सिलेंडर की दौड़ और जुगाड़ का दौर
हालत यह है कि गैस की कमी से ज्यादा उसकी चर्चा का धुआं उठ रहा है। जिसने सिलेंडर पा लिया वह संतुष्ट है, जिसने नहीं पाया वह बाजार में नया जुगाड़ ढूंढ रहा है। कुल मिलाकर संकट से ज्यादा घबराहट काम कर रही...

बात बेलगाम
राजस्थान में गैस की किल्लत ने ऐसा माहौल बना दिया है कि चूल्हे से ज्यादा दिमाग जल रहे हैं। खबर फैलते ही लोगों ने सिलेंडर ऐसे बुक करने शुरू किए जैसे कल से दुनिया बिना गैस के चलने वाली हो। नतीजा यह रहा कि जरूरत से ज्यादा खरीद की होड़ लग गई। बाजार ने भी मौके को भांप लिया। इलेक्ट्रिक कुकर, हीटर, इंडक्शन चूल्हे और तरह-तरह के वैकल्पिक उपकरण धड़ल्ले से बिकने लगे। दुकानदार मुस्कुरा रहे हैं और ग्राहक यह सोचकर खरीद रहे हैं कि क्या पता आगे क्या हो जाए। हालत यह है कि गैस की कमी से ज्यादा उसकी चर्चा का धुआं उठ रहा है। जिसने सिलेंडर पा लिया वह संतुष्ट है, जिसने नहीं पाया वह बाजार में नया जुगाड़ ढूंढ रहा है। कुल मिलाकर संकट से ज्यादा घबराहट काम कर रही है और बाजार उसी घबराहट पर सबसे ज्यादा गर्म है।
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उड़ान में कचौरी
कोटा में एयरपोर्ट बनने की खबर आई तो शहर के कुछ लोगों ने विकास की बात सोची, पर असली मुस्कान तो कचौरी वालों के चेहरे पर आई। अब तक कोटा की कचौरी बस बसों और ट्रेनों में सफर करती थी, पर अब लगता है उसका भी बोर्डिंग पास बनने वाला है। कल्पना कीजिए, दिल्ली में किसी साहब को अचानक कोटा की कचौरी की तलब लगी। मोबाइल घुमाया, ऑर्डर दिया, और दो घंटे बाद फ्लाइट से गरमागरम कचौरी हाजिर! एयर होस्टेस भी शायद पूछ बैठे सर, चाय के साथ कचौरी लेंगे या सिर्फ समोसा? कहते हैं हर शहर की पहचान उसके स्वाद से होती है। जोधपुर का मिर्ची बड़ा, अजमेर की कढ़ी कचौरी और कोटा की कचौरी। इनका भी अब हवाई सफर तय लगता है। वैसे एयरपोर्ट का फायदा यात्रियों को कितना होगा, यह बाद की बात है; पर इतना तय है कि अगर उड़ानें ठीक रहीं तो देश के आसमान में जल्द ही कचौरी एक्सप्रेस भी उड़ती दिखाई दे सकती है।
प्रगति का प्रतिवेदन
राजस्थान के शिक्षा विभाग में इन दिनों एपीआर यानी वार्षिक प्रगति प्रतिवेदन या वार्षिक कार्य मूल्यांकन रिपोर्ट का खास जलवा है। शिक्षक हर साल नियम से यह रिपोर्ट जमा करते रहे, लेकिन विभाग को प्रगति का हिसाब तभी याद आया जब पदोन्नति की घड़ी नजदीक आई और वह भी एक साथ पूरे 11 साल का। बोर्ड परीक्षा में ड्यूटी निभा रहे राजस्थान के शिक्षक अब असमंजस में हैं कि पहले विद्यार्थियों की कॉपियां जांचें या अपने ही वार्षिक प्रगति प्रतिवेदन का इतिहास खंगालें। लगता है विभाग को पूरा भरोसा है कि हर शिक्षक के पास घर में एक छोटा-सा अभिलेखागार और साथ में कोई जादुई छड़ी भी होगी। विडंबना यह है कि जिन कार्यालयों में वार्षिक कार्य मूल्यांकन रिपोर्ट के लाल बस्ते सालों से धूल खाते पड़े हैं, वहीं से वही रिपोर्ट फिर से मांगी जा रही है। ऐसे में सवाल यह नहीं कि शिक्षकों की प्रगति क्या है, बल्कि यह है कि राजस्थान के शिक्षा विभाग की स्मृति और व्यवस्था की प्रगति आखिर किस दिशा में हो रही है।
सैंपल का साइड इफेक्ट
बारां में मिलावट की जांच करने पहुंचे एक फूड इंस्पेक्टर शायद यह भूल गए थे कि हमारे यहां कई बार सैंपल लेने से पहले सिस्टम का तापमान भी नाप लेना चाहिए। उन्होंने नियम के अनुसार पुड़ी सेंटर से नमूना लिया, लेकिन कुछ ही देर में उन्हें कार्यमुक्ति का पत्र थमा दिया गया। अब शहर में चर्चा यह नहीं है कि पुड़ी में मिलावट थी या नहीं, बल्कि यह है कि कार्रवाई में मिलावट कैसे हो गई। जनता सोच रही है कि अगर सैंपल लेने का यही परिणाम है, तो अगली बार अधिकारी शायद पुड़ी खाकर ही संतोष कर लें। उधर सफाई यह दी गई कि यह सब रूटीन प्रक्रिया है। हमारे यहां रूटीन भी बड़ा दिलचस्प होता है। कभी फाइल चलती है, कभी अधिकारी। खैर, मिलावट के खिलाफ लड़ाई जारी है। फर्क सिर्फ इतना है कि कभी नमूने लिए जाते हैं, और कभी नमूने बना दिए जाते हैं।
पाइप में गैस नहीं, फाइलों में हवा
बालोतरा में प्राकृतिक गैस की पाइप लाइनें बिछ चुकी हैं, लेकिन उनमें गैस नहीं, इंतज़ार बह रहा है। डेढ़ साल से पाइप जमीन में ऐसे पड़े हैं जैसे किसी ने भविष्य की रसोई के सपने दफना दिए हों। कुछ घरों में चूल्हा जल उठा है, पर जिला मुख्यालय की पाइपें अभी सरकारी फाइलों की आंच पर ही पक रही हैं। मामला बड़ा रोचक है। कंपनी कहती है कि एनओसी अटकी है, अधिकारी कहते हैं कि उन्हें जानकारी नहीं, और बैंक कहता है कि हमने तो मेल भेज दिया। यानी गैस की पाइप लाइन से ज्यादा लंबी संवाद की लाइन चल रही है। उधर पाइप धीरे-धीरे जंग खा रहे हैं, मानो पूछ रहे हों हमारे भीतर गैस कब आएगी या हम सिर्फ सरकारी योजनाओं की स्मारक बनकर रह जाएंगे? कहते हैं प्राकृतिक गैस स्वच्छ ईंधन है, पर यहां तो पूरी प्रक्रिया ही इतनी धुंधली है कि आम आदमी को सिर्फ धुआं ही नजर आ रहा है। फिलहाल बालोतरा में गैस नहीं, फाइलों की हवा ही चूल्हे तक पहुंच रही है।






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