राजसी होली का अनुशासित उल्लास
राजस्थान के राजमहलों में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं थी। यह अनुशासन और अपनत्व का अद्भुत संगम था। मेहरानगढ़ किला से सिटी पैलेस जयपुर और जूनागढ़ किला बीकानेर तक राजसी होली ने ठहाकों और परंपराओं के...

रंग जो मर्यादा में खिले और संबंधों को गहरा करें
राजस्थान की राजसी होली केवल गरिमा और विधि-विधान का आयोजन भर नहीं थी, बल्कि उसमें रंग, राग और मजाक-मसखरी का भी खुला अवकाश रहता था। दरबार की मर्यादा के भीतर हंसी की ऐसी फुहार उड़ती कि किले की दीवारें भी जैसे मुस्कुरा उठें। बुजुर्गों की जुबान पर आज भी एक कहावत सुनाई देती है- ‘होळी आवे, रंक-रावळा सब एक रंग पावे।’ यानी होली के दिन ऊंच-नीच की दूरी भी रंग में घुल जाती है।
Table Of Content
मेहरानगढ़: फाग, ठहाके और होली चौक
जोधपुर के मेहरानगढ़ किले में होली चौक का दृश्य कुछ ऐसा होता कि गंभीर से गंभीर दरबारी भी मुस्कान रोक न पाते। 15वीं सदी में राव जोधा द्वारा स्थापित इस गढ़ में होली राजकीय उपस्थिति के साथ मनाई जाती थी। किले के भीतर निर्धारित होली चौक में दरबार सजता, और रंगोत्सव विधिवत प्रारंभ होता। परंपरा रही कि फाग गायकों विशेषकर लंगा और मंगणियार समुदाय को उस दिन खुलकर हंसी-ठिठोली करने की छूट मिलती। वे तत्काल रचे गए दोहों में दरबारियों के नाम जोड़ देते। कभी किसी की लंबी मूंछ पर चुटकी, तो कभी किसी की नई पगड़ी पर व्यंग्य। कहा जाता है कि यदि किसी ने रंग से बचने की कोशिश की, तो चंग की थाप के साथ गायक गा उठते- ‘भागे रंग सूं जे, वो भागे भाग्य सूं भी।’ और फिर पूरा चौक ठहाकों से गूंज उठता।
मार्च 2026 का पूरा अंक देखें-
RT_March2026.pdf
जनाना महल के झरोखों से रानियां यह दृश्य निहारतीं। भीतर से स्त्रियों का फाग गूंजता शृंगार और हास्य का सम्मिश्रण। यह केवल मनोरंजन नहीं था, वरन यह अपनत्व का संकेत था। होली के दिन यदि किसी दरबारी को रंग न लगाया जाए, तो उसे उपेक्षा समझा जाता। इसलिए लोग स्वयं आगे बढ़कर कहते, ‘म्हांने भी रंग दो सा, आज तो होळी है!’
जयपुर: औपचारिकता में विनोद
सिटी पैलेस जयपुर में होली का स्वरूप औपचारिक था, पर उसमें भी विनोद का रंग कम न था। 18वीं सदी में महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा बसाए गए इस नगर में त्योहारों को राजकीय अनुशासन मिला। सिटी पैलेस के प्रांगण में होलिका-दहन के बाद रंगोत्सव होता।
दरबार में रंग-परिहास की एक रस्म निभाई जाती। प्रतीकात्मक रूप से महाराजा पर भी गुलाल लगाया जाता। यह संकेत था कि रंग सबको समान रूप से छूता है। लोक में कहा जाता- ‘पाग रहे ऊंची, पर रंग सबने छूंची।’
जयपुर की लघुचित्र शैली में हाथियों पर सवार राजपरिवार के दृश्य मिलते हैं, जहां पिचकारियों से रंग की धार बहती है। कवियों और चारणों को छूट रहती कि वे हल्की-फुल्की चुटकी लें। किसी मंत्री के देर से आने पर दोहा बन जाता, किसी की नई पोशाक पर व्यंग्य। यह परिहास अपमान नहीं, बल्कि दरबार की आत्मीयता का प्रमाण था।
बीकानेर: शौर्य और हास्य का संगम
