‘जो शब्द असहज होते हैं, वही याद रहते हैं’
द स्वर्व (The Swerve) के लिए पुलित्जर से सम्मानित चिंतक कहते हैं कि साहित्य सहूलियत नहीं देता। वह मनुष्य और सत्ता के संबंधों का कठोर आईना दिखाता है। विलियम शेक्सपियर और क्रिस्टोफर मार्लो के उदाहरणों...

पुलित्जर (Pulitzer) पुरस्कार विजेता स्टीफन ग्रीनब्लाट से विशेष बातचीत
द स्वर्व (The Swerve) के लिए पुलित्जर से सम्मानित चिंतक कहते हैं कि साहित्य सहूलियत नहीं देता। वह मनुष्य और सत्ता के संबंधों का कठोर आईना दिखाता है। विलियम शेक्सपियर और क्रिस्टोफर मार्लो के उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि जोखिम भरा लेखन ही समय की कसौटी पर टिकता है। इतिहास अंततः उन्हीं शब्दों को याद रखता है जो असहज करते हैं।
प्रस्तुत है ग्रीनब्लाट से वरिष्ठ पत्रकार मणिमाला शर्मा की बातचीत के मुख्य अंश –
प्रश्न – आप कहते हैं कि आप ‘मृतकों से संवाद’ करना चाहते हैं। यदि आज शेक्सपियर या मार्लो हमारे समय को देखें, खासकर सोशल मीडिया और त्वरित प्रतिक्रियाओं के इस दौर को, तो उन्हें सबसे अधिक क्या चौंकाएगा?
स्टीफन ग्रीनब्लाट – अगर ऐसा होता तो शायद उन्हें हमारी अधीरता ही चौंकाती। क्योंकि भले ही उनके समय में भय और अस्थिरता थी, लेकिन शब्दों को समय मिलता था। आज का दौर इससे बिल्कुल उलट है। आजकल निर्णय पहले आता है, विचार बाद में। भाषा संवाद से अधिक हथियार बन गई है। यह बदलाव उन्हें बेचैन करता।
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प्रश्न – डार्क रेनैसांस (Dark Renaissance) में आपने मार्लो की निर्भीकता को सामने रखा है। आज के दौर में, जब सार्वजनिक विमर्श अधिक नियंत्रित और संवेदनशील होता जा रहा है, क्या ऐसे जोखिम भरे लेखकों के लिए जगह बची है?
स्टीफन ग्रीनब्लाट – अगर जोखिम लेने की जगह नहीं बची, तो साहित्य का अर्थ खत्म हो जाएगा। मार्लो ने सत्ता को ललकारा था। वे लोकप्रिय होने के लिए नहीं लिख रहे थे। आज भी असली लेखन वही है जो सुविधा और सत्ता से टकरा जाए। असहमति हमेशा असुविधाजनक होती है, पर वही इतिहास को आगे बढ़ाती है।
प्रश्न – चार सौ साल बाद जब कोई इतिहासकार हमारे समय का अध्ययन करेगा, तो वह हमारे युग की सबसे बड़ी विडंबना क्या पाएगा?
स्टीफन ग्रीनब्लाट – वह देखेगा कि हमारे पास जानकारी का तो महासागर था, पर विवेक की कमी थी। हमने तकनीक को गति दी, पर नैतिक साहस को नहीं। यह असंतुलन उसे निश्चय ही चकित करेगा।
प्रश्न – द स्वर्व (The Swerve) में आपने दिखाया कि एक पांडुलिपि ने दुनिया की बौद्धिक दिशा बदल दी। क्या आज के डिजिटल युग में किसी एक किताब या विचार में वह ताकत बची है?
स्टीफन ग्रीनब्लाट – संभव है, लेकिन अब वह बदलाव शोर से नहीं, चुपचाप आता है। आज हर विचार तुरंत भीड़ में घिर जाता है। फिर भी इतिहास में निर्णायक मोड़ अक्सर धीरे-धीरे तैयार होते हैं। एक विचार समय लेता है, पर वह अपना असर गहरा छोड़ता है।
प्रश्न – भारत में शेक्सपियर को औपनिवेशिक विरासत (Colonial Legacy) के रूप में पढ़ाया गया, पर यहां के मंच और सिनेमा ने उन्हें अपना बना लिया। क्या वे अब किसी एक संस्कृति के लेखक नहीं रहे?
स्टीफन ग्रीनब्लाट – शेक्सपियर सीमाओं में नहीं रहते। जब उनकी कहानियां नई भाषाओं में ढलती हैं, तो वे फिर से जन्म लेती हैं। यह उनकी शक्ति है। वे अब केवल अंग्रेज़ी साहित्य का हिस्सा नहीं रह गए हैं बल्कि वे अब समग्र मानवीय अनुभव का हिस्सा बन चुके हैं।
प्रश्न – दशकों के अध्ययन के बाद भी क्या शेक्सपियर का कोई अंधेरा कोना आपको विचलित करता है?
स्टीफन ग्रीनब्लाट – हां। सत्ता और हिंसा के प्रति उनकी निर्मम स्पष्टता मुझे विचलित करती है। वे दिखाते हैं कि मनुष्य के भीतर का अंधेरा स्थायी है। यही सच्चाई हमें असहज करती है, क्योंकि वह आज भी उतनी ही सच है।
प्रश्न – क्या भारतीय या गैर-अंग्रेज़ी परंपराओं से हुए परस्पर संवादों ने आपकी समझ को बदला है?
स्टीफन ग्रीनब्लाट – बिलकुल बदला है। जब कोई संस्कृति शेक्सपियर को अपने संदर्भ में ढालती है, तो पाठ की नई परतें खुलती हैं। भारत में उनके रूपांतरणों ने मुझे यह सिखाया कि साहित्य स्थिर नहीं होता। वह हर समाज में एक नया अर्थ ग्रहण करता है, जिससे उसके मायने हर दौर देश काल परिस्तिथियों में बदल जाते हैं।
प्रश्न – आज के युवा लेखक, जो दबाव और ध्रुवीकरण के बीच लिख रहे हैं, उन्हें आप क्या सलाह देंगे?
स्टीफन ग्रीनब्लाट – लेखन अगर भय से संचालित होगा, तो वह टिकेगा नहीं। इतिहास उन्हीं रचनाओं को याद रखता है जिन्होंने जोखिम उठाया है। लोकप्रियता क्षणिक होती है परंतु साहस हमेशा से स्थायी होता है।
ग्रीनब्लैट की बातों में एक स्पष्ट संकेत है। अतीत केवल संग्रहालय की वस्तु नहीं, वह वर्तमान का आईना है। शेक्सपियर और मार्लो को पढ़ना इतिहास को दोहराना नहीं, उसे पहचानना है। जब शब्द केवल ताली के लिए लिखे जाते हैं, वे समय के साथ खो जाते हैं। और जब वही शब्द सामने वाले व्यक्ति के लिए असुविधा पैदा कर देते हैं, बाद में केवल वे बच जाते हैं और आज के समय के साहित्य की यह अंतिम परीक्षा है।






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