लोकानुरंजन में राजस्थान की आत्मा
राजस्थान की धरती पर लोकानुरंजन केवल मनोरंजन नहीं, सामुदायिक स्मृति, परम्परा और सांस्कृतिक चेतना का सशक्त माध्यम है। बदलते समय में भी यही लोकधारा सांस्कृतिक पहचान को स्थायित्व प्रदान करती...

लोकनृत्य, लोकगीत, लोकवेदना, परम्परा और सामुदायिक जीवन से निर्मित सांस्कृतिक विरासत की जीवंत धारा
डॉ. रंजन दवे,
वरिष्ठ साहित्यकार
राजस्थान की तपती धरती इस वसुंधरा की एक ओलखाण, एक पहचान यहां की वीरता, शक्ति भक्ति, प्यार और उसकी तपस्या, सतियों के तेज जौहर की ज्वाला, तलवार की धार, लोक देवी देवता, यहां के मेले और उत्सव, गांव ढाणी के नाच गान में रचा बसा यहां का लोकानुरंजन है। शब्दों में संस्कृति का अर्थ है- संस्करण, परिमार्जन, शोधन, परिष्करण। संस्कृति मनुष्यों के परिष्कृत संस्कारों की परिलब्धि या सार का नाम है। युगों से चली आई सम्य, सामाजिक- लौकिक परम्पराएं संस्कृति के नाम से संबोधित की जाती है।
दृश्य श्रव्य कला के साथ समाज की राजनीति, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और दार्शनिक चेतना को चित्रित करने वाले विशाल कैनवास है। अतः समाज के सभी अंगों और प्रखंडों में लोकानुरंजन की महत्ती भूमिका है। राजस्थान के ठेठ ग्रामीण जीवन को समझना है तो उनकी भाषा के साथ उनके मनोरंजन के तरीकों की जानकारी प्राप्त करनी होगी।
मार्च 2026 का पूरा अंक देखें-
RT_March2026.pdf
भारत गांवो में बसता है। ऐसा हमने देखा है, सुना है। यहां के प्राकृतिक वातावरण के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत भी विविधता लिए हुए हैं। लोक कला की समस्त विधाओं में लोकनृत्यों, लोकनाट्यों, लोक वाद्यों, लोक गीत, लोककला संगीत इत्यादि का महत्वपूर्ण स्थान है। इन विधाओं में लोक जीवन, मनोरंजन और संस्कृति का अनुपम रूप निहारने को मिलता है। इन कलाओं के प्रणेता न ऋषि-मुनि थे और न ही इनके लिए कोई ग्रंथ रचे गए। मानव के क्रियाकलापों, सामुदायिक वातावरण और परम्परागत अभ्यास ने इन कलाओं को जन्म दिया तथा जीवित रखा। मौखिक स्मरण और लौकिक रूढ़ियों से ढली यह कलाएं आज भी जीवित हैं। युग-युगान्तर से पनपी यह कलाएं राजस्थान की संस्कृति की प्राण बनी हुई हैं। सामाजिक ताने बाने में गुंथे यहां के संस्कार, जातिगत रूढ़िवादिता, छुआछूत भेदभाव के बीच सांस्कृतिक विरासत को यहां की पीढ़ियां आज भी संजोये हुए हैं। समाजिक जीवन में लोकानुरंजन की नितांत आवश्यकतानुरूप राजस्थान प्रदेश के सामाजिक परिवेश को देखने पर यहां की छिपी लोक कलाओं में लोक नाट्यों और लोक नृत्यों, लोक गीतों, लोक वाद्यों में वो झलक परस्पर दिखाई पड़ती है।
राजस्थान में लोकनृत्य की संस्कृति ने यहां के समाज के ताने-बाने को और अच्छा बुना है। संस्कृति किसी भी देश जाति या समाज की आत्मा होती है और राजस्थान के लोक नृत्य में महिलाएं ही नहीं पुरुषों की प्रधानता वाले लोक नृत्य इसके महत्व को और बढ़ा देते हैं। इसमें देश, जाति समाज और वर्ग के चिंतन, मनन आचार, विचार, रहन-सहन, बोली भाषा, वेशभूषा, कला कौशल आदि सभी बातों का समावेश होकर संस्कृति को पूर्णता प्रदान करता है।
