तड़पता अंतिम पड़ाव
भारत में पैलिएटिव केयर को लेकर नीतिगत ढांचा तो वर्षों से मौजूद है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसकी स्थिति बेहद चिंताजनक है। असाध्य रोगों से जूझ रहे लाखों मरीज आज भी दर्द, उपेक्षा और असहायता के बीच जीवन के...

पैलिएटिव केयर – नीतियां बनीं, संवेदनाएं नहीं
भारत में पैसिव यूथेनेशिया को मान्यता देने वाले सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने सरकार और समाज का ध्यान पैलिएटिव केयर की तरफ भी आकर्षित किया है। यह हकीकत है कि भारत में पैलिएटिव केयर की स्थिति काफी खराब है। 2012 का राष्ट्रीय पैलिएटिव केयर कार्यक्रम, 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति और 2014 का एनडीपीएस संशोधन जैसे नीतिगत ब्लूप्रिंट तैयार हैं, लेकिन उन पर ठीक तरह से अमल नहीं होने से लाखों लोग पीड़ा भुगत रहे हैं।
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क्या है पैलिएटिव केयर
पैलिएटिव केयर वह विशेषज्ञ चिकित्सा सेवा है जो असाध्य रोगों से ग्रस्त मरीजों या मृत्यु के निकट पहुंच चुके लोगों के लिए उपलब्ध कराई जाती है। इसका मूल लक्ष्य मरीज को शारीरिक पीड़ा से राहत देना व शेष जीवन को बेहतर बनाना है। साथ ही मरीज और परिवार को भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक समर्थन दिया जाता है। यह रोगी के उपचार के लिए की जाने वाली चिकित्सा का विकल्प नहीं है, बल्कि उसकी पूरक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे स्वास्थ्य प्रणाली का अनिवार्य हिस्सा मानता है। इसके तहत दर्द, सांस लेने में तकलीफ, थकान और कब्ज जैसी शारीरिक समस्याओं का वैज्ञानिक प्रबंधन किया जाता है। साथ ही काउंसलिंग के जरिए अवसाद, चिंता और मृत्यु के भय जैसे मनोवैज्ञानिक भावों को दूर करने की कोशिश होती है। परिवार को आर्थिक मदद, कानूनी सलाह और सामाजिक सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है। आध्यात्मिक स्तर पर धर्म, ध्यान और प्रार्थना के माध्यम से शांति प्रदान की जाती है। अंततः एंड ऑफ लाइफ केयर के जरिए मरीज को गरिमापूर्ण और दर्दरहित विदाई सुनिश्चित की जाती है।
भारत और विकसित देशों की तुलना
भारत और विकसित देशों के बीच पैलिएटिव केयर की स्थिति में बहुत अंतर है। एम्स दिल्ली की 2025 की एक स्टडी के अनुसार, देश में गंभीर रोगों से ग्रस्त अधिकांश मरीजों को पैलिएटिव केयर नहीं मिल पाती। हालत यह है कि बहुत ही कम कैंसर के मरीजों को यह सुविधा मिल पाती है। भारत में ऐसे मरीजों की 80 प्रतिशत देखभाल घर पर होती है, लेकिन प्रशिक्षण और अपर्याप्त संसाधनों के कारण मरीज की पीड़ा कम नहीं होती। भारत में बीमा कवरेज न के बराबर है, जबकि अमेरिका में मेडिकेयर के तहत व्यापक कवरेज उपलब्ध है। कोविड महामारी ने भी भारत में पैलिएटिव केयर की दयनीय स्थिति को उजागर किया था।
इसके विपरीत, विकसित देशों में पैलिएटिव केयर का मजबूत ढांचा है। अमेरिका में हॉस्पिस मूवमेंट के तहत 5000 से अधिक हॉस्पिस केंद्र हैं, जो प्रतिवर्ष 15 लाख मरीजों को सेवा देते हैं। ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) के तहत जरूरतमंद मरीजों को व्यापक रूप से निःशुल्क सेवाएं उपलब्ध होती हैं। यह सेवा घर, अस्पताल या हॉस्पिस में उपलब्ध हो सकती है। नीदरलैंड्स में बड़ी संख्या में मरीज घर पर ही 24/7 नर्सिंग के साथ शांतिपूर्ण अंत तक पहुंचते हैं। इन देशों में बीमा कवरेज 90 प्रतिशत से अधिक है और दर्द निवारक दवाओं की पूर्ण उपलब्धता सुनिश्चित है।
