसआईआर के लिए कुल 11 दस्तावेज वैध माने थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद आधार कार्ड को भी उसमें जोड़ दिया है। ईसी के आदेश में जिन दस्तावेजों को जरूरी माना गया है, वे हैं –
- सरकारी कर्मचारी के मामले में पहचान पत्र या पेंशन के दस्तावेज
- सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी जन्म प्रमाण-पत्र
- किसी सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के संगठन द्वारा जारी पहचान-पत्र जो 1989 से पहले जारी किया गया हो
- स्कूल से जारी 11वीं का प्रमाण-पत्र, विश्वविद्यालय अथवा शैक्षणिक संस्थान से जारी प्रमाण-पत्र
- स्थायी निवास प्रमाण-पत्र
- पासपोर्ट
- एससी, एसटी और ओबीसी के मतदाताओं के लिए जाति प्रमाण-पत्र
- वन अधिकार प्रमाण-पत्र
- सरकार द्वारा आवंटित भूमि अथवा भवन का आवंटन प्रमाण-पत्र
- राज्य सरकार अथवा स्थानीय सरकारी निकाय द्वारा जारी परिवार रजिस्टर
- राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (जहां लागू हो) और
- आधार कार्ड चुनाव आयोग का कहना है कि इनमें से कोई दस्तावेज होने पर और मतदाता की आयु एक जनवरी 2026 तक 18 वर्ष होने पर मतदाता सूची में जोड़ा जाएगा। यही नहीं जिस मतदाता का नाम 2003 की मतदाता सूची में दर्ज होगा, उसे कोई अतिरिक्त कागज नहीं देना होगा। आयोग ने यह भी कहा है कि पिछले एसआईआर के बाद अगर किसी मतदाता ने अपने नाम में बदलाव किया है तो उसे उसका प्रमाण-पत्र देना अनिवार्य होगा। चुनाव आयोग ने एसआईआर वाले राज्यों के बूथ लेवल अफसर (बीएलओ) को प्रत्येक मतदाताओं के पास कम से कम तीन बार जाने का निर्देश दिया है। साथ ही यह भी सुविधा दी है कि मतदाता चाहें तो ऑनलाइन भी एसआईआर फॉर्म भर कर जमा करा सकते हैं।
… तो फिर विवाद किस बात का
हालांकि, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की इस कवायद को केवल संदेह की दृष्टि से देखना भी उचित नहीं होगा। राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनावी शुचिता के लिहाज से यह प्रक्रिया अपरिहार्य है। लोकतंत्र में ‘एक नागरिक, एक मत’ का सिद्धांत तभी सार्थक है जब मतदाता सूची पूरी तरह पारदर्शी और त्रुटिहीन हो। पिछले दशकों में वोट बैंक की राजनीति के चलते जिस तरह से बेनामी मतदाताओं और अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों के नाम मतदाता सूची में शामिल होने के आरोप लगते रहे हैं, उनका निराकरण करना किसी भी सजग सरकार और संवैधानिक संस्था की प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि पिछली सरकारों की कार्यशैली या उदासीनता के कारण मतदाता सूची में कृत्रिम विस्तार हुआ था, तो वर्तमान में डिजिटल सत्यापन और गहन पुनरीक्षण के जरिए उसे दुरुस्त करना राष्ट्रहित में उठाया गया एक कड़ा लेकिन जरूरी कदम माना जा सकता है। शुद्ध मतदाता सूची न केवल फर्जी मतदान को रोकती है, बल्कि देश के संसाधनों पर वास्तविक नागरिकों के हक को भी सुरक्षित करती है।
लेकिन, गंभीर प्रश्न तब खड़े होते हैं जब इस आवश्यक प्रक्रिया को लागू करने में भारी विसंगतियां और जल्दबाजी दिखाई देती है। चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एसआईआर कराया था, उसमें कई गड़बड़ियां देखने को मिली थीं। बिहार में जिस समय एसआईआर कराया जा रहा था, उस समय आधे से ज्यादा बिहार बाढ़ से बेहाल था। बीएलओ मतदाताओं तक नहीं पहुंच पाए थे। इससे करीब 69 लाख मतदाताओं का नाम कट गया था। कई जगहों से वर्षों पूर्व मृत लोगों के नाम भी मतदाता सूची में दर्ज थे, उन्हें हटाया नहीं जा सका है। बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की छप्परफाड़ जीत में अन्य कारणों के अलावा एसआईआर को भी बड़ी वजह माना जा रहा है। अब 12 राज्यों में हो रहे एसआईआर में भी वही जल्दबाजी दिखाई जा रही है। आयोग की मसौदा (प्रारंभिक) सूची में करीब 6.50 करोड़ मतदाताओं का नाम नहीं है। यही नहीं, काम के दबाव में 77 से अधिक बीएलओ ने आत्महत्या कर ली है। कई बीमार हैं तो कइयों की शादी टूट गई।
चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल
पिछले दिनों पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग की कार्यशैली को लेकर बवाल हो गया। दरअसल, उत्तर दिनाजपुर जिले के चाकुलिया थाना क्षेत्र के मतदाता एसआईआर के तहत सुनवाई नोटिस मिलने के बाद भड़क गए। उन्होंने सड़क जाम कर प्रदर्शन किया और फिर बीडीओ कार्यालय पर धावा बोल दिया। उनका कहना था कि उन्हें पहले 2003 के वोटर लिस्ट के आधार पर दस्तावेज देने को कहा गया था। उन्होंने दस्तावेज जमा करा दिए तो अब उनको सुनवाई के लिए नोटिस क्यों जारी किया जा रहा है? कई लोग शिक्षित नहीं हैं, उनके पास स्कूल के प्रमाण-पत्र नहीं हैं। वह कहां से दस्तावेज लाएंगे? कई युवा मैट्रिक की परीक्षा दे रहे हैं। उनके पास दस्तावेज के नाम पर परीक्षा का एडमिट कार्ड है, जिसे आयोग नहीं मान रहा है। कई बुजुर्ग ब्लॉक मुख्यालय तक आने में असमर्थ हैं। वे पहले से मतदाता रहे हैं। उन्हें सुनवाई के लिए क्यों बुलाया जा रहा है? मतदाताओं को जान-बूझकर परेशान किया जा रहा है। एसआईआर के कामों में सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही बवाल नहीं है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, केरल सहित लगभग सभी राज्यों में गड़बड़ियों की शिकायतें लगातार मिल रही हैं। मृतकों के नाम भी मतदाता सूची में यथावत मिल रहे हैं। एक समुदाय विशेष के लोगों के नाम कटने की शिकायत सबसे ज्यादा हैं। चुनाव आयोग इसका समुचित जवाब नहीं दे पा रहा है।
अमर्त्य सेन और पूर्व नौसेना प्रमुख को नोटिस
चुनाव आयोग ने प्रख्यात अर्थशास्त्री नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन और पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है। इसको लेकर आयोग की आलोचना भी हो रही है। अमर्त्य सेन को नोटिस जारी कर आयोग ने पूछा है कि गणना प्रपत्र में सेन और उनकी माताजी की आयु का अंतर 15 वर्ष से कम क्यों है? अमर्त्य सेन की आयु 92 वर्ष से अधिक है। अब चुनाव आयोग को कौन बताए कि सौ साल पहले अपने देश में बाल विवाह का चलन था। तब विवाह के लिए न्यूनतम आयु की प्रतिबद्धता नहीं थी। फिर भला कोई पुत्र कैसे बता सकता है कि उसकी माता ने कम उम्र में उसे पैदा क्यों और कैसे किया? सेन की माता का काफी पहले निधन हो चुका है। सेन अभी विदेश में हैं। जाहिर तौर पर वह आयोग के बुलावे पर तय समय पर नहीं आ पाएंगे। तो क्या अमर्त्य सेन का नाम मतदाता सूची से काट दिया जाएगा? अमर्त्य सेन के रिश्तेदार शांतभानु सेन ने चुनाव आयोग का नोटिस मिलने की पुष्टि की है। इसी तरह पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश को भी चुनाव आयोग ने नोटिस भेजकर कहा था कि उनके गणना प्रपत्र में पिछली एसआईआर से जुड़ी जरूरी जानकारियां मसलन, विधानसभा क्षेत्र का नाम और नंबर, भाग संख्या और मतदाता सूची में क्रम संख्या नहीं भरी गई हैं। जब इस पर बवाल मचा तो आयोग ने अपनी भूल सुधार ली। सवाल उठता है कि ये काम तो बीएलओ का है। जब सबकुछ मतदाता ही भरेगा तो बीएलओ क्या करेगा? 81 वर्षीय अरुण प्रकाश फिलहाल गोवा में रह रहे हैं और वहीं के मतदाता हैं। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भूमिका के लिए वह वीर चक्र से सम्मानित हैं। ये तो कुछ बड़े नाम थे जिसकी चर्चा मीडिया में होने के बाद चुनाव अधिकारी हरकत में आए। लेकिन मसौदा (प्रारंभिक) मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर (लगभग 6.50 करोड़) हटाए गए लोगों की फरियाद कौन सुनेगा?
