वेनेजुएला और ईरान क्यों बने निशाना
अमेरिकी विदेश नीति के केंद्र में लोकतंत्र नहीं बल्कि तेल, गैस और रणनीतिक समुद्री मार्ग हैं। वेनेजुएला और ईरान इसके प्रमुख उदाहरण हैं, जहां संसाधनों पर नियंत्रण के लिए वैश्विक शक्तियों का टकराव तेज...

रिसोर्स वॉर की नई जंग – 21वीं सदी की भू-राजनीति में तेल, गैस और समुद्री मार्गों की निर्णायक भूमिका
संजीव पांडेय,
वरिष्ठ पत्रकार
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21वीं सदी में वैश्विक युद्धों का स्वरूप बदल चुका है। अब युद्ध केवल सीमाओं, सेनाओं या विचारधाराओं के लिए नहीं लड़े जाते, बल्कि वे प्राकृतिक संसाधनों, ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापारिक मार्गों और वैश्विक शक्ति-संतुलन के लिए लड़े जा रहे हैं। बीते दो महीनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक विदेश नीति ने इसी बदले हुए युग की झलक दुनिया के सामने रख दी है।
वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी और उन्हें अमेरिकी जेल में डालने की घोषणा ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भूचाल ला दिया। इसके तुरंत बाद ट्रंप ने ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई को ‘गंभीर परिणाम’ भुगतने की चेतावनी दी और खुले तौर पर ईरान में सत्ता परिवर्तन की बात कही। ईरानी जनता से विद्रोह की अपील और संभावित सैन्य हमलों की धमकियों ने यह स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका एक बार फिर शक्ति प्रदर्शन की राह पर है। इन सभी कदमों को ‘लोकतंत्र बहाली’ और ‘तानाशाही के खिलाफ संघर्ष’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक कठोर है। डोनाल्ड ट्रंप की नज़र लैटिन अमेरिका से लेकर पश्चिम एशिया तक फैले तेल, गैस और दुर्लभ खनिज संसाधनों पर है। यह संघर्ष लोकतंत्र का नहीं, बल्कि रिसोर्स वॉर का है।
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डोनाल्ड ट्रंप की प्राथमिकताओं में वेनेजुएला 2017 में ही शामिल हो गया था, जब वे पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने। उसी समय से उन्होंने वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन की बात शुरू कर दी थी। ट्रंप प्रशासन ने वेनेजुएला को केवल एक क्षेत्रीय संकट के रूप में नहीं, बल्कि एक गंभीर रणनीतिक चुनौती के रूप में देखा। दूसरे कार्यकाल में सत्ता में लौटते ही ट्रंप प्रशासन ने निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी करवा दी। इसका औपचारिक कारण वेनेजुएला में लोकतंत्र की बहाली बताया गया, लेकिन यह महज एक राजनीतिक आवरण था। दरअसल मादुरो की गिरफ्तारी लैटिन अमेरिका में चल रहे उस ऐतिहासिक रिसोर्स वॉर का हिस्सा है, जिसकी जड़ें लगभग दो सौ वर्षों में फैली हुई हैं।
पूरे झंझट की जड़ है बड़ा तेल भंडार
वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है। वेनेजुएला के पास करीब 300 अरब बैरल का तेल भंडार है जो तेल के बड़े उत्पादक देश सऊदी अरब, इराक, ईऱान से कहीं ज्यादा है। ऐतिहासिक रूप से अमेरिका इस तेल पर अपना स्वाभाविक अधिकार समझता रहा है। दशकों तक अमेरिकी तेल कंपनियां वेनेजुएला के ऊर्जा क्षेत्र पर हावी रहीं और अमेरिकी रिफाइनरियां वेनेजुएला के भारी तेल पर निर्भर रहीं। 