उपयोगी है केरल मॉडल
पैलिएटिव केयर को लेकर केरल की जागरूकता दूसरे राज्यों के लिए भी प्रेरणादायक हो सकती है। 2008 में राज्य ने पैलिएटिव केयर नीति बनाई। नेबरहुड नेटवर्क इन पैलिएटिव केयर (एनएनपीसी) ने समुदाय को साथ लिया। मलप्पुरम जिले में एक छोटी शुरुआत से यह मॉडल 300 से अधिक यूनिटों, 900 पंचायतों और 60,000 सक्रिय वॉलंटियर्स तक फैल गया। त्रि-स्तरीय संरचना इसका आधार है- प्राथमिक स्तर पर घरेलू विजिट, दूसरे स्तर पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में दर्द प्रबंधन और तीसरे स्तर पर मेडिकल कॉलेजों में विशेषज्ञ परामर्श। नतीजतन कैंसर रोगियों में 80 प्रतिशत दर्द नियंत्रित है, अस्पतालों में भर्ती के मामले 50 प्रतिशत घटे हैं और परिवारों का आर्थिक भार कम हुआ है।
विकसित राष्ट्र का सपना
भारत में पैलिएटिव केयर तक पहुंच में सुधार के लिए राष्ट्रीय पैलिएटिव केयर कार्यक्रम (एनपीपीसी) और राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के दिशानिर्देशों के अलावा केरल जैसे राज्य के उदाहरण मौजूद हैं। इनका व्यावहारिक और अनुशासित क्रियान्वयन हो तो हालात सुधर सकते हैं। इसके लिए घर-आधारित और सामुदायिक सेवाओं के लिए धन और कर्मचारियों की भर्ती पर खास ध्यान देना होगा। भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का ढोल पीटने वालों को यह तो सुनिश्चित करना ही होगा कि जरूरत पड़ने पर हर भारतीय को गुणवत्तापूर्ण पैलिएटिव केयर मिल जाए।
डॉक्टर, नर्स, वॉलंटियर्स और केयरगिवर्स की भूमिका
पैलिएटिव केयर एक ऐसा क्षेत्र है, जहां चिकित्सकीय ज्ञान के साथ मानवीय गुणों की आवश्यकता ज्यादा पड़ती है। यहां डॉक्टर, नर्स, वॉलंटियर्स और केयरगिवर्स को मरीज की शारीरिक पीड़ा के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आध्यात्मिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। टीम के हर सदस्य को मरीज और उसके परिवार का सच्चा साथी बनना पड़ता है। डॉक्टर को दर्द विशेषज्ञ से बढ़कर सहानुभूति से भरा निडर व्यक्ति बनना चाहिए। वह मरीजों से संवाद बनाने में कुशल होना चाहिए, ताकि वह मृत्यु की कठोर सच्चाई को सरल, सांत्वनापूर्ण भाषा में कह सके। नर्सिंग स्टाफ इस क्षेत्र का मुख्य स्तंभ है, जो चौबीस घंटे मरीज के सबसे करीब रहता है। सहानुभूति का गुण वैसे तो इस कार्य से जुड़े सभी लोगों में होना आवश्यक है, लेकिन वॉलंटियर्स के लिए यह सबसे जरूरी है। मुख्यतः परिवार के सदस्य केयरगिवर्स के रूप में घरेलू पैलिएटिव केयर के आधार होते हैं। इस टीम के हर सदस्य को आवश्यक प्रशिक्षण जरूर लेना चाहिए। मरीज की तकलीफ दूर करने की हर संभव कोशिश होनी चाहिए, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में खुद की सेहत का भी ध्यान रखना आवश्यक है।
घातक हो सकती है लापरवाही
पैलिएटिव केयर के दौरान लापरवाही असाध्य रोगियों के लिए घातक साबित होती है, क्योंकि यह न केवल उनकी शारीरिक पीड़ा को बढ़ा देती है बल्कि परिवारों को भावनात्मक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक रूप से पूरी तरह तोड़ देती है। भारत में बहुत सीमित आबादी को ही यह सेवा मिल पाती है। जहां यह उपलब्ध है, वहां मानवीय चूक, प्रशासनिक कमी और तकनीकी लापरवाही इतनी आम है कि कई बार मरीज का अंतिम समय कष्टमय बन जाता है।