विपक्ष का विरोध और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
विपक्ष पहले दिन से ही चुनाव आयोग पर वोट चोरी का आरोप लगाता रहा है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी तो कई बार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुनाव आयोग को घेर चुके हैं। उनके मुताबिक महाराष्ट्र, हरियाणा और कर्नाटक में वोट चोरी पकड़े जाने के बाद चुनाव आयोग अब एसआईआर के बहाने वोट चोरी का नया रास्ता निकाल रहा है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले आम आदमी पार्टी और बिहार विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन के नेताओं ने भी कुछ इसी तरह के आरोप लगाए थे। अब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, पूर्व मुख्यमंत्री मायावती, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत गैर एनडीए दलों के कई नेता चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि बिहार से हटाए गए 69 लाख और चुनाव आयोग की मसौदा सूची के करीब साढ़े 6 करोड़ मतदाता आखिर कहां चले गए? बिहार के रोहतास जिले के सामाजिक कार्यकर्ता सूर्यकेश्वर सिंह आशंका जाहिर करते हुए कहते हैं कि कहीं हटाए गए मतदाता कोरोना काल के मृतक तो नहीं हैं? हालांकि सूर्यकेश्वर सिंह की बातों का कोई ठोस आधार नहीं है। ख़ास बात यह कि चुनाव आयोग भले ही विपक्ष के आरोपों पर खामोश रहता है, भाजपा के प्रवक्ता जरूर चुनाव आयोग के बचाव में दलीलें देने लगते हैं। इससे वोट चोरी का शक और बढ़ जाता है। विपक्ष के कई नेता और सामाजिक कार्यकर्ता चुनाव आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट भी गए हैं और सुप्रीम कोर्ट उसका संज्ञान ले रहा है। यहां तक की चुनाव आयोग की शक्तियों और रिटायरमेंट के बाद चुनाव आयुक्तों को उनके कार्यकाल के फैसलों पर अदालती सुनवाई न करने के सरकार के फैसले का भी सुप्रीम कोर्ट विश्लेषण कर रहा है। इस बीच, केरल में चुनाव आयोग की मसौदा सूची से हटाए गए 24 लाख मतदाताओं के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आयोग से मतदाताओं का नाम सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है, ताकि हटाए गए मतदाता आपत्ति दर्ज करा सकें। अदालत ने आपत्ति दर्ज करने की समय सीमा दो सप्ताह बढ़ाने का भी निर्देश दिया है।
चुनाव आयोग की सफाई
पिछले दिनों एसआईआर पर सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसका अधिकार क्षेत्र केवल मतदाता सूची में पंजीकरण के लिए नागरिकता तय करने तक सीमित है। आयोग न तो किसी व्यक्ति को देश से बाहर निकाल सकता है और न ही यह तय कर सकता है कि किसी के पास भारत में रहने के लिए वैध वीजा है या नहीं। आयोग मतदाता सूची एवं चुनाव से संबंधित मामलों में मूल प्राधिकारी के रूप में काम करता है। अगर कोई व्यक्ति किसी अन्य देश की नागरिकता हासिल करता है, तो इस संबंध में आयोग की राय राष्ट्रपति पर भी बाध्यकारी होती है। यह सुनवाई बिहार सहित 13 राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर हो रही है, जिनमें चुनाव आयोग की शक्तियों, नागरिकता और मतदान से जुड़े सवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं।
बहरहाल, चुनाव आयोग एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है और इसकी साख ही लोकतंत्र का आधार है। यह चिंताजनक है कि वर्तमान में इसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। किसी भी लोकतंत्र के लिए संस्थाओं के प्रति जन-विश्वास अनिवार्य है। प्रक्रियागत जटिलताओं के कारण उपजा यह संदेह कि ‘मतदाता की पात्रता का निर्धारण कितना पारदर्शी है’, देशहित में नहीं कहा जा सकता। समय की मांग है कि आयोग तकनीक और मानवीय संवेदनशीलता के बीच बेहतर तालमेल बिठाकर अपनी पारदर्शिता को पुनः सिद्ध करे, ताकि निष्पक्षता केवल हो ही नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से दिखाई भी दे।






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