1990 के दशक में समाजवादी नेता ह्यूगो चावेज़ के सत्ता में आने के बाद यह समीकरण पूरी तरह बदल गया। चावेज़ ने वेनेजुएला के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया और अमेरिकी कंपनियों को बाहर का रास्ता दिखाया। उनके बाद सत्ता में आए निकोलस मादुरो ने भी इसी नीति को आगे बढ़ाया। चावेज़ और मादुरो दोनों ने चीन और रूस के साथ रणनीतिक साझेदारी विकसित की। चीन ने वेनेजुएला के ऊर्जा क्षेत्र में भारी निवेश किया और वह उसका प्रमुख तेल खरीदार बन गया। रूस ने सैन्य और तकनीकी सहयोग बढ़ाया। इन संबंधों ने न केवल अमेरिका की ऊर्जा सुरक्षा को चुनौती दी, बल्कि लैटिन अमेरिका में उसके पारंपरिक प्रभुत्व को भी कमजोर किया। अमेरिका के लिए यह स्थिति अस्वीकार्य थी। ट्रंप प्रशासन ने वेनेजुएला में चीनी और रूसी प्रभाव को सीधे अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ दिया। डोनाल्ड ट्रंप का उद्देश्य स्पष्ट था। वो वेनेजुएला में अमेरिकी तेल कंपनियों की वापसी चाहते थे और क्षेत्र में अमेरिकी दबदबे की पुनर्स्थापना चाहते थे।
खुलकर सामने आई वैचारिक दुश्मनी
डोनाल्ड ट्रंप समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारधाराओं के मुखर आलोचक रहे हैं। वेनेजुएला के समाजवादी नेतृत्व से उनकी वैचारिक दुश्मनी खुलकर सामने आई। ट्रंप लगातार वेनेजुएला के आर्थिक संकट के लिए समाजवाद को जिम्मेदार ठहराते रहे और इसी बहाने अमेरिका के भीतर डेमोक्रेटिक पार्टी के सोशल डेमोक्रेट नेताओं पर भी हमला करते रहे। एक सुनियोजित रणनीति के तहत ट्रंप प्रशासन ने निकोलस मादुरो की वैधता को नकार दिया और विपक्षी नेता जुआन गुएदो को वेनेजुएला का अंतरिम राष्ट्रपति के तौर पर मान्यता दे दी। इसके साथ ही कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए, जिनका उद्देश्य अर्थव्यवस्था को कमजोर करना, सेना और नौकरशाही में असंतोष फैलाना और सत्ता परिवर्तन के लिए जमीन तैयार करना था। इन प्रतिबंधों ने वेनेजुएला को गहरे मानवीय संकट में धकेल दिया। महंगाई बढ़ी, गरीबी फैली और लाखों लोग देश छोड़ने को मजबूर हुए। ट्रंप प्रशासन ने इस संकट को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाकर सत्ता परिवर्तन की राजनीति को और तेज किया।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर नाराजगी
ईरान के प्रति ट्रंप की नीति कोई अपवाद नहीं है। यह अमेरिका की उस पारंपरिक नीति का विस्तार है, जिसकी नींव 1979 की ईरानी क्रांति के बाद पड़ी थी। अमेरिका समर्थित शाह रज़ा पहलवी के तख्ता पलट के बाद से ही ईरान अमेरिका की नजरों में स्थायी शत्रु बन गया। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते को तोड़ दिया। दूसरे कार्यकाल में उन्होंने खुले तौर पर ईरान में शासन परिवर्तन की मांग शुरू कर दी। हाल के वर्षों में ईरान के परमाणु केंद्र फोर्डो पर हुए अमेरिकी हमले इसी आक्रामक नीति का हिस्सा हैं। अमेरिका ईरान का परमाणु कार्यक्रम का विरोध इसलिए भी करता रहा कि इसके विरोध में इजरायल और सऊदी अरब दोनों रहे। दोनों देशों ने ईऱान के परमाणु कार्यक्रम को अपने लिए खतरा बताया। सऊदी अरब तो लगातार अपने परमाणु कार्यक्रम की शुरूआत करने की योजना बनाता नजर आया। ईरान पर ट्रंप की सख्ती का बड़ा कारण अमेरिकी डीप स्टेट की ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर नाराजगी है। 