सबसे प्रमुख लापरवाही ओपिओइड दवाओं की अनियमित उपलब्धता और गलत निर्धारण है। मोर्फिन या फेंटेनिल जैसे दर्द निवारक कैंसर या न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों के अंतिम चरण में जीवनदायिनी साबित होते हैं, लेकिन डॉक्टरों में व्याप्त भय, नशे का सामाजिक मिथक, कानूनी जटिलताओं की वजह से इनके इस्तेमाल में झिझक रहती है। इनकी उपलब्धता भी अनिश्चित रहती है। एक अध्ययन से पता चलता है कि 70 प्रतिशत मरीजों को पर्याप्त दर्द राहत नहीं मिलती।
प्रशिक्षण की कमी पैलिएटिव केयर की दूसरी बड़ी कमजोरी है। सामान्य चिकित्सकों और नर्सों को दर्द मूल्यांकन, परिवार काउंसलिंग या मरीज की मृत्यु की मनोवैज्ञानिक तैयारी जैसे विशेष कौशल की जरूरत होती है, लेकिन सरकारी अस्पतालों में यह प्रशिक्षण लगभग नगण्य है। कई बार पैलिएटिव क्लिनिक में फंड की कमी के चलते भी मरीजों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। भोजन और पोषण की पूरी उपेक्षा भी घातक साबित होती है। अंतिम चरण के मरीज तरल आहार या नासोगैस्ट्रिक (एनजी) ट्यूब पर निर्भर होते हैं, लेकिन अधिकांश अस्पतालों में डाइटिशियन की कमी है। कई जगहों पर प्रोटीन सप्लीमेंट या इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक की व्यवस्था नहीं होती, जिससे डिहाइड्रेशन बढ़ जाता है।
परिवार को पर्याप्त मार्गदर्शन न मिलना भी बड़ी समस्या है। देखभालकर्ता दवा शेड्यूल, मोर्फिन के साइड इफेक्ट्स का प्रबंधन या घरेलू देखभाल की बारीकियां नहीं जानते। उनको अस्पताल से डिस्चार्ज के समय लिखित निर्देश या होम केयर किट भी नहीं दी जाती। इसलिए वे मरीज को ठीक तरह से नहीं संभाल पाते और मरीज पीड़ा झेलते हुए ही संसार से विदा हो जाता है।
संक्रमण नियंत्रण में ढिलाई अंतिम दिनों को असहनीय बनाती है। बेडरिडन मरीजों में प्रेशर अल्सर, यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन या निमोनिया का खतरा हमेशा रहता है। स्टराइल तकनीकों का पालन न होने से इंट्रावेनस लाइन (IV) या कैथेटर से संक्रमण फैल जाता है। कई मामलों में बेडशीट्स समय पर न बदलने से स्किन इंफेक्शन हो जाता है। निजी क्षेत्र में पैलिएटिव केयर के नाम पर भारी बिल बनाने के मामले भी सामने आए हैं। पैलिएटिव केयर में लापरवाही मरीज की गरिमा का हनन करती है। इसके लिए सरकार, अस्पताल और एनजीओ सभी जिम्मेदार हैं। इसलिए प्रशिक्षण पर ध्यान दिया जाए, आवश्यक स्टाफ बढ़ाया जाए, परिवार की भी समझाइश करने पर ध्यान दिया जाए और आवश्यक दर्द निवारक दवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
जरूरी है मिशनरी भावना
पैलिएटिव केयर से जुड़ी टीम में मिशनरी भावना का सबसे ज्यादा महत्व है। धार्मिक संदर्भ से इतर, मिशनरी भावना को किसी भी नेक काम के प्रति समर्पण के रूप में भी देखा जाता है। पैलिएटिव केयर में मिशनरी भावना वह आंतरिक प्रेरणा है जो डॉक्टरों, नर्सों, वॉलंटियर्स और केयरगिवर्स को करुणा, निस्वार्थ सेवा और आध्यात्मिक समर्पण की ओर ले जाती है। यहां लक्ष्य मरीज का दर्द दूर करना होता है। यह भावना व्यावसायिक नहीं, आध्यात्मिक है। मिशनरी भावना हो तो किसी भी कार्य में संसाधनों की कमी भी आड़े नहीं आती। पैलिएटिव केयर से जुड़कर कोई भी व्यक्ति अपने धर्म के मूल संदेश को आगे बढ़ा सकता है।






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