बीकानेर के जूनागढ़ किले में होली की मसखरी कुछ अलग रंग लिए होती। 16वीं सदी में राजा राय सिंह द्वारा निर्मित इस किले के अनूप महल में रंगोत्सव के दौरान वीर-रस और हास्य-रस साथ-साथ खिलते। लोकगायक फाग में शौर्य के साथ चुटीली पंक्तियां जोड़ देते। किसी की नई तलवार पर, तो किसी की सजधज पर। ढप और चंग की थाप पर सैनिक भी मुस्कान छिपा न पाते। यहां कहावत प्रचलित रही- ‘बीकाणा री होळी, हंसी बिना अधूरी।’
मरुस्थल की पृष्ठभूमि में उड़ता केसरिया गुलाल, सजे-धजे हाथी और घोड़े। यह दृश्य केवल उत्सव नहीं, रियासत की जीवंतता का प्रमाण था।
रंग छुपाकर डालना: राजसी शरारत
राजसी होली में एक और रोचक परंपरा थी— रंग छुपाकर डालना। दरबारियों के बीच यह अनौपचारिक प्रतियोगिता रहती कि कौन पहले किसे रंग लगाए? कोई इत्र में भीगा गुलाल लेकर आता, तो कोई चांदी की पिचकारी में रंगीन जल। लेकिन सब कुछ मर्यादा की सीमा में। लोककंठ में गूंजता- ‘होळी रो रंग, मन रो संग।’ यानी रंग केवल देह पर नहीं, मन के संग लगे।
चित्रों में अमर शाही होली
रियासतकाल में होली के दृश्यों को लघुचित्रों में अत्यंत भव्यता से चित्रित किया गया। मेवाड़ और कोटा शैली के चित्रों में महाराणा हाथी पर सवार होकर रंग बरसाते दिखाई देते हैं। रनिवास की महिलाएं पीछे से पिचकारियां चलातीं। केसरिया और गुलाबी रंग की धाराएं चित्रों में स्थिर होकर भी गतिमान लगती हैं।
नाथद्वारा की पिछवाई चित्रशैली में श्रीनाथजी को राधा-कृष्ण के साथ फूलों की होली खेलते दर्शाया गया है। गुलाल के साथ पुष्पवृष्टि गुलाब, कचनार और केसर की पंखुड़ियां उत्सव को आध्यात्मिक आयाम देती हैं। मुगल लघुचित्रों में भी होली का उल्लेख मिलता है। अकबर और जहांगीर के रंग-अभिसार के दृश्य यह संकेत देते हैं कि रंग का उत्सव सांस्कृतिक समन्वय का भी प्रतीक रहा।
फाग: दरबार का लोकतंत्र
फाग गायकी में हास्य की विशेष भूमिका थी। गायक तत्काल रचे गए छंदों में दरबार के प्रसंग जोड़ देते। यह एक तरह का सांस्कृतिक लोकतंत्र था जहां राजा भी हंसी का पात्र बन सकता था। परिहास को अपमान नहीं, अपनत्व माना जाता। होली के दिन यदि किसी को रंग न लगाया जाए, तो उसे अलगाव समझा जाता। इसलिए लोग स्वयं आग्रह करते। यही कारण है कि राजसी होली में आनंद और अनुशासन का संतुलन बना रहता।
आज की स्मृति
स्वतंत्रता के बाद शाही व्यवस्थाएं बदलीं, पर इन किलों में आयोजित प्रतीकात्मक होली आज भी उसी स्मृति को संजोए है। पर्यटक जब मेहरानगढ़, जयपुर या बीकानेर के आंगनों में रंगोत्सव देखते हैं, तो उन्हें केवल दृश्य नहीं, एक जीवित परंपरा की झलक मिलती है जहां गरिमा और गंवई हंसी साथ-साथ चलती थीं।
राजसी होली का संदेश स्पष्ट था रंग केवल बाहरी नहीं, संबंधों का भी होता है। उस दिन दरबार में ऊंच-नीच का भेद कुछ पल को धुंधला पड़ जाता। लोककंठ में गूंजता रंग लागे राज में, तो राग जागे समाज में। आज भी यदि ध्यान से सुना जाए, तो इन किलों की हवाओं में चंग की थाप के साथ एक पुराना ठहाका सुनाई देता है। वह बताता है कि राजसी होली में रंग जितना गाढ़ा था, उतनी ही गहरी थी उसकी मुस्कान और उतना ही व्यापक था उसका अपनत्व।






No Comment! Be the first one.