परंपरा, पंखुड़ियां और पहचान
राजस्थान की होली रंगों का उत्सव भर नहीं बल्कि लोकजीवन परंपरा और स्त्री अभिव्यक्ति का जीवंत रूप है। पारंपरिक उत्सवों से आधुनिक रूपों तक महिलाएं रचनात्मकता और सामाजिक जागरूकता से होली को नए अर्थ दे रही...

महिलाओं की होली जहां उत्सव स्त्री की अभिव्यक्ति बन जाता है
राखी सोनी,
पत्रकार
Table Of Content
- महिलाओं की होली जहां उत्सव स्त्री की अभिव्यक्ति बन जाता है
- साहस और उत्साह की प्रतीक कोड़ामार होली
- लोकगीतों में सजी परंपरा फाग और ढूंढ
- गेर और रम्मत उत्सव में लोकनाट्य का रंग
- उदयपुर की शाही होली परंपरा और गरिमा
- बदलते समय में महिलाओं की होली
- किटी पार्टी के जरिए फूलों की होली
- इको-फ्रेंडली और ऑर्गेनिक होली
- कार्यस्थल पर प्रोफेशनल होली
- डिजिटल होली और सोशल मीडिया
राजस्थान की होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि लोकजीवन, परंपरा, सामूहिकता और स्त्री-अभिव्यक्ति का जीवंत संगम है। सदियों पुरानी कोड़ामार, ढूंढ और मरु होली जैसी परंपराएं आज भी जीवित हैं, वहीं फूलों की होली, इको-फ्रेंडली रंग, ड्राई होली और डिजिटल उत्सव जैसे आधुनिक रूप भी तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। महिलाओं की रचनात्मक भागीदारी ने इस पर्व को नई पहचान दी है जहां संस्कृति, आत्मविश्वास और सामाजिक जागरूकता रंगों के साथ खिल उठती है। गुलाल और अबीर से आगे बढ़कर होली ने गीत, नृत्य, हास्य व्यंग्य, लोकरीतियों और सामाजिक संवाद के रूप में एक व्यापक सांस्कृतिक स्वरूप ग्रहण किया है। यही संगम राजस्थान की महिलाओं की होली को विशेष बनाता है।
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साहस और उत्साह की प्रतीक कोड़ामार होली
भीलवाड़ा और शाहपुरा क्षेत्र में मनाई जाने वाली कोड़ामार होली एक अनोखी और रोचक लोक परंपरा है। इस उत्सव में महिलाएं कपड़े या रस्सी से बने प्रतीकात्मक ‘कोड़े’ लेकर पुरुषों को हल्के-फुल्के अंदाज में मारती हैं, जबकि पुरुष रंग लगाने का प्रयास करते हैं। यह पूरा आयोजन हंसी-मजाक, फाग गीतों और ढोलक की थाप के बीच संपन्न होता है। इस परंपरा का उद्देश्य किसी प्रकार की हिंसा नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद और आनंद की अभिव्यक्ति है। ग्रामीण परिवेश में यह उत्सव महिलाओं को खुलकर भाग लेने और अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का अवसर देता है। इसे नारी-साहस और आत्मविश्वास का प्रतीक माना जाता है।
लोकगीतों में सजी परंपरा फाग और ढूंढ
मारवाड़ क्षेत्र में फाग और ढूंढ की परंपरा विशेष महत्व रखती है। फाग के दौरान महिलाएं समूह में एकत्र होकर पारंपरिक लोकगीत गाती हैं। इन गीतों में हास्य, व्यंग्य, प्रेम और सामाजिक संदेशों का सुंदर समावेश होता है। ढोलक और मंजीरे की मधुर धुन पर गाए जाने वाले ये गीत वातावरण को उल्लासमय बना देते हैं। ‘ढूंढ’ की रस्म विशेष रूप से छोटे बच्चों के लिए की जाती है। इसमें मंगलगीत गाकर बच्चों की रक्षा का आशीर्वाद दिया जाता है। यह परंपरा मातृत्व, संरक्षण और सामूहिक जिम्मेदारी का प्रतीक है। फाग और ढूंढ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक निरंतरता के प्रतीक हैं। इन आयोजनों में महिलाएं एक-दूसरे के साथ समय बिताती हैं, अनुभव साझा करती हैं और रिश्तों को मजबूत बनाती हैं।
गेर और रम्मत उत्सव में लोकनाट्य का रंग