2018 में ट्रंप ने ईरान परमाणु समझौते को इतिहास का सबसे खराब समझौता बताते हुए उससे अमेरिका को बाहर निकाल लिया। ईरान विरोध की अमेरिकी नीति में इज़राइल की सुरक्षा केंद्रीय भूमिका निभाती है। ईरान द्वारा हमास, हिज़्बुल्लाह और हूती विद्रोहियों को समर्थन ट्रंप प्रशासन की नजर में इज़राइल और अमेरिका दोनों के लिए खतरा है। इसमें सच्चाई है कि हमास , हिज्जबुल्लाह और हुती विद्रोहियों ने पूरे पश्चिम एशिया में इजरायल, सऊदी अरब और अमेरिकी हितों पर चोट पहुंचाई। खतरनाक हमले किए। समुद्री रूट को हुती विद्रोहितों ने बाधित किया। वैश्विक व्यापार को रोकने की कोशिश की। इससे यूरोप समेत अमेरिका परेशान हुए।
तेल कीमतों को लेकर अमेरिका आशंकित
ईरान की भौगोलिक स्थिति उसे असाधारण रणनीतिक शक्ति प्रदान करती है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान का प्रभाव है। दुनिया के एक बड़े हिस्से का तेल इसी मार्ग से गुजरता है। अमेरिका को यह डर है कि यदि ईरान इस मार्ग को बाधित करता है, तो वैश्विक तेल कीमतों में भारी उछाल आएगा और आर्थिक अस्थिरता फैल जाएगी। इसी कारण अमेरिका दशकों से इस समुद्री मार्ग पर ईरानी नियंत्रण को कमजोर करने की कोशिश करता रहा है। प्रमुख समुद्री मार्ग पर ईरान के प्रभुत्व का विरोध स्थानीय ताकतें भी करती रही है। प्रमुख सुन्नी इस्लामिक देश शिया ईरान के इस प्रभुत्व को इसलिए भी विरोध करते रहे कि उन्हें डर है कि उनके तेल निर्यात को भी ईरान रोक सकता है क्योंकि प्रमुख समुद्री रूट पर ईरान का कब्जा है। इसलिए अमेरिकी नीतियों का अप्रत्यक्ष समर्थन सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात का हमेशा रहा है। वो किसी भी कीमत पर समुद्री रूट से ईरान के प्रभुत्व को खत्म करना चाहते है।
ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीददार है चीन
ईरान ने भी वेनेजुएला की तरह चीन और रूस के साथ अपने संबंध मजबूत किए। हालांकि ईरान एक समाजवादी देश होने के बजाए कट्टर इस्लामिक देश है, और चीन रूस के साथ कोई वैचारिक सहयोग नहीं है, लेकिन चीन और रूस दोनों ईऱान को एशिया में महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानते रहे है। इसके मूल में ईऱान का अमेरिका विरोध रहा है। चीन ने इसी रणनीति के तहत ईऱान से संबंध विकसित किए। चीन उसका सबसे बड़ा तेल खरीदार बना। दूसरी तरफ रूस के साथ ईऱान का सैन्य सहयोग बढा। यूक्रेन युद्ध में ईरानी ड्रोन का इस्तेमाल इस गठजोड़ का प्रमाण बना। ट्रंप की नजर में यह एक उभरती हुई अमेरिका-विरोधी धुरी है। इसलिए ईरान पर दबाव डालना केवल तेहरान को चेतावनी देना नहीं, बल्कि बीजिंग और मॉस्को को यह संदेश देना भी है कि अमेरिका अब भी वैश्विक शक्ति-संतुलन को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है।
वेनेजुएला और ईरान के खिलाफ ट्रंप की नीतियां यह स्पष्ट कर देती हैं कि 21वीं सदी में युद्ध का असली कारण लोकतंत्र नहीं, बल्कि संसाधन हैं। तेल, गैस, समुद्री मार्ग और वैश्विक वर्चस्व ही लड़ाई का मुख्य कारण है। यही आज की वैश्विक राजनीति की वास्तविक धुरी है। लड़ाई के केंद्र में रिसोर्स है और रिसोर्स के लिए वार हो रहे है। यह रिसोर्स वॉर आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करेगा, जिसमें छोटे और संसाधन-समृद्ध देश सबसे बड़े निशाने पर होंगे।






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