“वीर भोग्या वसुंधरा” की धरा के पुरुषों में भी कला सृजन के लिए प्रवृत्त हुआ है। राजस्थानी भूमि शूरवीरों की खान रही है। युद्ध रण कौशल में तो जहां इन रणबांकुरों के केसरिया बाना के किस्से जगजाहिर हैं ही, वहीं आमोद प्रमोद और मनोरंजन के लिए आखेट के साथ-साथ नृत्य, गीत-संगीत, खेल, तमाशा प्रमुख रूप से देखें और पसंद किए जाते रहे हैं। यहां के लोक मानस को सामाजिक आधार और जातिगत संबंधों की बानगी ढोली, ढाढी, कामड़ भवाई, भील, गरासिया, मिरासी, लंगा, मांगणियार, कालबेलिया आदि जातियों के लोक कलाकारों के रूप में देखी जा सकती है। इन्हीं कलाकारों ने राजस्थान की लोक कलाओं को अंतरराष्ट्रीय पटल पर पहचान दिलाई है। इतना ही नहीं विवाह और मंगल आयोजनों पर सरगरा, ढोली और भील जातियों के द्वारा किया जाने वाला पुरुष प्रधान ‘ढोल नृत्य’ जालौर ही नहीं अब राजस्थान के प्रमुख लोक नृत्य में से एक है। राजस्थान की बावरी जाति के लोगों द्वारा किया जाने वाला ‘कच्छी घोड़ी’ नृत्य युद्ध की सजगता को दर्शाता है तो जांगल प्रदेश का ‘अग्नि नृत्य’ राजस्थान के शूर वीरों की बानगीभर है, जो कि “फ़त्तेह-फ़त्तेह’ भर के उच्चारण से देखने वालों में जोश का संचरण कर देते हैं। दहकते अंगारों पर ‘नाचनियों’ के नंगे पैर प्रवेश कर एक विशेष भयमिश्रित उत्सुकता और यहां की माटी में पाए जाने वाली वीरता के भाव को साकार कर उठते हैं। वही इस प्रदेश के कुछ लोकनृत्य ऐसे भी हैं जिनमें यहां के पुरुष महिलाओं के साथ सामंजस्य मिला अपनी खुशी और मनोरंजन का सूत्रपात करते है। पारंपरिक लोक वाद्यों में “ढोल थाली” की जोड़ी के बिना मांगलिक आयोजन आज भी अधूरे ही माने जाते हैं। लोकोत्सव, पर्व, तीज-त्योहार, लोकानुष्ठान आदि के मोकों पर रंग-बिरंगी वेशभूषा और स्थान विशेष की परम्पराओं के अनुसार लोकनृत्य परम्परा शताब्दियों से चली आ रही है। मारवाड़ का डांडिया, मारवाड़ व मेवाड़ का गैर, शेखावाटी का गिंदड़, जसनाथी सिद्धों का अग्नि नृत्य, अलवर-भरतपुर का बम नृत्य, लगभग पूरे प्रदेश में प्रचलित घूमर, चंग एवं डांडिया राजस्थान के लोकप्रिय नृत्य हैं। राजस्थान की जनजातियों के लोक नृत्यों में भीलों के गवरी, गरासियों के वालर, गूजरों का चरी नृत्य, रामदेवजी के भोपों का तेरहताली नृत्य, पेशेवर लोकनर्तकों का भवाई नृत्य आदि रंग-बिरंगी छटा बिखरते हैं।
वर्तमान दौर परिवर्तनशील है, ऐसे में हमारी लोक संस्कृति और लोक कलाओं में भी परिवर्तन देखने को मिलता है। ये केवल मनोरंजन का साधन न होकर हमारी जड़े हैं, जिनसे हमें मजबूती मिलती है। लोकानुरंजन के आधार पर ही हमें आने वाली पीढ़ियों में जागृति की नींव डालनी है, जिससे कि हम निरंतर इसे सहेज कर उन्नति के सोपान को अर्जित करें।






No Comment! Be the first one.