बीकानेर की होली में गेर और रम्मत प्रमुख आकर्षण हैं, जो इस उत्सव को विशिष्ट पहचान देते हैं। गेर में पारंपरिक वेशभूषा पहने लोग ढोल-नगाड़ों की गूंज के साथ जुलूस निकालते हैं। रंग, उमंग और सामूहिक नृत्य का यह दृश्य पूरे शहर को उत्साह से भर देता है। वहीं रम्मत लोकनाट्य की जीवंत परंपरा है, जिसमें सामाजिक व्यंग्य, पौराणिक कथाएं और समसामयिक मुद्दों को हास्यपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया जाता है। महिलाएं लोकगीतों और नृत्य से कार्यक्रम को जीवंत बनाती हैं तथा मंचन में सक्रिय भागीदारी निभाती हैं। गेर और रम्मत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का माध्यम भी हैं। ये परंपराएं राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजते हुए होली को सामूहिक उल्लास का उत्सव बना देती हैं। बीकानेर की डोलची मार होली 500 वर्ष पुरानी परंपरा है, जिसकी शुरुआत दो समुदायों के बीच पुरानी दुश्मनी समाप्त कर सौहार्द स्थापित करने के उद्देश्य से हुई थी।
उदयपुर की शाही होली परंपरा और गरिमा
उदयपुर में शाही होली राजसी परंपराओं से जुड़ी हुई है। विशेष रूप से सिटी पैलेस परिसर में होलिका दहन और अन्य अनुष्ठान बड़े धूमधाम से किए जाते हैं। महिलाएं पारंपरिक राजस्थानी परिधान पहनकर लोकगीत गाती हैं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती हैं। यह उत्सव मेवाड़ की गौरवशाली परंपरा को दर्शाता है। शाही होली में अनुशासन, गरिमा और सांस्कृतिक समृद्धि का विशेष ध्यान रखा जाता है। यहां की होली केवल रंगों तक सीमित नहीं, बल्कि इतिहास और विरासत का प्रतीक है।
बदलते समय में महिलाओं की होली
समय के साथ समाज में अनेक परिवर्तन आए हैं। शिक्षा, शहरीकरण, तकनीकी विकास और महिलाओं की बढ़ती आत्मनिर्भरता ने उत्सव मनाने के तरीकों को भी प्रभावित किया है। आज की होली पारंपरिक आंगन तक सीमित नहीं रही, बल्कि नए आयामों के साथ विस्तृत हो गई है।
किटी पार्टी के जरिए फूलों की होली
आजकल महिलाएं छोटी-छोटी किटी पार्टियों के माध्यम से भी होली मना रही हैं। सोसाइटी, क्लब या घरों में 10–20 महिलाओं का समूह इकट्ठा होता है। यहां गुलाल की जगह फूलों की होली खेली जाती है। गुलाब, गेंदा और अन्य सुगंधित फूलों की पंखुड़ियां एक-दूसरे पर डालकर उत्सव मनाया जाता है। थीम आधारित सजावट, रंग-बिरंगे दुपट्टे और पारंपरिक परिधान इस आयोजन को विशेष बनाते हैं। साथ में खेल, नृत्य और होली के पारंपरिक व्यंजन जैसे गुजिया, दही बड़े और मालपुआ भी शामिल रहते हैं। महिलाएं अपनी पसंद से कार्यक्रम की रूपरेखा तय करती हैं और स्वतंत्र रूप से आनंद लेती हैं।
इको-फ्रेंडली और ऑर्गेनिक होली
पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ने के साथ महिलाएं अब हर्बल और प्राकृतिक रंगों का उपयोग कर रही हैं। घर पर हल्दी, चुकंदर, पालक और सूखे फूलों से रंग तैयार किए जाते हैं। इससे त्वचा को नुकसान नहीं होता और पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है। पानी की बचत के लिए कई स्थानों पर ‘ड्राई होली’ मनाने का चलन बढ़ रहा है। बच्चों को भी सुरक्षित और हरित होली का संदेश दिया जाता है।
कार्यस्थल पर प्रोफेशनल होली
आज की कामकाजी महिलाएं दफ्तरों और कॉरपोरेट क्षेत्रों में भी सीमित और सादगीपूर्ण होली मनाती हैं। ‘ड्राई होली’ का प्रचलन यहां अधिक है। एथनिक डे और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित की जाती हैं। टीम-बिल्डिंग गतिविधियां और होली मिलन समारोह कार्यस्थल के वातावरण को सकारात्मक बनाते हैं। इससे सहकर्मियों के बीच आपसी संबंध मजबूत होते हैं।
डिजिटल होली और सोशल मीडिया
डिजिटल युग में होली मनाने के तरीके भी बदल गए हैं। महिलाएं सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी खुशियां साझा करती हैं। इंस्टाग्राम रील्स, लाइव वीडियो, फोटोशूट और ऑनलाइन शुभकामनाएं अब आम हो चुकी हैं। दूर रहने वाले परिवार और मित्रों के साथ वीडियो कॉल के जरिए होली मनाई जाती है। डिजिटल कार्ड और संदेशों के माध्यम से शुभकामनाएं भेजी जाती हैं।






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